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अध्याय 18 · अठारहवाँ प्रकरण

ज्ञानी की शांति

संपादकीय विषय-शीर्षक · पुस्तक में नाम: अठारहवाँ प्रकरण

सौ श्लोकों के इस विशाल और शिखर अठारहवें प्रकरण में गुरु अष्टावक्र जीवनमुक्ति की परम शांति (उपशम) और द्वंद्वातीत सहज आत्मस्थिति का विशद प्रतिपादन करते हैं।

श्लोकों की कुल संख्या
100
अनुमानित पठन समय
लगभग 120 से 150 मिनट (अनुमान: प्रति श्लोक 1.5 से 2 मिनट)
मुख्य संस्कृत शब्द
उपशम · प्रशमपीयूष · निरावरणदृष्टि · तूष्णीम् · उपशान्त · शुष्कपर्णवत् · अकर्ता · कैवल्य
प्रमुख विषय
बोधोदय से संसार-भ्रम का स्वप्नवत् लय · सर्व-परित्याग के बिना सच्चे सुख का अभाव · कर्तव्य-दुख की ज्वाला और शांति-अमृत की वर्षा · संसार की भावनामात्रता और आत्मा की नित्य-उपलब्धि · निरावरण दृष्टि और शोक-मुक्ति · बालवत् अभ्यास की व्यर्थता और अद्वैत निश्चय · तूष्णीम् (परम मौन) में स्थित उपशांत योगी · धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के विकल्पों की समाप्ति · जीवन्मुक्त का सहज, अहेतुक आचरण · शुष्क पत्र (सूखे पत्ते) की भाँति प्रारब्ध-वायु में सहज विचरण · कर्म और अकर्म दोनों के आग्रह से मुक्ति · उपशम की सर्वोच्च पराकाष्ठा और अखंड आत्म-शांति

चित्र-विवरण (संपादकीय): स्थिर केंद्र वाला विस्तृत परिदृश्य। कई गतिविधियाँ एक स्थिर केंद्र के आसपास चलती हैं। (इस अध्याय का अपना चित्र अभी बनना शेष है; यहाँ सरल सामान्य पृष्ठभूमि दिखाई गई है।)

अध्याय का परिचय

अठारहवाँ प्रकरण अष्टावक्र गीता का हृदय और इसका सबसे विशाल प्रकरण है। इसमें पूरे सौ श्लोक हैं। भारतीय दर्शन और अद्वैत वाङ्मय में इसे 'उपशम प्रकरण' या 'ज्ञानी की परम शांति' कहा जाता है।

गुरु अष्टावक्र पहले श्लोक में ही उस आत्म-तेज को नमन करते हैं जिसके उदय होते ही यह संसार-भ्रम स्वप्न के समान विलीन हो जाता है। दूसरे और तीसरे श्लोक में वे समझाते हैं कि संसार के सारे भोग और संग्रह कर लेने के बाद भी जब तक आंतरिक त्याग नहीं होता, तब तक शांति नहीं मिल सकती; कर्तव्य के बोझ से जलते हुए अंतःकरण को शांति के अमृत के सिवा कोई सुखी नहीं कर सकता।

चौथे से दसवें श्लोक में वे घोषणा करते हैं कि आत्मा कोई दूर की वस्तु नहीं जिसे पाने के लिए कठिन साधना करनी पड़े; वह तो पहले से ही प्राप्त है। जैसे ही यह निश्चय दृढ़ होता है, 'मैं यह हूँ और यह नहीं हूँ' के सारे विकल्प मिट जाते हैं और योगी 'तूष्णीम्'—परम मौन और उपशम—में स्थित हो जाता है। ग्यारहवें से बीसवें श्लोक में वे जीवनमुक्त के व्यवहार का सजीव चित्रण करते हैं: वह न कर्म से भागता है और न कर्म में उलझता है; वह संस्कार-वायु से उड़ने वाले सूखे पत्ते (शुष्कपर्णवत्) की तरह पूर्णतः अनासक्त होकर सहज जीवन जीता है। आगे के श्लोकों में वे कर्तृत्व, भोक्तृत्व, समाधि और संसार के समस्त द्वंद्वों को शांत करते हुए आत्म-विश्रांति का अखंड साम्राज्य स्थापित करते हैं।

सावधानी: 'शुष्कपर्णवत्' या 'कर्तव्य-त्याग' का अर्थ अपनी नैतिक, कानूनी या पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से पलायन करना नहीं है; यह केवल अंतःकरण के तनाव और 'मैं करता हूँ' के अहंकार को विदा करने का आध्यात्मिक आदेश है।

केंद्रीय प्रश्न

जब आत्मा नित्य-प्राप्त, अकर्ता और शुद्ध है, तो ज्ञानी के लिए कर्तव्य, अभ्यास और समाधि का क्या स्थान रह जाता है?

