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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ६६/१००66%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.66

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम् । आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ ६६ ॥

IAST लिप्यंतरण

kva saṃsāraḥ kva cābhāsaḥ kva sādhyaṃ kva ca sādhanam | ākāśasyeva dhīrasya nirvikalpasya sarvadā || 66 ||

सरल उच्चारण: kva samsaarah kva chaabhaasah kva saadhyam kva cha saadhanam aakaashasyeva dheerasya nirvikalpasya sarvadaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, संसारः, क्व, च, आभासः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, आकाशस्य, इव, धीरस्य, निर्विकल्पस्य, सर्वदा

आकाशस्य इव धीरस्य
आकाश के समान व्यापक और निर्लेप धीर ज्ञानी के लिए
सर्वदा निर्विकल्पस्य
जो सदा समस्त विकल्पों से रहित है
संसारः क्व
संसार कहाँ है?
आभासः च क्व
और संसार का आभास कहाँ है?
साध्यम् क्व च साधनम् क्व
और उसके लिए साध्य (लक्ष्य) कहाँ है और साधन कहाँ है?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

आकाश के समान सर्वव्यापी, निर्लेप और सदा विकल्प-रहित ज्ञानी के लिए संसार कहाँ? उसका आभास कहाँ? साध्य कहाँ और साधन कहाँ? (सब कुछ विलीन हो चुका है)।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अद्वैत स्थिति की पूर्णता का उद्घोष है। आकाश में करोड़ों बादल आते हैं, बिजलियाँ चमकती हैं और धूल उड़ती है, किंतु आकाश में न कोई दाग लगता है और न कोई रास्ता बनता है। इसी प्रकार, जो ज्ञानी आकाश की तरह निर्विकल्प हो चुका है, उसकी दृष्टि में संसार, संसार का भ्रम, साधना और मोक्ष का लक्ष्य—ये सब विकल्प समाप्त हो जाते हैं। जब एक अद्वितीय आत्मा ही सब कुछ है, तो किससे मुक्ति पाना और किस साधन से पाना? सब कुछ शांत हो जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

आसमान में कभी धूल उड़ती है, कभी बारिश होती है और कभी इंद्रधनुष बनता है। लेकिन क्या आसमान कभी गंदा होता है या भीगता है? बिल्कुल नहीं।

ज्ञानी व्यक्ति का अंतःकरण भी उस नीले आसमान की तरह असीम और साफ़ हो जाता है।

उसके लिए अब न कोई दुनिया का बंधन है, न कोई भ्रम, न कोई पूजा-पाठ की मजबूरी और न कोई लक्ष्य पाने की दौड़। वह जानता है कि वह पहले से ही सब कुछ है। उसका सारा संघर्ष हमेशा के लिए खत्म हो चुका है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. आकाशस्येव धीरस्य आत्मा के असंग, निर्लेप और सर्वव्यापी स्वभाव का वैदिक उपमान है। 2. निर्विकल्पस्य सर्वदा समस्त मानसिक द्वंद्वों और भेदों के आत्यंतिक बाध को सूचित करता है। 3. क्व साध्यं क्व च साधनम् अद्वैत ज्ञान की पराकाष्ठा है जहाँ साध्य-साधन भाव समाप्त हो जाता है (अजातवाद)। 4. क्व संसारः क्व चाभासः यह सिद्ध करता है कि ज्ञानी की दृष्टि में माया का अस्तित्व ही नहीं रहता। 5. साधक को साधना की सीमाओं से ऊपर उठाकर नित्य-सिद्ध पूर्णता का साक्षात्कार कराता है।

उदाहरण से समझें: जैसे जाग जाने पर स्वप्न का देश, स्वप्न की यात्रा और स्वप्न की मंजिल सब एक साथ गायब हो जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर संसार और साधन सब विलीन हो जाते हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी वीडियो गेम को पूरा जीतकर गेम बंद कर देते हैं, तो गेम के सारे लेवल्स, पॉइंट्स और दुश्मन एक झटके में शून्य हो जाते हैं; ज्ञानी के लिए संसार का खेल ऐसे ही शांत हो जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: साधना और लक्ष्यों की दौड़ से ऊपर उठिए; यह पहचानिए कि आप आकाश की तरह विशाल, निर्लेप और सदा पूर्ण हैं।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘क्व साधनम्’ का अर्थ साधना शुरू करने से पहले ही सब छोड़ देना नहीं है; यह सिद्धावस्था की विश्रांति का वर्णन है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में लक्ष्यों और योजनाओं का बहुत तनाव हो, तो 2 मिनट खुले आसमान को देखें और कहें: "मैं आकाश की तरह असीम और बंधन-मुक्त हूँ।" (तनाव के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं मोक्ष पाने के साधनों में इतना उलझ गया हूँ कि अपनी सहज और नित्य आकाश-जैसी पूर्णता को भूल गया हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझमें कोई सीमा नहीं, कोई लक्ष्य नहीं; मैं आकाश की तरह असीम, निर्विकल्प और अखंड चैतन्य हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: आकाश की तरह निर्विकल्प ज्ञानी के लिए न संसार है, न आभास, न साध्य और न कोई साधन।

English

Translation: Where is worldly existence, where is illusion, where is the goal and where the means, for the steadfast one who is ever unconditioned like space?

Simple explanation: Where is worldly delusion, where is appearance, where is the goal and where the means, for the steadfast sage who abides ever unconditioned and vast like space?

विषय और संबंधित श्लोक

  • आकाशवत्-धीर
  • निर्विकल्प-स्थिति
  • साध्य-साधन-पार
  • अजातवाद
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.65: निस्तर्षमानसः।
  • श्लोक 18.67: स जयत्यर्थसंन्यासी।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 361–363 (PDF पृ. 368–370)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छियासठवाँ श्लोक।