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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.65
सत्यापित
मूल संस्कृत
स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ ६५ ॥
IAST लिप्यंतरण
sa eva dhanya ātmajñaḥ sarvabhāveṣu yaḥ samaḥ | paśyañ chṛṇvan spṛśañ jighrann aśnan nistarṣamānasaḥ || 65 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
सः, एव, धन्यः, आत्मज्ञः, सर्व-भावेषु, यः, समः, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, निस्तर्ष-मानसः
- सः आत्मज्ञः एव धन्यः
- वही आत्मज्ञानी वास्तव में धन्य (सराहनीय) है
- यः सर्व-भावेषु समः
- जो जीवन की समस्त परिस्थितियों और पदार्थों में समभाव रहता है
- पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्
- देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ
- जिघ्रन् अश्नन्
- सूँघता हुआ और खाता हुआ
- निस्तर्ष-मानसः
- जिसका मन समस्त तृष्णा और प्यास से सर्वथा मुक्त है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
वही आत्मज्ञानी वास्तव में धन्य है जो समस्त परिस्थितियों में सम रहता है, और देखता, सुनता, छूता, सूँघता और खाता हुआ भी तृष्णा-रहित मन वाला रहता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह जीवनमुक्ति की सच्ची महिमा का गान है। सच्चा आत्मज्ञानी वह नहीं है जो संसार से आँखें मूँदकर भाग जाए, बल्कि वह है जो पाँचों इंद्रियों के व्यापार में रहते हुए भी भीतर से पूरी तरह तृष्णा-मुक्त (निस्तर्षमानसः) रहता है। जब आँखें देखती हैं तो उनमें लालच नहीं होता; जब कान सुनते हैं तो स्तुति-निंदा का असर नहीं होता; जब जीभ खाती है तो स्वाद की गुलामी नहीं होती। वह हर परिस्थिति में एकरस, सम और धन्य रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
क्या आपने कभी किसी ऐसे इंसान को देखा है जो स्वादिष्ट खाना खा रहा हो लेकिन खाने का कोई लालच न हो, अच्छी बात सुन रहा हो पर घमंड न हो, और बुरी बात पर गुस्सा न हो?
अष्टावक्र कहते हैं कि ऐसा इंसान इस धरती पर सबसे भाग्यशाली और धन्य है।
वह दुनिया के सारे रंगों को देखता है, हर आवाज़ सुनता है और खाना खाता है; लेकिन उसके मन में किसी चीज़ की कोई प्यास या भूख नहीं होती। वह अंदर से हमेशा पूरी तरह तृप्त रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. धन्यः आत्मज्ञः ज्ञानी के उस परम सौभाग्य की घोषणा है जो जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो गया। 2. सर्वभावेषु समः गीता के समत्व योग (२.४८ ‘समत्वं योग उच्यते’) की प्रत्यक्ष पराकाष्ठा है। 3. निस्तर्षमानसः तृष्णा के आत्यंतिक अभाव का सूचक है—तृष्णा ही सारे दुखों की जननी है। 4. इंद्रियों का उपयोग करते हुए भी उनसे अलिप्त रहना अद्वैत जीवनमुक्ति की पहचान है। 5. साधक को इंद्रियों के दमन के बदले आंतरिक तृप्ति और समता की साधना करने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे अमृत पी चुका व्यक्ति पानी की एक-एक बूँद के लिए नहीं तरसता, वैसे ही आत्म-रस पा चुका ज्ञानी विषयों के लिए तृष्णा नहीं करता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक व्यक्ति जो किसी भव्य दावत में सब कुछ स्वादिष्ट खाते हुए भी पेट भरते ही तुरंत रुक जाता है बिना किसी लालच के; ज्ञानी जीवन के हर अनुभव में ऐसा ही तृष्णा-मुक्त रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया के अनुभवों का आनंद लीजिए लेकिन उनकी तृष्णा के गुलाम मत बनिए; सच्चा ज्ञानी वही है जो हर हाल में सम और तृप्त रहता है।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘निस्तर्षमानसः’ का अर्थ जीवन से अरुचि पैदा कर लेना नहीं है; यह आंतरिक पूर्णता और शांति का मधुर फल है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब अपनी पसंदीदा चीज़ खाएँ या देखें, तो 1 मिनट शांत रहकर कहें: "मेरी आत्मा इस स्वाद से कहीं अधिक तृप्त और पूर्ण है।" (इंद्रिय-सुख में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जीवन की छोटी-छोटी चीज़ों की तृष्णा और लालच में अपनी आंतरिक समता और गरिमा खो बैठता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मेरी कोई अधूरी प्यास नहीं, कोई चाहत नहीं; मैं अपनी आत्मा में परिपूर्ण और धन्य हूँ।"
एक पंक्ति में सार: इंद्रियों के सारे व्यवहार करते हुए भी जो तृष्णा-मुक्त और सम रहता है, वही आत्मज्ञानी धन्य है।
English
Translation: Blessed indeed is that knower of the Self who remains equal in all states, with a mind free of craving while seeing, hearing, touching, smelling, and eating.
Simple explanation: Truly blessed is that knower of the Self who remains equanimous in all conditions, whose mind is utterly free of thirst while seeing, hearing, touching, smelling, and tasting.
विषय और संबंधित श्लोक
- धन्य-आत्मज्ञ
- निस्तर्ष-मानस
- सर्वभावेषु-सम
- इन्द्रिय-संयम-पार
- श्लोक 18.64: बालवन्मुनिः।
- श्लोक 18.66: क्व संसारः क्व चाभासः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पैंसठवाँ श्लोक।