अध्याय की मुख्य शिक्षा

सच्ची शांति किसी कर्तव्य को पूरा करने या साधना के हठ से नहीं मिलती, बल्कि यह जानने से मिलती है कि आत्मा पहले से ही पूर्ण और निर्विकार है। जब कर्तव्य-भार और कर्तापन का तनाव गिर जाता है, तब साधक सूखे पत्ते की तरह प्रकृति के प्रवाह में सहज, निर्द्वन्द्व और उपशांत होकर अखंड आनंद में जीता है।

पढ़ने से पहले समझें

  • अठारहवाँ प्रकरण अष्टावक्र गीता का सबसे लंबा और सबसे गहन अध्याय (100 श्लोक) है।
  • यह प्रकरण साधना के अंत और सिद्धावस्था की विश्रांति पर केंद्रित है।
  • यहाँ कर्तव्य के त्याग की बात चित्त के तनाव और कर्ता-अहंकार के संदर्भ में है, व्यावहारिक उत्तरदायित्वों के परित्याग में नहीं।
  • 'सूखे पत्ते' (शुष्कपर्णवत्) का दृष्टांत अहंकार-शून्य सहज जीवन का सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रतीक है।
  • इस प्रकरण को शांत मन से, धीरे-धीरे और आत्म-निरीक्षण के साथ पढ़ना चाहिए।

प्रमुख अवधारणाएँ

उपशम
चित्त की समस्त वृत्तियों, इच्छाओं और मानसिक तापों का आत्यंतिक रूप से शांत हो जाना।
प्रशमपीयूष
परम शांति रूपी वह अमृत जो कर्तव्य के बोझ और संसार की ज्वालाओं से झुलसते मन को शीतल करता है।
निरावरणदृष्टि
वह विशुद्ध दृष्टि जिसके ऊपर से अविद्या, मोह और पूर्वग्रहों का पर्दा पूरी तरह हट चुका है।
तूष्णीम्
केवल वाणी का मौन नहीं, बल्कि अंतःकरण के समस्त तर्कों, संशयों और विकल्पों का परम मौन।
शुष्कपर्णवत्
सूखे पत्ते के समान, जो हवा के झोंके से जहाँ चला जाए वहीं बिना किसी प्रतिरोध या शिकायत के सहज रहता है।
दुर्ग्रह
किसी एक पक्ष (प्रवृत्ति या निवृत्ति) को पकड़कर बैठने की हठधर्मिता, जिससे ज्ञानी सर्वथा मुक्त होता है।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

100 श्लोक, पुस्तक के क्रम में। 11 श्लोकों पर पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है और उन पर “समीक्षा आवश्यक” दर्शाया गया है।

सत्यापितसमीक्षा आवश्यक

श्लोक 18.1

सत्यापित

यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद् भवति भ्रमः । तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ १ ॥

जिसके ज्ञान के उदय होते ही संसार-भ्रम स्वप्नवत् हो जाता है, उस आनंदस्वरूप, शांत और तेजोमय आत्मा को नमस्कार है।

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श्लोक 18.2

सत्यापित

अर्जयित्वाखिलान् अर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान् । न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत् ॥ २ ॥

समस्त धन कमाकर और प्रचुर भोग पाकर भी, आंतरिक सर्व-त्याग के बिना कोई कभी सुखी नहीं हो सकता।

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श्लोक 18.3

सत्यापित

कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः । कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ ३ ॥

कर्तव्य रूपी सूर्य की ज्वाला से झुलसते अंतःकरण को आत्म-शांति के अमृत की वर्षा के बिना सुख कभी नहीं मिल सकता।

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श्लोक 18.4

सत्यापित

भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित् परमार्थतः । नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ ४ ॥

यह संसार केवल भावना मात्र है, परमार्थतः कुछ नहीं; भाव और अभाव को जानने वाली आत्मा का कभी अभाव नहीं होता।

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श्लोक 18.5

सत्यापित

न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् । निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ ५ ॥

आत्मा का पद न दूर है न कठिन प्रयास से साध्य; वह सदा प्राप्त, निर्विकल्प, प्रयासहीन, विकाररहित और निर्मल है।

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श्लोक 18.6

सत्यापित

व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः । वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ ६ ॥

मोह के मिटने और स्वरूप को जानने मात्र से, आवरण-रहित दृष्टि वाले ज्ञानी शोकरहित होकर प्रकाशित होते हैं।

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श्लोक 18.7

सत्यापित

समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः । इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत् ॥ ७ ॥

सब कुछ कल्पना मात्र है और आत्मा सनातन मुक्त है; यह जानकर ज्ञानी बच्चों की तरह अभ्यास का हठ क्यों करेगा?

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श्लोक 18.8

सत्यापित

आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ । निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम् ॥ ८ ॥

आत्मा ही ब्रह्म है और भाव-अभाव कल्पित हैं—यह निश्चित करके निष्काम पुरुष क्या जाने, क्या बोले और क्या करे?

