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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.55
सत्यापित
मूल संस्कृत
भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः । विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥
IAST लिप्यंतरण
bhṛtyaiḥ putraiḥ kalatraiś ca dauhitraiś cāpi gotrajaiḥ | vihasya dhikkṛto yogī na yāti vikṛtiṃ manāk || 55 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
भृत्यैः, पुत्रैः, कलत्रैः, च, दौहित्रैः, च, अपि, गोत्रजैः, विहस्य, धिक्कृतः, योगी, न, याति, विकृतिम्, मनाक्
- भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैः च
- सेवकों, पुत्रों और स्त्रियों द्वारा
- दौहित्रैः गोत्रजैः च अपि
- और नातियों तथा कुल के संबंधियों द्वारा
- विहस्य धिक्कृतः अपि
- हँसी उड़ाये जाने और धिक्कारे जाने पर भी
- योगी मनाक् विकृतिम् न याति
- योगी पुरुष तनिक भी विकार (क्रोध या क्षोभ) को प्राप्त नहीं होता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
नौकरों, पुत्रों, पत्नियों, नातियों और कुल के संबंधियों द्वारा उपहास किए जाने या धिक्कारे जाने पर भी योगी पुरुष तनिक भी विचलित (विकृत) नहीं होता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह पारिवारिक और सामाजिक जीवन में ज्ञानी की अचल शांति की परीक्षा है। जब बाहर के लोग अपमान करते हैं तो सहना फिर भी आसान होता है, किंतु जब अपने ही घर के लोग—पुत्र, पत्नी, सेवक और रिश्तेदार—मज़ाक उड़ाते हैं और धिक्कारते हैं, तब साधारण मनुष्य का क्रोध भड़क उठता है। किंतु ज्ञानी जानता है कि यह सब देह का संबंध और अज्ञान का खेल है। वह उन पर न तो क्रोध करता है और न दुखी होता है; उसका मन पूर्णतः अविकारी रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
सोचिए, अगर किसी व्यक्ति को उसके अपने ही बच्चे, जीवनसाथी या नौकर ताना मारें और उसका मज़ाक उड़ाएँ, तो आम तौर पर इंसान का पारा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है।
लेकिन ज्ञानी व्यक्ति का दिल इतना गहरा और शांत होता है कि अगर उसके अपने परिवार वाले भी उस पर हँसें या उसकी बुराई करें, तो भी उसके चेहरे की मुस्कान और मन की शांति गायब नहीं होती।
वह जानता है कि जो लोग मज़ाक उड़ा रहे हैं वे अज्ञान में हैं। वह किसी से नाराज़ नहीं होता और अपनी आत्मा में अडिग रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. निकट संबंधियों द्वारा किया गया अपमान अहंकार पर सबसे गहरी चोट करता है; ज्ञानी की अहंता मिट चुकी है, अतः उसे कोई चोट नहीं लगती। 2. न याति विकृतिं मनाक् चित्त की पूर्ण तितिक्षा और समता का प्रमाण है। 3. देहाध्यास मिट जाने पर कुल, गोत्र और पारिवारिक उपाधियाँ केवल स्वप्नवत् रह जाती हैं। 4. यह भागवत के ‘अवधूत गीता’ और भरत मुनि (जड़भरत) के प्रसंग की प्रत्यक्ष प्रतिध्वनि है। 5. साधक को पारिवारिक ताने और उपहास सहने की आंतरिक दृढ़ता और क्षमा-भाव प्रदान करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे हाथी के गुज़रने पर कुत्ते भौंकते हैं लेकिन हाथी अपनी चाल में मस्त चलता रहता है, वैसे ही संबंधियों के उपहास से ज्ञानी का चित्त तनिक भी विचलित नहीं होता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब परिवार के लोग आपके आध्यात्मिक झुकाव या सादे जीवन का मज़ाक उड़ाते हुए कहें कि "तुम दुनियादारी नहीं समझते", तब भी आप बिना बुरा माने मुस्कुरा दें; ज्ञानी ऐसे ही समभाव में रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपनों के तानों और मज़ाक से विचलित मत होइए; क्षमा कीजिए और अपनी आंतरिक शांति में अडिग रहिए।
सामान्य गलतफहमी
यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘न याति विकृतिम्’ का अर्थ परिवार की उपेक्षा करना या उनका अनादर करना नहीं है; यह पारिवारिक कड़वाहट में अपनी शांति न खोने का बल है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब घर में कोई आपकी बात पर हँसे या आलोचना करे, तो तुरंत पलटकर जवाब न दें; मन ही मन मुस्कुराकर शांत रहें। (घर में तनाव के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरे अपने लोगों के छोटे-छोटे तानों से मेरा मूड खराब हो जाता है और मैं घंटों अशांत रहता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "निंदा और प्रशंसा केवल शब्दों की हवा है; मेरी आत्मा अचल पर्वत की तरह हर अपमान से परे है।"
एक पंक्ति में सार: नौकरों, पुत्रों, पत्नी और संबंधियों द्वारा उपहास किए जाने पर भी ज्ञानी तनिक भी विचलित नहीं होता।
English
Translation: Mocked and derided even by servants, sons, wives, grandchildren, and kin, the yogi is not in the least perturbed.
Simple explanation: Even when laughed at and treated with contempt by servants, children, wives, grandchildren, and relatives, the established yogi suffers not the slightest agitation.
विषय और संबंधित श्लोक
- तितिक्षा
- उपहास-समता
- अविकारी-योगी
- पारिवारिक-शांति
- श्लोक 18.54: न कापि हृदि वासना।
- श्लोक 18.56: सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पचपनवाँ श्लोक।