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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.58
सत्यापित
मूल संस्कृत
अकुर्वन्नपि संक्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः । कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः ॥ ५८ ॥
IAST लिप्यंतरण
akurvann api saṃkṣobhād vyagraḥ sarvatra mūḍhadhīḥ | kurvann api tu kṛtyāni kuśalo hi nirākulaḥ || 58 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
अकुर्वन्, अपि, संक्षोभात्, व्यग्रः, सर्वत्र, मूढ-धीः, कुर्वन्, अपि, तु, कृत्यानि, कुशलः, हि, निराकुलः
- मूढ-धीः अकुर्वन् अपि
- मूढ़ बुद्धि वाला मनुष्य कुछ न करता हुआ भी
- संक्षोभात् सर्वत्र व्यग्रः
- मन के क्षोभ और चिंताओं के कारण हर जगह व्याकुल रहता है
- तु कुशलः कृत्यानि कुर्वन् अपि
- किंतु कुशल ज्ञानी कर्तव्य कर्मों को करता हुआ भी
- हि निराकुलः
- सर्वथा व्याकुलता-रहित और परम शांत रहता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अज्ञानी मनुष्य कुछ न करता हुआ भी मन के क्षोभ से हर समय व्याकुल रहता है; किंतु आत्म-कुशल ज्ञानी सारे कार्यों को करता हुआ भी सदा व्याकुलतारहित (शांत) रहता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक आलस्य और कर्मयोग के अंतर को साफ करता है। अज्ञानी सोचता है कि अगर वह काम करना छोड़ देगा तो शांत हो जाएगा। किंतु जब वह खाली बैठता है, तो उसका मन कल्पनाओं, चिंताओं और वासनाओं के क्षोभ से और ज़्यादा बेचैन हो जाता है। दूसरी ओर, जो ज्ञानी आत्मज्ञान में कुशल (सिद्ध) है, वह दिनभर सारे आवश्यक कर्मों को करता रहता है, फिर भी उसके मन में तनिक भी हलचल नहीं होती। वह कर्मों के बीच भी पूरी तरह शांत रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
कल्पना कीजिए कि एक आलसी इंसान दिनभर सोफे पर खाली बैठा है लेकिन उसका दिमाग दूसरों से जलने और चिंताओं में जल रहा है। क्या वह शांत है? नहीं, वह कुछ न करके भी बहुत परेशान है।
दूसरी तरफ, एक कुशल डॉक्टर या किसान दिनभर मेहनत से काम करता है लेकिन उसका मन बिल्कुल शांत और एकाग्र रहता है।
ज्ञानी व्यक्ति कर्मों से नहीं भागता। वह सारे काम कुशलता से पूरे करता है, लेकिन अपने अंदर कोई तनाव या घबराहट नहीं आने देता। वह काम करते हुए भी बिल्कुल शांत रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. अकुर्वन्नपि व्यग्रः यह सिद्ध करता है कि अशांति का कारण कर्म नहीं, बल्कि मन का क्षोभ और अज्ञान है। 2. कुशलः हि निराकुलः आत्मज्ञानी की उस परम कार्य-कुशलता (योगः कर्मसु कौशलम्) का प्रमाण है जहाँ कर्म विक्षेप नहीं बनता। 3. कर्म का त्याग संन्यास नहीं है, कर्तापन के क्षोभ का त्याग ही वास्तविक संन्यास है। 4. यह साधक को कर्म से भागने के आलस्य से बचाकर आंतरिक समता में प्रतिष्ठित होने का उपदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बंद कमरे में बैठा हुआ कैदी बेचैनी से छटपटाता है जबकि खुले मैदान में दौड़ने वाला खिलाड़ी आनंद में रहता है, वैसे ही अज्ञानी खाली रहकर भी बेचैन रहता है और ज्ञानी काम करके भी शांत रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
छुट्टी के दिन भी फोन की स्क्रीन स्क्रॉल करते हुए चिंता में डूबा रहने वाला व्यक्ति बनाम अस्पताल में व्यस्त रहकर भी मुस्कुराने वाली नर्स; शांति काम में नहीं, मन की अवस्था में होती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: काम से मत भागिए, मन के तनाव से भागिए; जब मन में शांति होगी तो बड़े से बड़ा काम भी खेल बन जाएगा।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘अकुर्वन्नपि व्यग्रः’ का अर्थ कर्मण्यता की निंदा नहीं है; यह कर्मत्याग के झूठे ढोंग की निरर्थकता का उद्घाटन है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब बहुत सारा काम एक साथ आ जाए, तो घबराने के बजाय कहें: "मैं एक-एक करके सब काम शांति से पूरा करूँगा, मैं अचल आत्मा हूँ।" (काम की व्यस्तता में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं काम न होने पर भी अपने ही विचारों के जाल में उलझकर बेचैन और थका हुआ महसूस करता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "शरीर कर्म कर रहा है, हाथ चल रहे हैं; लेकिन मेरी आत्मा के केंद्र में गहरी, अखंड और अचल शांति है।"
एक पंक्ति में सार: अज्ञानी खाली बैठकर भी बेचैन रहता है; कुशल ज्ञानी सारे काम करता हुआ भी सदा शांत रहता है।
English
Translation: Even when doing nothing, the foolish-minded is agitated everywhere by restlessness; but the skillful one remains undisturbed even while performing actions.
Simple explanation: Even when remaining physically inactive, the foolish person is agitated everywhere by inner turbulence; yet the truly skillful sage remains completely untroubled even while carrying out various tasks.
विषय और संबंधित श्लोक
- कुशल-ज्ञानी
- कर्म-अकर्म-विवेक
- निराकुलता
- संक्षोभ-मुक्ति
- श्लोक 18.57: कर्तव्यतैव संसारो।
- श्लोक 18.59: सुखमास्ते सुखं शेते।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अट्ठावनवाँ श्लोक।