भगवद्गीता २.४७
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana | mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo'stvakarmaṇi ||
Plain-English meaning
You have a right only to perform your duty; the fruits thereof are not your concern. Let not the fruit of action be your motive, nor let attachment to inaction take hold of you.
हिंदी भावार्थ
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। न तो कर्म के फल का कारण बनो, और न ही कर्म न करने में आसक्त हो।
श्रीकृष्ण यहाँ कर्म पर पूरा ध्यान देने और परिणाम की आसक्ति छोड़ने की शिक्षा देते हैं। यह निष्क्रियता नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण कर्म करते हुए फल को नियंत्रित करने के भ्रम से मुक्त होना है।
Research note and source
आधुनिक मनोविज्ञान में “nonattachment” को अनुभवों से चिपके बिना उनके साथ संतुलित ढंग से जुड़ने के रूप में अध्ययन किया जाता है। शोध में इसका बेहतर well-being और कम psychological distress से संबंध मिला है, लेकिन उपलब्ध प्रमाण मुख्यतः सहसंबंधात्मक हैं—यह गीता की शिक्षा का वैज्ञानिक सत्यापन या कारण-परिणाम का प्रमाण नहीं है।
Read the 2022 meta-analysis on PubMed