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श्लोक 18.9

सत्यापित

अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना । सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः ॥ ९ ॥

सब कुछ आत्मा है—यह जानकर मौन हुए योगी की ‘यह मैं हूँ’ और ‘यह मैं नहीं’ की सारी कल्पनाएँ मिट जाती हैं।

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श्लोक 18.10

सत्यापित

न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता । न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः ॥ १० ॥

पूर्ण शांत योगी के लिए न विक्षेप है न एकाग्रता, न अति-ज्ञान है न मूढ़ता, और न सुख है न दुख।

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श्लोक 18.11

समीक्षा आवश्यक

स्वाराज्ये भैक्षवृत्तौ च लाभालाभे जने वने । निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः ॥ ११ ॥

निर्विकल्प योगी के लिए राज्य और भिक्षा, लाभ और हानि, भीड़ और वन में कोई भेद नहीं रहता।

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श्लोक 18.12

समीक्षा आवश्यक

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता । इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः ॥ १२ ॥

किए और न किए के द्वंद्वों से मुक्त योगी के लिए धर्म, अर्थ, काम और विवेकशीलता का कोई बंधन नहीं रहता।

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श्लोक 18.13

समीक्षा आवश्यक

कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना । यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः ॥ १३ ॥

जीवन्मुक्त योगी के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता और न मन में कोई आसक्ति होती है; वह सहज जीवन जीता है।

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श्लोक 18.14

समीक्षा आवश्यक

क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता । सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥

समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम पा चुके महात्मा के लिए न मोह है, न संसार, न ध्यान और न मुक्ति।

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श्लोक 18.15

समीक्षा आवश्यक

येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै । निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १५ ॥

जिसने विश्व देखा है वह भले कहे कि यह नहीं है; वासनारहित ज्ञानी क्या करे, वह देखते हुए भी नहीं देखता।

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श्लोक 18.16

समीक्षा आवश्यक

येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् । किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति ॥ १६ ॥

जिसने ब्रह्म को अलग देखा वह चिंतन करे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’; जो दूसरे को देखता ही नहीं, वह निश्चिंत क्या चिंतन करे?

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श्लोक 18.17

समीक्षा आवश्यक

दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ । उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम् ॥ १७ ॥

जिसने विक्षेप देखा वह वृत्तियों का निरोध करे; उदार ज्ञानी विक्षिप्त नहीं होता, तो वह साध्य के बिना क्या करे?

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श्लोक 18.18

समीक्षा आवश्यक

धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत् । न समाधिं न विक्षेपं न लोपं स्वस्य पश्यति ॥ १८ ॥

संसारियों से विपरीत दृष्टि वाला ज्ञानी लोकवत व्यवहार करता हुआ भी न समाधि देखता है, न विक्षेप और न अपना लोप।

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श्लोक 18.19

समीक्षा आवश्यक

भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः । नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता ॥ १९ ॥

भाव-अभाव से रहित, तृप्त और वासनारहित ज्ञानी संसार की दृष्टि में कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता।

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श्लोक 18.20

समीक्षा आवश्यक

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः । यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥ २० ॥

कर्म करने या छोड़ने में ज्ञानी का कोई हठ नहीं होता; जब जो सामने आ जाए उसे करके वह सुख से रहता है।

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श्लोक 18.21

समीक्षा आवश्यक

निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः । क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ २१ ॥

वासनारहित और बंधनों से मुक्त ज्ञानी प्रारब्ध-संस्कार की वायु से सूखे पत्ते की तरह सहज विचरण करता है।

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श्लोक 18.22

सत्यापित

असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता । स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते ॥ २२ ॥

संसार-भ्रम से मुक्त ज्ञानी को न हर्ष होता है न शोक; वह शांत मन वाला देह में भी विदेहवत् रहता है।

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श्लोक 18.23

सत्यापित

कुत्रापि न जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित् । आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ २३ ॥

आत्म-रमण करने वाले निर्मल ज्ञानी को न कुछ त्यागने की इच्छा होती है और न कहीं कोई नाश दिखाई देता है।

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श्लोक 18.24

सत्यापित

प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया । प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता ॥ २४ ॥

अहंकार-शून्य चित्त वाले ज्ञानी के लिए, जो सहज भाव से जीता है, न कोई मान है और न अपमान।

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श्लोक 18.25

सत्यापित

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा । इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न ॥ २५ ॥

यह कर्म देह ने किया है मुझ शुद्ध आत्मा ने नहीं—इस बोध में स्थित ज्ञानी कर्म करता हुआ भी अकर्ता रहता है।

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श्लोक 18.26

सत्यापित

अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः । जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ २६ ॥

अकर्ता होकर भी साधारणवत् कर्म करने वाला ज्ञानी मूर्ख नहीं होता; वह जीवन्मुक्त संसार में भी शोभित होता है।

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श्लोक 18.27

सत्यापित

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः । न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥

अनेक विचारों से थककर आत्मा में विश्राम पाया हुआ ज्ञानी न कल्पना करता है, न विषयों को देखता या सुनता है।

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श्लोक 18.28

सत्यापित

असमाधेरविक्षेपान् न मुमुक्षुर्न चेतरः । निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः ॥ २८ ॥

