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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ६२/१००62%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.62

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते । देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता ॥ ६२ ॥

IAST लिप्यंतरण

parigraheṣu vairāgyaṃ prāyo mūḍhasya dṛśyate | dehe vigalitāśasya kva rāgaḥ kva virāgatā || 62 ||

सरल उच्चारण: parigraheshu vairaagyam praayo moodhasya drishyate dehe vigalitaashasya kva raagah kva viraagataa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

परिग्रहेषु, वैराग्यम्, प्रायः, मूढस्य, दृश्यते, देहे, विगलित-आशस्य, क्व, रागः, क्व, विरागता

परिग्रहेषु वैराग्यम्
बाहरी वस्तुओं (धन, वस्त्र, मकान) के त्याग का वैराग्य
प्रायः मूढस्य दृश्यते
प्रायः अज्ञानी साधकों में ही देखा जाता है
देहे विगलित-आशस्य
जिसकी अपने शरीर से ही सारी आसक्ति और आशा गल चुकी है
क्व रागः क्व विरागता
उसके लिए कहाँ राग और कहाँ वैराग्य? दोनों समाप्त हो जाते हैं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

बाह्य वस्तुओं के प्रति वैराग्य प्रायः अज्ञानी साधकों में देखा जाता है; किंतु जिसकी अपने शरीर के प्रति ही समस्त आशा और आसक्ति गल चुकी है, उसके लिए न कोई राग है और न कोई वैराग्य।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधारण साधक बाहरी वस्तुओं (परिग्रह)—जैसे धन, घर, वस्त्र या परिवार—को छोड़ने की बड़ी भारी साधना करता है और अपने को "वैरागी" मानकर घमंड करता है। किंतु अष्टावक्र कहते हैं कि असली बंधन बाह्य वस्तुओं में नहीं, इस शरीर के प्रति ममता में है। जब तक शरीर को "मैं" माना जा रहा है, तब तक बाहरी त्याग अधूरा है। जिस ज्ञानी की अपने ही शरीर से सारी आशा छूट गई है, उसके लिए न संसार से राग बचता है और न वैराग्य का कोई अलग आग्रह।

सरल हिन्दी में समझें

अगर किसी पेड़ की जड़ में दीमक लगी हो और कोई केवल पत्तों को छाँटने में लगा रहे, तो क्या पेड़ बचेगा? बिल्कुल नहीं।

बहुत से लोग घर-बार, पैसा और कपड़े छोड़कर जंगलों में चले जाते हैं और सोचते हैं कि वे बहुत बड़े त्यागी बन गए। लेकिन वे अपने शरीर की सेवा और शरीर के घमंड में वैसे ही फँसे रहते हैं।

ज्ञानी व्यक्ति को समझ आ जाता है कि यह शरीर भी तो एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। जब शरीर से ही उसका मोह छूट जाता है, तो बाहर की चीज़ों को छोड़ने या पकड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. परिग्रहेषु वैराग्यं बाह्य त्याग की सीमा को उजागर करता है—वस्तुओं का त्याग देहाध्यास को नहीं काट सकता। 2. देहे विगलिताशस्य अद्वैत वैराग्य का मूल बिंदु है—देहाभिमान का विसर्जन। 3. क्व रागः क्व विरागता द्वंद्व-मुक्ति की स्थिति है जहाँ वैराग्य का अहंकार भी शांत हो जाता है। 4. सच्चा वैराग्य किसी वस्तु से नफरत करना नहीं, बल्कि आत्मा में स्थित होकर सबमें अनासक्त होना है। 5. साधक को सतही दिखावे के त्याग से उठाकर आंतरिक आत्म-बोध की गहराई में ले जाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे कोई व्यक्ति फटे पुराने कपड़े फेंकने पर खुद को दानी नहीं मानता, वैसे ही शरीर से मुक्त ज्ञानी बाहरी वस्तुओं के त्याग का कोई घमंड नहीं करता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

सोशल मीडिया से डिजिटल डिटॉक्स का दिखावा करना जबकि मन हर समय दूसरों की राय से डरा रहे; असली डिटॉक्स स्क्रीन बंद करने में नहीं, दूसरों की राय से बेपरवाह होने में है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: बाहरी चीज़ों को छोड़ने का घमंड मत कीजिए; अपने शरीर के मोह को विदा कीजिए, राग और वैराग्य दोनों शांत हो जाएँगे।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। ‘देहे विगलिताशस्य’ का अर्थ शरीर को कष्ट देना या स्वास्थ्य की उपेक्षा करना नहीं है; यह देहाभिमान से मुक्ति का दार्शनिक स्तर है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब किसी चीज़ को छोड़ने का घमंड मन में आए, तो तुरंत सोचें: "असली त्याग अपनी अहंता को विदा करना है, वस्तु को फेंकना नहीं।" (त्याग के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं बाहरी चीज़ों को छोड़कर खुद को त्यागी मान रहा हूँ, जबकि मेरे अंदर शरीर और मान-सम्मान की पकड़ जस की तस है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "यह शरीर प्रकृति का एक वस्त्र है; मैं शरीर से परे अविनाशी, शुद्ध और निर्विकार आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: वस्तुओं का वैराग्य अज्ञानियों में होता है; जिसकी देह-आसक्ति गल गई, उसके लिए न राग है न वैराग्य।

English

Translation: Dispassion toward possessions is mostly seen in fools; for one whose longing for the body has dissolved, where is attachment and where is detachment?

Simple explanation: Renunciation toward external possessions is typically observed among the deluded; but for the sage whose attachment to his own physical frame has completely dissolved, where is craving and where is aversion?

विषय और संबंधित श्लोक

  • देहाध्यास-मुक्ति
  • सच्चा-वैराग्य
  • रागाविराग-पार
  • परिग्रह-त्याग-सीमा
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.61: प्रवृत्तिरपि धीरस्य।
  • श्लोक 18.63: भावनाभावनासक्ता।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 353–355 (PDF पृ. 360–362)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बासठवाँ श्लोक।