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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.54
सत्यापित
मूल संस्कृत
श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम् । दृष्ट्वा संपूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥
IAST लिप्यंतरण
śrotriyaṃ devatāṃ tīrtham aṅganāṃ bhūpatiṃ priyam | dṛṣṭvā saṃpūjya dhīrasya na kāpi hṛdi vāsanā || 54 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
श्रोत्रियम्, देवताम्, तीर्थम्, अङ्गनाम्, भूपतिम्, प्रियम्, दृष्ट्वा, संपूज्य, धीरस्य, न, का, अपि, हृदि, वासना
- श्रोत्रियम् देवताम् तीर्थम्
- वेदज्ञ ब्राह्मण, देवता, पवित्र तीर्थ
- अङ्गनाम् भूपतिम् प्रियम्
- सुंदर स्त्री, राजा अथवा किसी प्रियजन को
- दृष्ट्वा संपूज्य
- देखकर और उनका यथायोग्य सत्कार-पूजन करके भी
- धीरस्य हृदि
- धीर ज्ञानी के हृदय में
- का अपि वासना न
- तनिक भी कोई वासना या कामना उत्पन्न नहीं होती
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
वेदज्ञ विद्वान, देवता, तीर्थ, सुंदर स्त्री, राजा अथवा प्रियजन को देखकर और उनका यथोचित आदर-पूजन करके भी धीर ज्ञानी के हृदय में तनिक भी वासना उत्पन्न नहीं होती।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह ज्ञानी के अंतःकरण की पूर्ण निष्कामता और समदृष्टि का प्रमाण है। साधारण मनुष्य जब किसी विद्वान, देवता या राजा को देखता है तो उसके मन में मान-सम्मान या स्वार्थ की वासना जगती है; जब सुंदर स्त्री को देखता है तो कामवासना जगती है। किंतु ज्ञानी का हृदय इतना शुद्ध और शांत है कि वह सबका यथायोग्य सम्मान और पूजा करता है, किंतु उसके मन में किसी के प्रति न राग होता है और न द्वेष। उसका हृदय दर्पण की तरह स्वच्छ रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब एक साफ़ आईने के सामने कोई राजा आए या कोई साधारण इंसान, आईना दोनों को दिखाता है; लेकिन उनके जाने के बाद क्या आईने पर कोई निशान छूटता है? बिल्कुल नहीं।
ज्ञानी व्यक्ति समाज में सबका आदर करता है—विद्वानों का, देवताओं का, बड़ों का और अपनों का। वह सबके साथ प्यार और मर्यादा से पेश आता है।
लेकिन उसके दिल के अंदर किसी भी चीज़ की कोई भूख, लालच या वासना पैदा नहीं होती। उसका दिल हर समय शीशे की तरह साफ़ रहता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. दृष्ट्वा संपूज्य यह दर्शाता है कि ज्ञानी अहंकारी या अनादर करने वाला नहीं होता; वह लोक-मर्यादा का पूर्ण पालन करता है। 2. न कापि हृदि वासना अंतःकरण की आत्यंतिक निर्मलता और अनासक्ति का प्रमाण है। 3. पवित्र तीर्थ और सांसारिक विषयों के प्रति समान निष्कामता यह सिद्ध करती है कि ज्ञानी दोनों में आत्म-तत्त्व को ही देखता है। 4. यह गीता के ‘विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥’ (५.१८) का जीवंत उदाहरण है। 5. साधक को बाहर से शिष्ट और भीतर से पूर्णतः निष्काम रहने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे कमल का पत्ता पानी में रहते हुए भी पानी की बूँद को अपने ऊपर नहीं ठहरने देता, वैसे ही ज्ञानी सबका सत्कार करते हुए भी किसी वासना को मन में नहीं ठहरने देता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक निष्पक्ष जज जब अदालत में किसी बड़े नेता या खूबसूरत हस्ती को भी कानून के अनुसार ही देखता है बिना किसी निजी आकर्षण के; ज्ञानी का मन संसार के प्रति ऐसा ही निष्पक्ष रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सबका आदर कीजिए, मर्यादा निभाइए, लेकिन अपने मन को किसी के पीछे भागने मत दीजिए; निष्काम रहकर ही सच्ची शांति मिलती है।
सामान्य गलतफहमी
तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘न कापि वासना’ का अर्थ घमंडी या असंवेदनशील हो जाना नहीं है; यह आंतरिक पवित्रता और निष्कामता का शिखर है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब किसी बहुत बड़े या बहुत आकर्षक व्यक्ति से मिलें, तो विनम्रता से बात करें लेकिन भीतर से अपनी आत्म-शांति में स्थिर रहें। (मुलाकातों में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या किसी बड़े पद या सुंदर चेहरे को देखकर मेरा मन डगमगा जाता है और उसमें कामनाएं उठने लगती हैं?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सारे रूप और नाम मेरी ही चेतना के रंग हैं; मैं सबके प्रति प्रेमपूर्ण और भीतर से पूर्णतः निष्काम हूँ।"
एक पंक्ति में सार: देवता, तीर्थ, स्त्री या राजा को देखकर और पूजकर भी ज्ञानी के हृदय में तनिक भी वासना नहीं होती।
English
Translation: Beholding and honoring a scholar, a deity, a sacred shrine, a woman, a king, or a beloved, not the slightest latent desire stirs in the heart of the wise.
Simple explanation: Seeing and honoring a learned sage, a deity, a sacred shrine, a beautiful woman, a monarch, or a loved one, not the faintest trace of craving arises in the steadfast heart of the sage.
विषय और संबंधित श्लोक
- समदर्शन
- निष्कामता
- लोक-मर्यादा
- हृदि-वासना-मुक्ति
- श्लोक 18.53: अबद्धा मुक्तबुद्धयः।
- श्लोक 18.55: भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का चौवनवाँ श्लोक।