न समाधि न विक्षेप, न मुक्ति की चाह न बंधन; संसार को कल्पित जानकर ज्ञानी ब्रह्म होकर स्थित रहता है।

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श्लोक 18.29

सत्यापित

यस्यान्तः स्यादहङ्कारो न करोति करोति सः । निरहङ्कारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम् ॥ २९ ॥

जिसमें अहंकार है वह न करके भी कर्ता है; अहंकार-रहित ज्ञानी सब करके भी कुछ नहीं करता।

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श्लोक 18.30

सत्यापित

नोद्विग्नं न च सन्तुष्टमकर्तृ स्पन्दवर्जितम् । निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते ॥ ३० ॥

न उद्विग्न न संतुष्ट, अकर्ता, कंपन-रहित, आशारहित और संशय-मुक्त ज्ञानी का चित्त प्रकाशित रहता है।

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श्लोक 18.31

सत्यापित

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते । निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायति विचेष्टते ॥ ३१ ॥

जिसका चित्त ध्यान या कर्म में हठ से नहीं लगता, वह बिना निमित्त के ही सहज ध्यानस्थ और चेष्टावान रहता है।

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श्लोक 18.32

सत्यापित

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् । अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत् ॥ ३२ ॥

परम सत्य सुनकर मंदबुद्धि मूढ़ हो जाता है; जबकि ज्ञानी सरल और मूढ़वत् रहकर शांत हो जाता है।

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श्लोक 18.33

सत्यापित

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् । धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥

अज्ञानी एकाग्रता और निरोध का हठ करते हैं; ज्ञानी सुषुप्ति की तरह अपने आत्मपद में सहज स्थित रहते हैं।

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श्लोक 18.34

सत्यापित

अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम् । तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥

अज्ञानी प्रयत्न करे या न करे अशांत रहता है; ज्ञानी तत्त्व के निश्चय मात्र से परम शांत हो जाता है।

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श्लोक 18.35

सत्यापित

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम् । आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः ॥ ३५ ॥

शुद्ध, ज्ञानस्वरूप, प्रिय, पूर्ण और विकाररहित आत्मा को अभ्यास के हठ में उलझे लोग नहीं जान पाते।

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श्लोक 18.36

सत्यापित

नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा । धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥

अज्ञानी अभ्यासरूपी कर्म से मोक्ष नहीं पाता; धन्य पुरुष केवल आत्मज्ञान से मुक्त और निर्विकार रहता है।

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श्लोक 18.37

सत्यापित

मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति । अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥

अज्ञानी ब्रह्म बनने की इच्छा के कारण उसे नहीं पाता; ज्ञानी बिना इच्छा के भी परब्रह्मस्वरूप रहता है।

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श्लोक 18.38

सत्यापित

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः । एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ ३८ ॥

सहारे के लिए व्याकुल अज्ञानी संसार को पालते हैं; ज्ञानी इस अनर्थ की जड़ (अहंकार) को ही काट देते हैं।

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श्लोक 18.39

सत्यापित

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति । धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः ॥ ३९ ॥

अज्ञानी मन को शांत करने की इच्छा से अशांत रहता है; ज्ञानी तत्त्व का निश्चय करके सदा शांत रहता है।

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श्लोक 18.40

सत्यापित

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यो दृष्टमवलम्बते । धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ ४० ॥

दृश्य का सहारा लेने वाले को आत्मदर्शन नहीं होता; ज्ञानी दृश्य को नहीं बल्कि अविनाशी आत्मा को देखते हैं।

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श्लोक 18.41

सत्यापित

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै । स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिमः ॥ ४१ ॥

हठ करने वाले का निरोध सिद्ध नहीं होता; आत्म-रमण करने वाले ज्ञानी का निरोध सदा स्वाभाविक रहता है।

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श्लोक 18.42

सत्यापित

भावस्य भावकः कश्चिन् न किञ्चिद् भावकोऽपरः । उभयाभावकः कश्चिद् एवमेव निराकुलः ॥ ४२ ॥

कोई भाव सोचता है कोई शून्यता; दोनों से परे रहने वाला ज्ञानी ही सदा व्याकुलता-रहित रहता है।

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श्लोक 18.43

सत्यापित

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः । न तु जानन्ति संमोहाद् यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ ४३ ॥

अज्ञानी शुद्ध आत्मा की केवल कल्पना करते हैं पर जानते नहीं, और जीवनभर अशांत रहते हैं।

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श्लोक 18.44

सत्यापित

मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते । निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ ४४ ॥

साधक की बुद्धि सहारे के बिना नहीं टिकती; मुक्त पुरुष की बुद्धि सदा सहारा-मुक्त और निष्काम रहती है।

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श्लोक 18.45

सत्यापित

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः । विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्र्यसिद्धये ॥ ४५ ॥

