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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.61
सत्यापित
मूल संस्कृत
मूढस्य निवृत्तिरपि प्रवृत्तिरेव जायते । प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी ॥ ६१ ॥
IAST लिप्यंतरण
mūḍhasya nivṛttir api pravṛttir eva jāyate | pravṛttir api dhīrasya nivṛttiphalabhāginī || 61 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
मूढस्य, निवृत्तिः, अपि, प्रवृत्तिः, एव, जायते, प्रवृत्तिः, अपि, धीरस्य, निवृत्ति-फल-भागिनी
- मूढस्य निवृत्तिः अपि
- अज्ञानी का कर्म-त्याग (निवृत्ति) भी
- प्रवृत्तिः एव जायते
- मानसिक कर्म (प्रवृत्ति) ही बन जाता है
- धीरस्य प्रवृत्तिः अपि
- किंतु ज्ञानी का बाह्य कर्म (प्रवृत्ति) भी
- निवृत्ति-फल-भागिनी
- परम त्याग और शांति (निवृत्ति) का ही फल देने वाली होती है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अज्ञानी की निवृत्ति (कर्मत्याग) भी प्रवृत्ति (बंधनकारी कर्म) ही बन जाती है; किंतु धीर ज्ञानी की प्रवृत्ति भी पूर्ण निवृत्ति (मुक्ति) का ही फल देती है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह प्रवृत्ति और निवृत्ति का परम विवेक है। जब अज्ञानी सब कुछ छोड़कर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाता है, तो उसके मन में अहंकार रहता है कि "मैंने त्याग किया।" इस अहंकार और मन के चिंतन के कारण उसका त्याग भी एक नया कर्म (प्रवृत्ति) बन जाता है। दूसरी ओर, जब ज्ञानी संसार में रहकर राजा जनक की तरह शासन चलाता है या कोई कार्य करता है, तो उसके भीतर कर्तापन का लेश भी नहीं होता। इसलिए उसके कर्म भी नैष्कर्म्य-सिद्धि का ही फल देते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
अगर कोई इंसान कमरे में दरवाज़ा बंद करके बैठ जाए लेकिन दिनभर यह सोचता रहे कि "दुनिया कितनी खराब है और मैंने सब छोड़ दिया", तो क्या उसने सचमुच कुछ छोड़ा? नहीं, उसका दिमाग दिन-रात काम कर रहा है।
दूसरी तरफ, एक समझदार इंसान बाहर बाज़ार में घूमते हुए भी अपने अंदर इतनी शांति रखता है जैसे वह किसी वीरान रेगिस्तान में बैठा हो।
त्याग हाथ-पैर समेटने का नाम नहीं है, मन से कर्तापन निकालने का नाम है। ज्ञानी काम करते हुए भी त्यागी रहता है, और अज्ञानी त्याग करके भी बंधा रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. निवृत्तिरपि प्रवृत्तिरेव मानसिक संकल्पों और कर्तापन के अहंता-जन्य स्वरूप को उद्घाटित करता है। 2. प्रवृत्तिरपि निवृत्तिफला नैष्कर्म्य-सिद्धि और निष्काम कर्मयोग का सर्वोच्च शिखर है। 3. बंधन कर्म की क्रिया में नहीं, बल्कि कर्म के प्रति आंतरिक आसक्ति में होता है। 4. यह गीता के ‘कर्मण्यकर्म यः पश्येत्’ (४.१८) के सिद्धांत की प्रत्यक्ष अद्वैत सिद्धि है। 5. साधक को केवल बाह्य संन्यास के भ्रम से निकालकर आंतरिक असंगता में प्रतिष्ठित होने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे सपने में राजा बनने वाला सोता हुआ व्यक्ति कुछ न करके भी महलों में घूमता है, और जाग चुका अभिनेता राजा का रोल करके भी जानता है कि वह राजा नहीं है; वैसे ही ज्ञानी कर्म करके भी निवृत्त रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
ऑफिस से छुट्टी लेकर घर पर बैठे-बैठे भी दिनभर वर्क ईमेल चेक करते रहना अज्ञानी की निवृत्ति है; और काम के बीच भी गहरी सांस लेकर शांत रहना ज्ञानी की प्रवृत्ति है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: काम छोड़ने से नहीं, काम के घमंड को छोड़ने से शांति मिलती है; कर्म को पूरी लगन से कीजिए लेकिन कर्ता मत बनिए।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘निवृत्तिरपि प्रवृत्तिः’ का अर्थ संन्यास या साधना का अनादर करना नहीं है; यह केवल बाह्य त्याग के अहंकार की चेतावनी है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई काम न हो और खाली बैठे हों, तो मन की भागदौड़ पर नज़र रखें; अनुभव करें कि असली आराम मन के शांत होने में है। (खाली समय में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं केवल बाहर से काम छोड़ देने को ही त्याग मानकर मन ही मन अहंकार पाल रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "कर्म और अकर्म दोनों मन की अवस्थाएँ हैं; मैं नित्य अकर्ता और परम शांत साक्षी आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: अज्ञानी का कर्मत्याग भी कर्म बन जाता है; ज्ञानी का कर्म भी परम शांति और मुक्ति का फल देता है।
English
Translation: Even the renunciation of the fool turns into activity; while even the activity of the wise bears the fruit of total renunciation.
Simple explanation: Even the deliberate inaction of the foolish turns into binding mental activity; whereas even the outward activity of the steadfast sage yields the sublime fruit of total renunciation.
विषय और संबंधित श्लोक
- प्रवृत्ति-निवृत्ति-विवेक
- नैष्कर्म्य
- अहंकार-शून्यता
- सच्चा-त्याग
- श्लोक 18.60: महाह्रद इवाक्षोभ्यो।
- श्लोक 18.62: परिग्रहेषु वैराग्यं।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का इकसठवाँ श्लोक।