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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ५९/१००59%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.59

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च । सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः ॥ ५९ ॥

IAST लिप्यंतरण

sukham āste sukhaṃ śete sukham āyāti yāti ca | sukhaṃ vakti sukhaṃ bhuṅkte vyavahāre'pi śāntadhīḥ || 59 ||

सरल उच्चारण: sukham aaste sukham shete sukham aayaati yaati cha sukham vakti sukham bhungkte vyavahaarepi shaantadheeh (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

सुखम्, आस्ते, सुखम्, शेते, सुखम्, आयाति, याति, च, सुखम्, वक्ति, सुखम्, भुङ्क्ते, व्यवहारे, अपि, शान्त-धीः

शान्त-धीः
शांत बुद्धि वाला ज्ञानी पुरुष
सुखम् आस्ते सुखम् शेते
सुखपूर्वक बैठता है, सुखपूर्वक सोता है
सुखम् आयाति याति च
सुखपूर्वक आता है और जाता है
सुखम् वक्ति सुखम् भुङ्क्ते
सुखपूर्वक बोलता है और सुखपूर्वक भोजन करता है
व्यवहारे अपि
लौकिक व्यवहार करते हुए भी वह सदा सुख में ही रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

शांत बुद्धि वाला ज्ञानी सुखपूर्वक बैठता है, सुखपूर्वक सोता है, सुखपूर्वक आता-जाता है, सुखपूर्वक बोलता है और सुखपूर्वक खाता है; वह हर सांसारिक व्यवहार में भी सदा सुख में रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक जीवनमुक्ति के सहज और अखंड आनंद का मधुर गान है। संसारी मनुष्य बैठता है तो चिंता में, सोता है तो बुरे सपनों में, बोलता है तो कड़वाहट में, और खाता है तो हड़बड़ी में। किंतु जिस ज्ञानी की बुद्धि परमात्मा में शांत हो चुकी है (शान्तधीः), उसके जीवन की हर एक क्रिया आनंदमय हो जाती है। उठना, बैठना, चलना, बोलना और खाना—सब कुछ उसके लिए परमानंद का प्रवाह बन जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

ज़रा सोचिए कि कैसा अद्भुत जीवन होगा जब आपका हर पल केवल और केवल खुशी से भरा हो!

आप बैठें तो सुकून से, सोएँ तो मीठी नींद में, किसी से बात करें तो प्यार से, और खाना खाएँ तो तृप्ति के साथ। कोई भागदौड़ नहीं, कोई तनाव नहीं, कोई कड़वाहट नहीं।

ज्ञानी व्यक्ति का पूरा जीवन बिल्कुल ऐसा ही हो जाता है। वह दुनिया के सारे काम करता है, लेकिन उसका मन हर समय एक शांत और मीठे आनंद में तैरता रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. सुखम् शब्द का छह बार प्रयोग आत्म-आनंद की अखंडता और सर्वव्यापकता को सिद्ध करता है। 2. शान्तधीः चित्त के समस्त संशयों और विक्षेपों के शमन का द्योतक है। 3. व्यवहारेऽपि यह प्रमाणित करता है कि अद्वैत ज्ञान व्यवहार का विरोधी नहीं, बल्कि व्यवहार को ही आनंदमय बना देता है। 4. यह तैत्तिरीयोपनिषद् के ‘आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते... आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति’ का साक्षात जीवन है। 5. साधक को यह विश्वास दिलाता है कि अध्यात्म कोई उदासी का मार्ग नहीं, परम आनंद का उत्सव है।

उदाहरण से समझें: जैसे शीतल जल में तैरने वाली मछली जिस दिशा में भी जाए उसे केवल शीतलता और जल ही मिलता है, वैसे ही आत्मा में स्थित ज्ञानी को हर क्रिया में केवल सुख ही मिलता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी खूबसूरत छुट्टियों (वेकेशन) पर बिना किसी ईमेल या कॉल के केवल वर्तमान क्षण का आनंद लेते हुए टहलते हैं; ज्ञानी का हर एक दिन ऐसा ही आनंदमय और तनाव-मुक्त होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: ज़िंदगी को एक सज़ा मत बनाइए; आत्म-शांति में टिक जाइए, आपका बैठना, उठना, खाना और बोलना सब आनंद बन जाएगा।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘सुखमास्ते’ का अर्थ केवल शारीरिक ऐशो-आराम में डूबे रहना नहीं है; यह अंतःकरण की सहज और आध्यात्मिक तृप्ति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी बैठें, चलें या खाएँ, तो 10 सेकंड के लिए मुस्कुराकर कहें: "यह क्षण बहुत सुंदर और शांत है, मैं सुखी हूँ।" (दैनिक कार्यों में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने हर रोज़ के छोटे-छोटे पलों—जैसे खाने, चलने और सोने—को भी तनाव और जल्दबाज़ी में गँवा रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपनी अगली साँस को पूरे आनंद के साथ लें; अनुभव करें कि हर साँस के साथ आत्म-सुख आपके रोम-रोम में फैल रहा है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: शांत बुद्धि वाला ज्ञानी सुख से बैठता, सोता, चलता, बोलता और खाता है; वह हर व्यवहार में सुखी रहता है।

English

Translation: At ease he sits, at ease he sleeps, at ease he comes and goes; at ease he speaks, at ease he eats—established in peace even in daily life.

Simple explanation: In happiness he sits, in happiness he sleeps, in happiness he comes and goes; in happiness he speaks, in happiness he eats—ever established in peace even in practical life.

विषय और संबंधित श्लोक

  • सहज-सुख
  • शान्त-धी
  • व्यवहारे-आनन्द
  • अखंड-प्रसन्नता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.58: कुशलो हि निराकुलः।
  • श्लोक 18.60: स्वभावाद्यस्य नैवार्तिः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 347–349 (PDF पृ. 354–356)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का उनसठवाँ श्लोक।