विषय रूपी बाघों से डरकर शरणार्थी साधक एकाग्रता के लिए गुफाओं में छिपते हैं।

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श्लोक 18.46

सत्यापित

निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ ४६ ॥

वासनारहित ज्ञानी रूपी सिंह को देखकर विषय रूपी हाथी भाग जाते हैं या सेवक बन जाते हैं।

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श्लोक 18.47

सत्यापित

न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥

संशय-रहित ज्ञानी मुक्ति के नियमों में नहीं बँधता; वह खाता-पीता और देखता-सुनता हुआ भी सुख से रहता है।

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श्लोक 18.48

सत्यापित

वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः । नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥

आत्म-श्रवण मात्र से शुद्धबुद्धि ज्ञानी न आचार को देखता है न अनाचार को और न उदासीनता को।

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श्लोक 18.49

सत्यापित

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ह्यृजुः । शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥

सरल ज्ञानी सामने आए कार्य को सहजता से कर लेता है; उसकी चेष्टा बालक के समान निष्पाप होती है।

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श्लोक 18.50

सत्यापित

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् । स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात्परमं पदम् ॥ ५० ॥

आंतरिक स्वतंत्रता से ही सुख, परम तत्त्व, शांति और सर्वोच्च पद की प्राप्ति होती है।

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श्लोक 18.51

सत्यापित

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा । तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥

जब आत्मा को अकर्ता और अभोक्ता जान लिया जाता है, तब चित्त की समस्त वृत्तियाँ स्वतः शांत हो जाती हैं।

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श्लोक 18.52

सत्यापित

उच्छृङ्खलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते । न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा ॥ ५२ ॥

ज्ञानी की स्वाभाविक स्थिति स्वच्छंद होकर भी शोभा पाती है; अज्ञानी की वासना-भरी बनावटी शांति व्यर्थ है।

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श्लोक 18.53

सत्यापित

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगाह्वरान् । निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥

कल्पनाओं से मुक्त ज्ञानी चाहे बड़े भोगों में रहे या गुफाओं में, वह सदा बंधन-मुक्त रहता है।

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श्लोक 18.54

सत्यापित

श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम् । दृष्ट्वा संपूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥

देवता, तीर्थ, स्त्री या राजा को देखकर और पूजकर भी ज्ञानी के हृदय में तनिक भी वासना नहीं होती।

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श्लोक 18.55

सत्यापित

भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः । विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥

नौकरों, पुत्रों, पत्नी और संबंधियों द्वारा उपहास किए जाने पर भी ज्ञानी तनिक भी विचलित नहीं होता।

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श्लोक 18.56

सत्यापित

सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते । तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥

संतुष्ट दिखकर भी ज्ञानी संतुष्ट नहीं, खिन्न दिखकर भी दुखी नहीं; उसकी यह अद्भुत दशा ज्ञानी ही जानते हैं।

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श्लोक 18.57

सत्यापित

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ ५७ ॥

‘मुझे करना है’ का भाव ही संसार है; ज्ञानी कर्तव्यता को नहीं देखते, वे निराकार और निर्विकार हैं।

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श्लोक 18.58

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अकुर्वन्नपि संक्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः । कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः ॥ ५८ ॥

अज्ञानी खाली बैठकर भी बेचैन रहता है; कुशल ज्ञानी सारे काम करता हुआ भी सदा शांत रहता है।

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श्लोक 18.59

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सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च । सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः ॥ ५९ ॥

शांत बुद्धि वाला ज्ञानी सुख से बैठता, सोता, चलता, बोलता और खाता है; वह हर व्यवहार में सुखी रहता है।

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श्लोक 18.60

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स्वभावाद्यस्य नैवार्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः । महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते ॥ ६० ॥

संसार में व्यवहार करते हुए भी जो संताप-मुक्त रहता है, वह विशाल सरोवर की तरह अक्षोभ्य ज्ञानी शोभा पाता है।

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श्लोक 18.61

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मूढस्य निवृत्तिरपि प्रवृत्तिरेव जायते । प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी ॥ ६१ ॥

अज्ञानी का कर्मत्याग भी कर्म बन जाता है; ज्ञानी का कर्म भी परम शांति और मुक्ति का फल देता है।

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श्लोक 18.62

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परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते । देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता ॥ ६२ ॥

वस्तुओं का वैराग्य अज्ञानियों में होता है; जिसकी देह-आसक्ति गल गई, उसके लिए न राग है न वैराग्य।

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श्लोक 18.63

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भावनाऽभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा । भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ ६३ ॥

अज्ञानी भाव और अभाव में उलझा रहता है; आत्मा में स्थित ज्ञानी की दृष्टि इन दोनों से परे शुद्ध साक्षी रहती है।

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श्लोक 18.64

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सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनिः । न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ ६४ ॥

बालक की तरह निष्काम भाव से जीने वाले शुद्ध ज्ञानी पर कर्म करने पर भी कोई लेप नहीं चढ़ता।

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श्लोक 18.65

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स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ ६५ ॥

इंद्रियों के सारे व्यवहार करते हुए भी जो तृष्णा-मुक्त और सम रहता है, वही आत्मज्ञानी धन्य है।

