दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.60
सत्यापित
मूल संस्कृत
स्वभावाद्यस्य नैवार्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः । महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते ॥ ६० ॥
IAST लिप्यंतरण
svabhāvād yasya naivārtir lokavad vyavahāriṇaḥ | mahāhrada ivākṣobhyo gatakleśaḥ sa śobhate || 60 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
स्वभावात्, यस्य, न, एव, आर्तिः, लोकवत्, व्यवहारिणः, महा-ह्रदः, इव, अक्षोभ्यः, गत-क्लेशः, सः, शोभते
- लोकवत् व्यवहारिणः
- साधारण लोगों की तरह संसार में व्यवहार करते हुए भी
- यस्य स्वभावात् न एव आर्तिः
- जिसके स्वभाव में तनिक भी कोई पीड़ा या संताप नहीं होता
- सः गत-क्लेशः
- वह समस्त क्लेशों से मुक्त ज्ञानी
- महा-ह्रदः इव अक्षोभ्यः
- एक विशाल अथाह सरोवर (झील) के समान सर्वथा अक्षोभ्य होकर
- शोभते
- परम शोभा पाता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
साधारण मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए भी जिसके स्वभाव में तनिक भी पीड़ा या संताप नहीं होता, वह समस्त क्लेशों से मुक्त ज्ञानी एक विशाल अथाह सरोवर के समान अक्षोभ्य होकर सुशोभित होता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधारण मनुष्य जब संसार में काम करता है तो हर छोटी-बड़ी बात पर उसे पीड़ा, संताप और क्लेश (आर्ति) होता है। किंतु ज्ञानी बाहर से बिल्कुल आम आदमी की तरह सारे व्यवहार करता है, फिर भी उसके स्वभाव में कोई दुख या हलचल नहीं होती। वह एक गहरे और विशाल महासरोवर (महाह्रदः) की तरह होता है—जिसमें चाहे कंकड़ फेंके जाएँ या नदियाँ आकर गिरें, उसकी अगाध शांति कभी भंग नहीं होती। वह समस्त क्लेशों (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) से छूटकर शोभित होता है।
सरल हिन्दी में समझें
एक छोटे से गड्ढे में अगर एक पत्थर फेंक दिया जाए, तो सारा पानी उछलकर बाहर आ जाता है और कीचड़ फैल जाता है। लेकिन मानसरोवर जैसी विशाल झील में अगर कोई भारी पत्थर भी गिरे, तो क्या झील का पानी अशांत होता है? नहीं, वह अगाध शांत रहता है।
ज्ञानी व्यक्ति का दिल भी उस महा-सरोवर की तरह गहरा हो जाता है।
वह आम लोगों की तरह ही काम करता है, लेकिन ज़िंदगी के झटके उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। उसके सारे दुख-दर्द हमेशा के लिए खत्म हो चुके होते हैं। वह सदा शांत और गरिमामय रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. स्वभावात् न एव आर्तिः यह दिखाता है कि ज्ञानी का संताप-शून्य होना कोई अभ्यास नहीं, उसकी सहज प्रकृति बन चुकी है। 2. लोकवत् व्यवहारिणः संसार के साथ ज्ञानी के सहज और स्वाभाविक संबंध को प्रकट करता है—कोई पलायन नहीं। 3. महाह्रद इवाक्षोभ्यः अगाध आंतरिक शांति और स्थिरता का अमर उपमान है (गीता २.७० ‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठम्’)। 4. गतक्लेशः पतंजलि के पंच-क्लेशों (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) के आत्यंतिक विलय की घोषणा है। 5. साधक को मन को विशाल और गंभीर बनाकर जीवन की क्षुद्रताओं से अप्रभावित रहने का मार्ग दिखाता है।
उदाहरण से समझें: जैसे विशाल समुद्र में नदियाँ गिरती हैं पर समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, वैसे ही ज्ञानी के मन में घटनाएं घटती हैं पर उसकी शांति नहीं टूटती। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक बहुत बड़ा और गहरा शांत जहाज़ जो समुद्र के बड़े-बड़े तूफानों में भी बिना हिले-डुले तैरता रहता है; ज्ञानी का अंतःकरण जीवन के तूफानों में ऐसा ही अक्षोभ्य रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने मन को एक छोटे गड्ढे की तरह मत रखिए; उसे एक विशाल झील की तरह गहरा बनाइए जहाँ कोई कंकड़ अशांति न फैला सके।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘महाह्रद इवाक्षोभ्यः’ का अर्थ दूसरों के दुख के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है; यह अपनी आंतरिक शांति की स्थिरता है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई बात आपको बहुत परेशान करने लगे, तो मन में कहें: "मेरा मन एक विशाल गहरा सरोवर है; यह छोटी सी बात मुझे हिला नहीं सकती।" (परेशानी के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या छोटी-छोटी बातों पर मेरा पारा चढ़ जाता है क्योंकि मेरे मन में गहराई और विशालता की कमी है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मैं एक अथाह और शांत महा-सरोवर हूँ; सतह पर छोटी लहरें हैं लेकिन गहराई में अनंत और अखंड मौन है।"
एक पंक्ति में सार: संसार में व्यवहार करते हुए भी जो संताप-मुक्त रहता है, वह विशाल सरोवर की तरह अक्षोभ्य ज्ञानी शोभा पाता है।
English
Translation: Behaving like ordinary people yet by his very nature feeling no distress, undisturbed like a vast lake and free of all affliction, he shines gloriously.
Simple explanation: Conducting himself quite like ordinary worldly people yet by his very nature feeling no suffering whatsoever, undisturbed like a vast deep lake and freed from all afflictions, the sage shines in supreme majesty.
विषय और संबंधित श्लोक
- महाह्रद-उपमान
- अक्षोभ्य-चित्त
- गतक्लेश
- सहज-व्यवहार
- श्लोक 18.59: व्यवहारेऽपि शान्तधीः।
- श्लोक 18.61: निवृत्तिरपि न मूढस्य।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का साठवाँ श्लोक।