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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.56
सत्यापित
मूल संस्कृत
सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते । तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥
IAST लिप्यंतरण
santuṣṭo'pi na santuṣṭaḥ khinno'pi na ca khidyate | tasyāścaryadaśāṃ tāṃ tāṃ tādṛśā eva jānate || 56 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
सन्तुष्टः, अपि, न, सन्तुष्टः, खिन्नः, अपि, न, च, खिद्यते, तस्य, आश्चर्य-दशाम्, ताम्, ताम्, तादृशाः, एव, जानते
- सन्तुष्टः अपि न सन्तुष्टः
- लोकदृष्टि में संतुष्ट दिखने पर भी वास्तव में संतुष्ट (आसक्त) नहीं होता
- खिन्नः अपि न च खिद्यते
- और दुखी दिखने पर भी भीतर से तनिक भी दुखी नहीं होता
- तस्य ताम् ताम् आश्चर्य-दशाम्
- उस ज्ञानी की इस अत्यंत विस्मयकारी अलौकिक दशा को
- तादृशाः एव जानते
- उसके जैसे ही अन्य ज्ञानी पुरुष समझ सकते हैं
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
लोकदृष्टि में संतुष्ट दिखने पर भी ज्ञानी वास्तव में संतुष्ट नहीं होता, और खिन्न दिखने पर भी दुखी नहीं होता; उसकी इस आश्चर्यमयी अवस्था को उसके समान ज्ञानी ही जान सकते हैं।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जीवनमुक्त की आंतरिक स्थिति साधारण बुद्धि की पकड़ में नहीं आ सकती। बाहर से जब वह हँसता है तो लगता है कि वह खुश है, किंतु भीतर से वह जानता है कि यह सब माया है। जब शरीर पर रोग या चोट आती है तो बाहर से वह कराहता हुआ दिख सकता है, किंतु भीतर से वह आत्मा में पूर्ण शांत और अछूता रहता है। इस अद्भुत और रहस्यमयी दशा (आश्चर्यदशा) को कोई सांसारिक मनुष्य नहीं समझ सकता; केवल वही समझ सकता है जो खुद उस पद पर पहुँच चुका है।
सरल हिन्दी में समझें
एक अच्छे अभिनेता को जब परदे पर रोना होता है, तो उसकी आँखों से असली आँसू बहते हैं। लेकिन क्या वह दिल से सचमुच दुखी होता है? नहीं, वह जानता है कि यह केवल एक्टिंग है।
ज्ञानी व्यक्ति का जीवन भी बाहर से देखने वालों के लिए एक पहेली की तरह होता है। वह कभी हँसता दिखता है और कभी गंभीर, लेकिन अंदर से वह कभी नहीं हिलता।
संसारी लोग उसे कभी समझ नहीं पाते; केवल वही दूसरा ज्ञानी उसकी इस अद्भुत मस्ती और शांति को पहचान सकता है जो खुद उस जगह पहुँच चुका हो।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः सुख के क्षणों में भी निर्लेपता और साक्षी-भाव का द्योतक है। 2. खिन्नोऽपि न खिद्यते दुख और शारीरिक पीड़ा के समय भी आंतरिक अभेद्य शांति को दर्शाता है। 3. आश्चर्यदशां तां तां यह सिद्ध करता है कि जीवनमुक्ति तर्क और बुद्धि के परे की अपरोक्ष अनुभूति है (कठ २.७ ‘आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽनुशिष्यः’)। 4. तादृशा एव जानते साधक को यह चेतावनी देता है कि बाहरी आचरण देखकर किसी ज्ञानी का मूल्यांकन न करे। 5. द्वंद्वातीत स्थिति की यह सर्वोच्च काव्यात्मक और दार्शनिक अभिव्यक्ति है।
उदाहरण से समझें: जैसे गहरे समुद्र की सतह पर चाहे तूफान के थपेड़े हों, लेकिन गहराई में जल सर्वथा शांत रहता है; ज्ञानी बाहर से भावुक दिखकर भी भीतर से अचल रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक कुशल सर्जन जब किसी मरीज़ का ऑपरेशन करते समय चेहरे पर गंभीरता रखता है लेकिन मन में कोई घबराहट नहीं होती; ज्ञानी भी संसार के बीच ऐसे ही अडिग और शांत रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दूसरों के बाहरी चेहरे देखकर उनका फैसला मत कीजिए; असली शांति अंदर की गहराइयों में होती है जहाँ कोई दुख नहीं पहुँच सकता।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘खिन्नोऽपि न खिद्यते’ का अर्थ दर्द या बीमारी का इलाज न कराना नहीं है; यह मानसिक रूप से दुख से मुक्त रहने की स्थिति है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब दिन में कोई ऐसी बात हो जो आपको परेशान करे, तो 1 मिनट के लिए सोचें: "यह केवल बाहर का नाटक है, अंदर से मैं बिल्कुल शांत हूँ।" (कठिन परिस्थिति में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं लोगों के बाहरी व्यवहार को देखकर उनके बारे में अपनी राय बना लेता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "चेहरे पर सुख-दुख आते-जाते हैं; मेरे अंतर्मन की गहराई में केवल शांत और अखंड प्रकाश है।"
एक पंक्ति में सार: संतुष्ट दिखकर भी ज्ञानी संतुष्ट नहीं, खिन्न दिखकर भी दुखी नहीं; उसकी यह अद्भुत दशा ज्ञानी ही जानते हैं।
English
Translation: Pleased yet not pleased, suffering yet not pained—that wondrous state of his, only those like him can truly know.
Simple explanation: Pleased in outward appearance yet entirely free of personal gratification, appearing sorrowful yet not sorrowing in the least—that wondrous state of the sage, only those of equal realization can truly comprehend.
विषय और संबंधित श्लोक
- आश्चर्यदशा
- सुख-दुःख-पार
- अलौकिक-स्थिति
- ज्ञानी-महिमा
- श्लोक 18.55: योगी न याति विकृतिम्।
- श्लोक 18.57: कर्तव्यतैव संसारः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छप्पनवाँ श्लोक।