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श्लोक 18.66

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क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम् । आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ ६६ ॥

आकाश की तरह निर्विकल्प ज्ञानी के लिए न संसार है, न आभास, न साध्य और न कोई साधन।

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श्लोक 18.67

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स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः । अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते ॥ ६७ ॥

सच्चा संन्यासी वही विजयी है जो आत्मानंद का विग्रह है और जिसकी अखंड ब्रह्म में सहज समाधि है।

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श्लोक 18.68

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बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः । भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ ६८ ॥

बहुत कहने से क्या लाभ; तत्त्वज्ञानी महापुरुष न भोग चाहता है न मोक्ष, वह सदा अनासक्त रहता है।

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श्लोक 18.69

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महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् । विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ ६९ ॥

यह सारा द्वैत जगत केवल नाममात्र का विस्तार है; शुद्ध ज्ञानस्वरूप के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।

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श्लोक 18.70

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भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी । अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ ७० ॥

सब कुछ भ्रम है और कुछ भी नहीं—इस निश्चय से शुद्ध ज्ञानी स्वभाव से ही शांत हो जाता है।

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श्लोक 18.71

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शुद्धस्फुरणरूपस्य विदुषः क्व विधीयते । वैराग्यं क्व च वा त्यागः क्व च वा शमहेतुकम् ॥ ७१ ॥

शुद्ध प्रकाश रूप ज्ञानी के लिए न विधि है, न वैराग्य, न त्याग और न शांति का कोई साधन।

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श्लोक 18.72

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स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः । क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता ॥ ७२ ॥

अनंत रूप से प्रकाशित और प्रकृति को न देखने वाले के लिए कहाँ बंधन, कहाँ मोक्ष, कहाँ हर्ष और कहाँ शोक?

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श्लोक 18.73

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बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते । निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः ॥ ७३ ॥

बुद्धि तक फैला संसार केवल माया का खेल है; निर्मम, निरहंकार और निष्काम ज्ञानी शोभा पाता है।

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श्लोक 18.74

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अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः । क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा ॥ ७४ ॥

अविनाशी और संताप-रहित आत्मा को देखने वाले के लिए न विश्व है, न देह, न विद्या और न ‘मैं-मेरा’।

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श्लोक 18.75

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निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि । मनोरथान् प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ॥ ७५ ॥

यदि अज्ञानी हठ से साधना छोड़ दे, तो वह तुरंत ख्याली पुलाव और व्यर्थ प्रलाप में भटक जाता है।

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श्लोक 18.76

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मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम् । निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ ७६ ॥

मंदबुद्धि सत्य सुनकर भी अज्ञान नहीं छोड़ता; वह बाहर से निर्विकल्प बनता है पर भीतर से लालची रहता है।

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श्लोक 18.77

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ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत् । नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७ ॥

ज्ञान से जिसके कर्म गल गए, वह कर्म करता हुआ भी अकर्ता रहता है और उसके पास कहने को कुछ नहीं बचता।

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श्लोक 18.78

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क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन । निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥

निर्विकार और सदा निर्भय ज्ञानी के लिए न अंधकार है न प्रकाश, और न किसी वस्तु की हानि।

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श्लोक 18.79

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क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा । अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ ७९ ॥

अनिर्वचनीय और उपाधि-रहित योगी के लिए न धैर्य है, न विवेक और न निर्भयता; वह शब्दों से परे है।

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श्लोक 18.80

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न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि । बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किञ्चन ॥ ८० ॥

न स्वर्ग है न नरक, और न जीवन्मुक्ति; तत्त्व-दृष्टि से वास्तव में कुछ भी नहीं है।

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श्लोक 18.81

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नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति । धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ ८१ ॥

ज्ञानी न लाभ चाहता है न हानि पर शोक करता है; उसका चित्त आत्मानंद के अमृत से सदा शीतल रहता है।

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श्लोक 18.82

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न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति । समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित् कृत्यं न पश्यति ॥ ८२ ॥

निष्काम ज्ञानी न शांत की स्तुति करता है न दुष्ट की निंदा; सुख-दुख में सम वह कोई कर्तव्य नहीं देखता।

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श्लोक 18.83

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धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति । हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति ॥ ८३ ॥

ज्ञानी न संसार से द्वेष करता है न आत्मा को ढूँढता है; हर्ष-क्रोध से मुक्त वह जीवन और मृत्यु के पार है।

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श्लोक 18.84

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निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च । निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः ॥ ८४ ॥

परिवार में मोह-मुक्त, विषयों में निष्काम और शरीर के प्रति भी निश्चिंत ज्ञानी परम शोभा पाता है।

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श्लोक 18.85

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तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः । स्वच्छन्दं चरतो देशान्यत्रास्तमितशायिनः ॥ ८५ ॥

जो मिले उसी में संतुष्ट ज्ञानी स्वतंत्र विचरता है और जहाँ शाम हो जाए वहीं सो जाता है।

