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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.57
सत्यापित
मूल संस्कृत
कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ ५७ ॥
IAST लिप्यंतरण
kartavyataiva saṃsāro na tāṃ paśyanti sūrayaḥ | śūnyākārā nirākārā nirvikārā nirāmayāḥ || 57 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
कर्तव्यता, एव, संसारः, न, ताम्, पश्यन्ति, सूरयः, शून्य-आकाराः, निराकाराः, निर्विकाराः, निरामयाः
- कर्तव्यता एव संसारः
- ‘मुझे यह करना है’ का यह कर्तव्य-भाव ही वास्तव में संसार (बंधन) है
- सूरयः ताम् न पश्यन्ति
- ज्ञानी पुरुष उस कर्तव्यता को नहीं देखते
- शून्य-आकाराः निराकाराः
- क्योंकि वे अहंकार-शून्य, देहाकार-रहित
- निर्विकाराः निरामयाः
- समस्त विकारों से रहित और समस्त दुखों से मुक्त हो चुके हैं
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
‘मुझे यह करना है’ का कर्तव्य-भार ही वास्तव में संसार है; ज्ञानी पुरुष उस कर्तव्यता को नहीं देखते, क्योंकि वे अहंकार-शून्य, निराकार, निर्विकार और सर्वथा रोग-रहित (शांत) हैं।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अष्टावक्र गीता का अत्यंत क्रांतिकारी और मुक्तिदायक श्लोक है। संसार क्या है? कोई पहाड़, नदी या मकान संसार नहीं हैं; मन में बैठा हुआ यह तनाव कि "मुझे यह भी करना है, वह भी करना है" (कर्तव्यता) ही सच्चा संसार और बंधन है। ज्ञानी जानता है कि आत्मा निराकार और निर्विकार है, वहाँ कोई कर्तव्य शेष नहीं। इसलिए वह कर्तव्य के बोझ से मुक्त होकर अखंड शांति में विश्राम करता है।
सरल हिन्दी में समझें
हम दिन-रात किस चीज़ से परेशान रहते हैं? इस बात से कि "मुझे यह काम निपटाना है, बच्चों का भविष्य बनाना है, पैसा कमाना है, प्रतिष्ठा बचानी है।" यह जो "मुझे करना है" की अंतहीन लिस्ट हमारे सिर पर सवार है, यही असली नर्क है।
अष्टावक्र कहते हैं कि समझदार इंसान इस लिस्ट को फाड़कर फेंक देता है। वह जानता है कि करने वाली प्रकृति है और वह खुद अकर्ता आत्मा है।
वह बिना किसी तनाव के अपने कर्तव्य निभाता है, लेकिन मन पर कर्तव्य का कोई भारी बोझ नहीं उठाता। वह हर चिंता से मुक्त होकर हल्का रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. कर्तव्यता एव संसारः अष्टावक्र के उपशम-दर्शन का महा-सूत्र है—बंधन बाह्य जगत में नहीं, कर्तव्य के मानसिक तनाव में है। 2. सूरयः न तां पश्यन्ति ज्ञानियों की उस दृष्टि को दिखाता है जहाँ आत्मा में कोई कृत्य या कर्म शेष नहीं रहता (नैष्कर्म्य)। 3. शून्याकारा निराकारा देहाध्यास और उपाधियों से सर्वथा मुक्ति का निर्देश है। 4. निर्विकारा निरामयाः आत्मा की शाश्वत आरोग्यता और निर्दोषता की प्रतिष्ठा है। 5. यह साधक को ‘बर्नआउट’ और कर्तव्य-दबाव की मानसिक आग से निकालकर आत्म-शांति के अमृत में स्नान कराता है।
उदाहरण से समझें: जैसे पीठ पर बंधा हुआ 50 किलो का भारी पत्थर जब नीचे उतार दिया जाता है तो शरीर को जो असीम हल्कापन मिलता है, वैसे ही कर्तव्यता का मानसिक बोझ उतरते ही आत्मा परम शांति पाती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
लगातार 15 घंटे काम करने के बाद जब आप अपनी टू-डू लिस्ट को किनारे रखकर गहरी सांस लेते हैं कि "अब आज के लिए सब पूरा हो गया"; ज्ञानी के मन से कर्तव्य का बोझ ऐसे ही सदा के लिए उतर जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने सिर से "मुझे यह भी करना है" का भारी बोझ उतारिए; कर्तव्य को सहजता से निभाइए, लेकिन उसके तनाव में अपनी शांति मत जलाइए।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘कर्तव्यतैव संसारः’ का अर्थ अपनी नैतिक और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से पलायन करना नहीं है; यह अंतःकरण के तनाव से मुक्ति का उपदेश है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कामों की लिस्ट देखकर बहुत घबराहट या थकान लगे, तो 2 मिनट रुककर कहें: "काम होंगे अपने समय पर, मेरी आत्मा अभी इसी क्षण पूर्ण और शांत है।" (काम के दबाव में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने सिर पर कर्तव्यों का इतना भारी बोझ उठाकर जी रहा हूँ कि मैंने खुद को एक मशीन बना लिया है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "कोई कर्तव्य नहीं, कोई बोझ नहीं; मैं निराकार, निर्विकार और पूर्णतः स्वस्थ आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: ‘मुझे करना है’ का भाव ही संसार है; ज्ञानी कर्तव्यता को नहीं देखते, वे निराकार और निर्विकार हैं।
English
Translation: The sense of duty alone is the mundane world; the wise do not see it, being void of form, formless, immutable, and untainted.
Simple explanation: The compelling sense of personal duty is itself the essence of worldly bondage; the truly wise do not recognize it at all, abiding as they do empty of ego, formless, changeless, and untainted.
विषय और संबंधित श्लोक
- कर्तव्यता-मुक्ति
- संसार-परिभाषा
- निराकार-आत्मा
- निर्विकार-विश्रांति
- श्लोक 18.56: तादृशा एव जानते।
- श्लोक 18.58: अकुर्वन्नपि संक्षोभात्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सत्तावनवाँ श्लोक।