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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.64
सत्यापित
मूल संस्कृत
सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनिः । न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ ६४ ॥
IAST लिप्यंतरण
sarvārambheṣu niṣkāmo yaś cared bālavan muniḥ | na lepas tasya śuddhasya kriyamāṇe'pi karmaṇi || 64 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
सर्व-आरम्भेषु, निष्कामः, यः, चरेत्, बालवत्, मुनिः, न, लेपः, तस्य, शुद्धस्य, क्रियमाणे, अपि, कर्मणि
- यः मुनिः
- जो मननशील ज्ञानी
- सर्व-आरम्भेषु निष्कामः
- समस्त कर्मों के आरंभ में पूर्णतः निष्काम होकर
- बालवत् चरेत्
- एक बालक के समान सहज विचरण करता है
- तस्य शुद्धस्य
- उस परम शुद्ध ज्ञानी को
- कर्मणि क्रियमाणे अपि
- कर्म किए जाने पर भी
- लेपः न
- तनिक भी कोई पाप-पुण्य का लेप (बंधन) नहीं होता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जो मुनि समस्त कर्मों में निष्काम होकर बालक के समान सहज विचरण करता है, उस शुद्ध अंतःकरण वाले को कर्म किए जाने पर भी तनिक भी कोई लेप (बंधन) नहीं होता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: कर्म मनुष्य को तब बाँधते हैं जब उनके पीछे कोई व्यक्तिगत कामना या स्वार्थ (सकाम भाव) होता है। जिस ज्ञानी के मन से समस्त कामनाएँ समाप्त हो चुकी हैं, वह जो भी कार्य करता है, वह एक छोटे बालक के खेल की तरह होता है। बालक जब रेत का घरौंदा बनाता है या तोड़ता है, तो उसके मन में कोई पाप-पुण्य या स्वार्थ नहीं होता। इसी प्रकार ज्ञानी भी सारे कार्य करता हुआ कमलपत्र की तरह सर्वथा निर्लेप रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब एक छोटा बच्चा पार्क में रेत का घर बनाता है, तो क्या वह उस घर को बेचने के लिए बनाता है? नहीं, वह सिर्फ खेल के मजे के लिए बनाता है।
ज्ञानी व्यक्ति का काम करना भी बिल्कुल वैसा ही खेल बन जाता है। उसके अंदर कोई निजी लालच या स्वार्थ नहीं होता।
वह दुनिया में घूमता है, ज़िम्मेदारियाँ निभाता है और काम करता है; लेकिन उसके मन पर कोई मैल या बोझ नहीं चढ़ता। वह हमेशा सोने की तरह शुद्ध और बेदाग रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. सर्वारम्भेषु निष्कामः गीता के ‘सर्वसमारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः’ (४.१९) का साक्षात क्रियान्वयन है। 2. बालवन्मुनिः ज्ञानी की उस निष्कपटता, सरलता और अहंकार-शून्यता का प्रतीक है जहाँ कर्तापन नहीं होता। 3. न लेपस्तस्य शुद्धस्य यह सिद्ध करता है कि आत्मा स्वभाव से असंग है; कर्म केवल देह और इंद्रियों को स्पर्श करते हैं। 4. कदापि पाप या पुण्य का बंधन ज्ञानी पर नहीं चढ़ता क्योंकि ज्ञान की अग्नि में समस्त संचित कर्म भस्म हो चुके हैं। 5. साधक को भयमुक्त होकर निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों को निभाने का मार्ग दिखाता है।
उदाहरण से समझें: जैसे पानी में तैरते हुए हंस के पंखों पर पानी की एक बूँद भी नहीं ठहरती, वैसे ही निष्काम ज्ञानी पर कर्मों का कोई लेप नहीं चढ़ता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक वॉलंटियर जो बिना किसी पैसे या पद के केवल सेवा के आनंद के लिए बाढ़ पीड़ितों की मदद करता है और काम पूरा होते ही चुपचाप चला जाता है; निष्काम मुनि संसार में ऐसे ही निर्लेप रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: काम को एक मासूम खेल की तरह कीजिए, फल का लालच छोड़िए; जब स्वार्थ नहीं होगा तो कोई काम आपको बाँध नहीं सकेगा।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘न लेपस्तस्य’ का अर्थ गलत काम करके दोषमुक्त मान लेना नहीं है; ज्ञानी का निष्काम अंतःकरण स्वाभाविक रूप से केवल लोक-कल्याणकारी कार्य ही करता है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज किसी की मदद बिना किसी उम्मीद या तारीफ़ के करें; काम पूरा होते ही उसे भूल जाएँ। (निःस्वार्थ सेवा में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने हर काम के पीछे किसी न किसी प्रशंसा या व्यक्तिगत लाभ की उम्मीद लगाकर बैठता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सारे कर्म प्रकृति की धूप-छाँव हैं; मैं नित्य शुद्ध, निर्लेप और निष्कलंक चैतन्य आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: बालक की तरह निष्काम भाव से जीने वाले शुद्ध ज्ञानी पर कर्म करने पर भी कोई लेप नहीं चढ़ता।
English
Translation: The sage who lives desireless in all undertakings, moving like a child, incurs no stain even while actions are being performed.
Simple explanation: The contemplative sage who moves through life free of desire in all undertakings, acting with the innocence of a child, incurs no karmic taint whatsoever even while actions are being performed.
विषय और संबंधित श्लोक
- बालवत्-मुनि
- निष्काम-आरम्भ
- निर्लेप-कर्म
- शुद्ध-स्वरूप
- श्लोक 18.63: स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी।
- श्लोक 18.65: स एव धन्य आत्मज्ञः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चौंसठवाँ श्लोक।