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श्लोक 18.86

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पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः । स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥ ८६ ॥

शरीर गिरे या रहे महात्मा को कोई चिंता नहीं; अपने स्वरूप में विश्राम पाकर वह संसार को भूल चुका है।

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श्लोक 18.87

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अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः । असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः ॥ ८७ ॥

संग्रह-रहित, द्वंद्वातीत और संशय-मुक्त ज्ञानी सबमें अनासक्त होकर अपनी आत्मा में ही रमण करता है।

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श्लोक 18.88

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निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥

ममता-रहित, मिट्टी और सोने को समान जानने वाला, हृदय-ग्रंथि से मुक्त ज्ञानी परम सुशोभित होता है।

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श्लोक 18.89

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सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि । मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥

संसार में उदासीन और वासना-रहित उस पूर्ण तृप्त मुक्त पुरुष की तुलना किससे की जा सकती है?

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श्लोक 18.90

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जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति । ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥

जानकर भी न जानने वाला, देखकर भी न देखने वाला, वासना-मुक्त ज्ञानी के सिवा और कौन हो सकता है?

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श्लोक 18.91

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भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते । भावेषु गलिता यस्य शोभनाऽशोभना मतिः ॥ ९१ ॥

भिखारी हो या राजा, जो निष्काम है वही शोभा पाता है; जिसकी अच्छे-बुरे की बुद्धि गल चुकी है।

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श्लोक 18.92

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क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः । निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥

निष्कपट और कृतकृत्य योगी के लिए न स्वच्छंदता है, न संकोच और न तत्त्व का कोई अलग निश्चय।

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श्लोक 18.93

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आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना । अन्तर्यदनुभूयेत तत् कथं कस्य कथ्यते ॥ ९३ ॥

आत्म-विश्रांति से तृप्त और संताप-मुक्त ज्ञानी का आंतरिक अनुभव कैसे और किसको कहा जा सकता है?

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श्लोक 18.94

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सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च । जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ ९४ ॥

सोकर भी न सोने वाला, जागकर भी न जागने वाला ज्ञानी हर अवस्था में अपनी आत्मा में पूर्ण तृप्त रहता है।

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श्लोक 18.95

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ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः । सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहंकारोऽनहंकृतिः ॥ ९५ ॥

ज्ञानी सोचता हुआ भी निश्चिंत है, इंद्रियों में रहकर भी निरिंद्रिय है, और ‘मैं’ कहकर भी अहंकार-शून्य है।

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श्लोक 18.96

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न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान् । न मुमुक्षुर्न वा मुक्ता न किञ्चिन्न च किञ्चन ॥ ९६ ॥

न सुखी न दुखी, न विरक्त न आसक्त, न मुमुक्षु न मुक्त; ज्ञानी समस्त शब्दों और विकल्पों से परे है।

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श्लोक 18.97

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विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान् । जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः ॥ ९७ ॥

विक्षेप में शांत, समाधि में अभिमान-मुक्त, जड़ता में चैतन्य और पांडित्य में अहंकार-रहित ज्ञानी धन्य है।

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श्लोक 18.98

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मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः । समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ९८ ॥

परिस्थिति में शांत, कर्तव्य-मुक्त और तृष्णा-रहित ज्ञानी किए या न किए कर्मों की कोई चिंता नहीं रखता।

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श्लोक 18.99

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न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति । नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ ९९ ॥

पूजा करने पर प्रसन्न न होने वाला, निंदा पर क्रोध न करने वाला, मौत से न डरने वाला ज्ञानी ही मुक्त है।

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श्लोक 18.100

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न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः । यथातथा यत्रतत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १०० ॥

शांत बुद्धि वाला ज्ञानी न भीड़ में भागता है न जंगल में; जहाँ जैसे भी हो, सदा समभाव में स्थित रहता है।

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अध्याय का सरल सार

अठारहवें प्रकरण में अष्टावक्र जीवन की सबसे गहरी शांति (उपशम) का रहस्य खोलते हैं। वे बताते हैं कि इंसान इसलिए दुखी नहीं है कि उसके पास कुछ कम है, बल्कि इसलिए दुखी है क्योंकि उसने अपने सिर पर जिम्मेदारियों और कर्तापन का भारी बोझ उठा रखा है। जब यह समझ आ जाता है कि आत्मा पहले से ही पूर्ण और शांत है, तो सारे मानसिक संघर्ष समाप्त हो जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति सूखे पत्ते की तरह जीता है—हवा जहाँ ले जाए, वहीं सहज रहता है। वह न काम से भागता है और न काम में उलझता है; वह अपनी नित्य शांति में आनंदित रहता है।

