दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.63
सत्यापित
मूल संस्कृत
भावनाऽभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा । भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ ६३ ॥
IAST लिप्यंतरण
bhāvanā'bhāvanāsaktā dṛṣṭir mūḍhasya sarvadā | bhāvyabhāvanayā sā tu svasyāsdṛṣṭirūpiṇī || 63 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
भावना-अभावना-सक्ता, दृष्टिः, मूढस्य, सर्वदा, भाव्य-भावनया, सा, तु, स्वस्थस्य, अदृष्टि-रूपिणी
- मूढस्य दृष्टिः सर्वदा
- अज्ञानी की दृष्टि सदा ही
- भावना-अभावना-सक्ता
- किसी वस्तु के होने (भाव) अथवा न होने (अभाव) में आसक्त रहती है
- तु स्वस्थस्य सा दृष्टिः
- किंतु अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) ज्ञानी की वह दृष्टि
- भाव्य-भावनया
- चिंतनीय वस्तु और चिंतन की प्रक्रिया के पार होकर
- अदृष्टि-रूपिणी
- अदृष्टि-रूप (शुद्ध दृष्टा-स्वरूप) हो जाती है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अज्ञानी की दृष्टि सदा भाव या अभाव (संसार या शून्य) की कल्पना में उलझी रहती है; किंतु अपने आत्मस्वरूप में स्थित ज्ञानी की दृष्टि समस्त कल्पित भावों से परे होकर शुद्ध साक्षी बन जाती है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: अज्ञानी मनुष्य का मन हमेशा किसी न किसी विचार की पकड़ में रहता है। कभी वह सोचता है "यह वस्तु है, मुझे इसे पाना है" (भावना); कभी सोचता है "यह सब मिथ्या है, मुझे छोड़ना है" (अभावना)। वह इन दोनों विचारों के झूले में झूलता रहता है। इसके विपरीत, जो ज्ञानी अपने वास्तविक आत्मस्वरूप में स्वस्थ (स्व-स्थ = आत्मा में स्थित) हो चुका है, उसकी दृष्टि किसी भी विचार का रूप नहीं लेती। उसकी दृष्टि ‘अदृष्टि’ बन जाती है—अर्थात् केवल निर्विकल्प साक्षी चैतन्य।
सरल हिन्दी में समझें
एक चंचल बच्चा कभी खिलौना पकड़ता है और कभी उसे ज़मीन पर फेंक देता है; दोनों ही समय उसका ध्यान खिलौने पर ही लगा रहता है।
अज्ञानी व्यक्ति भी मन में कभी दुनिया के सुखों के बारे में सोचता है और कभी सब कुछ छोड़ने के बारे में। उसका दिमाग कभी खाली नहीं होता।
लेकिन जो इंसान अपनी आत्मा में टिक चुका है, वह सोचने और न सोचने दोनों के झगड़े से बाहर निकल आता है। उसकी आँखें खुली होती हैं पर अंदर कोई विचार नहीं होता। वह बिल्कुल शांत रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. भावना-अभावना-सक्ता द्वैत के मनोवैज्ञानिक ध्रुवों (affirmation and negation) की आसक्ति को व्यक्त करता है। 2. स्वस्थस्य शब्द का मूल अर्थ ‘स्वस्मिन् तिष्ठति इति स्वस्थः’—जो अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित है। 3. अदृष्टिरूपिणी दृष्टा, दृश्य और दर्शन की त्रिपुटी के लय की पराकाष्ठा है। 4. भाव्यभावनया चिंतन के विषय और चिंतन की क्रिया दोनों के अतिक्रमण को सिद्ध करता है। 5. यह साधक को विचारों के चक्रव्यूह से निकलकर शुद्ध अवस्थान में प्रवेश करने की दिशा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे आईना सामने रखी वस्तु का कोई विचार नहीं करता, वह केवल अछूता प्रकाशक रहता है, वैसे ही ज्ञानी की दृष्टि किसी विचार में उलझे बिना केवल साक्षी रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कैमरे का लेंस जब किसी वस्तु पर फोकस करके तस्वीर खींचता है तो वह केवल एक फ्रेम है; लेकिन खुला आकाश बिना किसी लेंस के सब कुछ अपने में समेटे रहता है; ज्ञानी की दृष्टि आकाश जैसी होती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: होने और न होने के विचारों में मत उलझिए; अपनी आत्मा में विश्राम लीजिए, वहाँ न कोई सोच है न कोई संशय।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘अदृष्टिरूपिणी’ का अर्थ आँखों से देखना बंद कर देना नहीं है; यह मानसिक पूर्वाग्रहों और कल्पित विचारों से मुक्ति की स्थिति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब मन किसी बात के पक्ष या विपक्ष में बहुत तर्क करने लगे, तो कहें: "मैं विचारों से परे शुद्ध देखने वाला साक्षी हूँ।" (तर्कों के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरा मन हमेशा चीज़ों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के तनाव में उलझा रहता है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर आँखों को खुला रखें लेकिन किसी भी वस्तु पर ध्यान केंद्रित न करें; केवल व्यापक और शांत दृष्टा-भाव में रहें।
एक पंक्ति में सार: अज्ञानी भाव और अभाव में उलझा रहता है; आत्मा में स्थित ज्ञानी की दृष्टि इन दोनों से परे शुद्ध साक्षी रहती है।
English
Translation: The vision of the fool is ever caught in thinking or non-thinking; but the vision of the one established in Self transcends all concepts, abiding as pure awareness.
Simple explanation: The perception of the deluded is perpetually obsessed with affirming or negating; whereas the awareness of the sage firmly established in the Self transcends all objects of thought, abiding as pure unconditioned sight.
विषय और संबंधित श्लोक
- स्वस्थ-स्थिति
- अदृष्टि-रूपिणी
- भावाभाव-पार
- त्रिपुटी-लय
- श्लोक 18.62: क्व रागः क्व विरागता।
- श्लोक 18.64: सर्वारम्भेषु निष्कामो।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तिरसठवाँ श्लोक।