पाँच प्रमुख शिक्षाएँ

  1. संसार के सारे संग्रह और भोग कर लेने पर भी बिना आंतरिक त्याग के सच्ची शांति नहीं मिल सकती। (18.2, 18.3)
  2. आत्मा कोई दूर का लक्ष्य नहीं जिसे हठपूर्वक पाया जाए; वह सदा से प्राप्त, निर्विकल्प और निरायास है। (18.4, 18.5, 18.6)
  3. जब सब कुछ आत्मा ही सिद्ध हो गया, तो 'मैं यह हूँ और यह नहीं हूँ' के सारे विकल्प शांत होकर परम मौन फलित होता है। (18.7, 18.8, 18.9, 18.10)
  4. जीवन्मुक्त पुरुष के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता; वह बिना किसी मानसिक आग्रह के सहज जीवन जीता है। (18.12, 18.13, 18.14, 18.17)
  5. ज्ञानी न प्रवृत्ति में अड़ता है न निवृत्ति में; वह सूखे पत्ते की तरह प्रारब्ध के प्रवाह में अनासक्त होकर विचरण करता है। (18.20, 18.21)

सामान्य गलतफहमियाँ

  • ‘शुष्कपर्णवत्’ का अर्थ दिशाहीन या गैर-जिम्मेदार हो जाना नहीं है; यह आंतरिक अहंकार और कर्तापन की समाप्ति का प्रतीक है।
  • ‘कर्तव्य-दुःख’ का अर्थ अपने परिवार या कार्य के दायित्वों को छोड़ देना नहीं है; यह उन दायित्वों से उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव से मुक्ति है।
  • ‘तूष्णीम्’ का अर्थ गूँगा हो जाना नहीं है; यह अंतःकरण के संशयों और द्वंद्वों का मौन है।
  • ‘प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ दुर्ग्रहो न’ का अर्थ अनैतिक कर्मों में लिप्त होना नहीं है; यह धर्मसम्मत सहज आचरण की समता है।

आत्मचिंतन प्रश्न

  1. क्या मैं अपने कर्तव्यों को एक भारी बोझ मानकर दिन-रात मानसिक तनाव की आग में जल रहा हूँ?
  2. क्या मेरे अंदर जीवन की हर परिस्थिति को अपने मनमुताबिक चलाने की हठधर्मिता है?
  3. क्या मैं दिन में कुछ समय बिना किसी योजना, चिंता या फोन के पूरी तरह शांत बैठ सकता हूँ?
  4. क्या मैं अपने किए गए अच्छे कार्यों का श्रेय लेने के लिए दूसरों की प्रशंसा का मोहताज रहता हूँ?
  5. क्या मैं सूखे पत्ते की तरह जीवन के उतार-चढ़ाव को बिना किसी कड़वाहट के स्वीकार कर पा रहा हूँ?

संक्षिप्त चिंतन अभ्यास

दिन के किसी शांत समय 5 मिनट बैठें। कल्पना करें कि आप एक सूखा पत्ता हैं जो एक शांत नदी की सतह पर बह रहा है। नदी जहाँ ले जाए, आप वहीं बिना किसी प्रतिरोध के बहते जा रहे हैं। कोई बोझ नहीं, कोई संघर्ष नहीं। केवल शांत अस्तित्व।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अठारहवें प्रकरण को 'उपशम प्रकरण' क्यों कहा जाता है?

'उपशम' का अर्थ है परम शांति। इस प्रकरण में मन के सारे द्वंद्व, कर्तव्य का तनाव, समाधि का हठ और कर्तृत्व का अहंकार पूरी तरह शांत हो जाते हैं, इसलिए इसे उपशम प्रकरण कहा जाता है।

श्लोक 18.3 में 'कर्तव्यदुःखमार्तण्ड' से क्या आशय है?

इंसान दिन-रात 'मुझे यह करना है, वह करना है' के मानसिक दबाव (कर्तव्य) के सूर्य की तीखी धूप में जलता रहता है। अष्टावक्र कहते हैं कि इस जलन को केवल आत्म-शांति रूपी अमृत ही शांत कर सकता है।

श्लोक 18.21 में 'सूखे पत्ते' (शुष्कपर्णवत्) का क्या आध्यात्मिक अर्थ है?

सूखा पत्ता हवा के रुख से कोई शिकायत नहीं करता; वह हवा के साथ सहजता से उड़ता है। इसी प्रकार ज्ञानी अपने प्रारब्ध से जो परिस्थिति सामने आ जाए, उसमें बिना किसी विरोध या अहंकार के सहज रहता है।

क्या 100 श्लोकों का यह प्रकरण केवल संन्यासियों के लिए है?

नहीं। यह राजा जनक को सुनाया गया उपदेश है जो एक विशाल राज्य चला रहे थे। यह सिखाता है कि बड़े से बड़े सांसारिक दायित्वों के बीच भी मन को कैसे पूर्णतः शांत और अकर्ता रखा जा सकता है।

श्लोक 18.10 में 'उपशांत योगी' के क्या लक्षण हैं?

उपशांत योगी के लिए न कोई मानसिक विक्षेप है और न एकाग्रता का हठ; न कोई अति-ज्ञान का घमंड है और न मूढ़ता; वह सुख और दुख दोनों के पार अपनी अखंड शांति में स्थित रहता है।