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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.53
सत्यापित
मूल संस्कृत
विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगाह्वरान् । निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥
IAST लिप्यंतरण
vilasanti mahābhogair viśanti girigāhvarān | nirastakalpanā dhīrā abaddhā muktabuddhayaḥ || 53 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
विलसन्ति, महा-भोगैः, विशन्ति, गिरि-गाह्वरान्, निरस्त-कल्पनाः, धीराः, अबद्धाः, मुक्त-बुद्धयः
- निरस्त-कल्पनाः धीराः
- समस्त मानसिक कल्पनाओं से मुक्त ज्ञानी पुरुष
- अबद्धाः मुक्त-बुद्धयः
- सर्वथा अबद्ध (असंग) और मुक्त बुद्धि वाले होकर
- महा-भोगैः विलसन्ति
- प्रारब्धवश विशाल राजसी भोगों में विलास करते हैं
- गिरि-गाह्वरान् विशन्ति
- अथवा पर्वतों की वीरान गुफाओं में प्रवेश करते हैं
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
समस्त कल्पनाओं से रहित, बंधनरहित और मुक्त बुद्धि वाले धीर पुरुष प्रारब्धवश बड़े-बड़े भोगों में विलास करते हैं अथवा पर्वतों की गुफाओं में प्रवेश करते हैं (दोनों में वे समान रूप से मुक्त रहते हैं)।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक जीवनमुक्त की पूर्ण तटस्थता और समता का शिखर दिखाता है। ज्ञानी के लिए महल और जंगल दोनों एक समान हैं। राजा जनक की तरह यदि प्रारब्ध उसे राजमहल में रखे और छप्पन भोग सामने हों, तो भी वह उनमें लिप्त नहीं होता; और यदि प्रारब्ध उसे हिमालय की किसी बर्फीली गुफा में ले जाए जहाँ खाने को कुछ न हो, तो भी वह दुखी नहीं होता। उसकी बुद्धि सब कल्पनाओं से मुक्त होकर सदा एकरस ब्रह्म में स्थित रहती है।
सरल हिन्दी में समझें
सोने की चम्मच से खाना खाएँ या मिट्टी के कुल्हड़ से पानी पिएँ, जिस इंसान को समझ आ गया है कि वह अमर आत्मा है, उसके लिए दोनों बराबर हैं।
ज्ञानी व्यक्ति चाहे राजा बनकर महल में रहे या संन्यासी बनकर जंगल की गुफा में, उसके मन की शांति में एक रत्ती का भी फर्क नहीं पड़ता।
वह न तो महलों के सुख से चिपकता है और न गुफाओं के सन्नाटे से डरता है। उसकी बुद्धि हर जगह पूरी तरह आज़ाद और मस्त रहती है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. निरस्तकल्पनाः समस्त मानसिक पूर्वाग्रहों, अपेक्षाओं और विकल्पों के विनाश का सूचक है। 2. अबद्धाः मुक्तबुद्धयः यह सिद्ध करता है कि बंधन स्थान या वस्तु में नहीं, बुद्धि के राग-द्वेष में होता है। 3. महाभोगैः विलसन्ति और गिरिगाह्वरान् विशन्ति बाह्य परिस्थितियों की विषमता में आंतरिक समरसता का प्रमाण है। 4. यह अष्टावक्र की उस अद्वैत दृष्टि की पराकाष्ठा है जहाँ संन्यास और गृहस्थ का द्वंद्व पूरी तरह मिट जाता है। 5. साधक को सिखाता है कि आध्यात्मिक प्रगति का पैमाना बाहरी परिवेश नहीं, आंतरिक अनासक्ति है।
उदाहरण से समझें: जैसे सूरज की धूप चाहे सोने के महल पर पड़े या श्मशान की भूमि पर, धूप दोनों जगह अछूती और पवित्र रहती है; ज्ञानी की चेतना महल और गुफा दोनों में निर्लेप रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक आध्यात्मिक व्यक्ति चाहे फाइव स्टार होटल में कॉन्फ्रेंस कर रहा हो या किसी साधारण ढाबे पर खाना खा रहा हो, उसका मन दोनों जगह समान रूप से शांत रहता है; ज्ञानी परिस्थितियों का गुलाम नहीं होता। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: सुख-साधनों के पीछे मत भागिए और न उनसे डरकर भागिए; अपने भीतर की उस आज़ादी को पहचानिए जो हर जगह अखंड रहती है।
सामान्य गलतफहमी
वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘विलसन्ति महाभोगैः’ का अर्थ वासनाओं में डूब जाना नहीं है; यह केवल प्रारब्धवश प्राप्त परिस्थितियों में निर्लेप रहने का वर्णन है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज चाहे बहुत आरामदायक परिस्थिति मिले या कोई असुविधा, दोनों में मन को बिल्कुल शांत और स्थिर रखें। (परिस्थितियों में समता)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी शांति केवल तभी तक रहती है जब सब कुछ मेरे आराम के मुताबिक होता है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "महल हो या जंगल, लाभ हो या हानि; मैं दोनों से अछूता, अखंड और मुक्त चैतन्य हूँ।"
एक पंक्ति में सार: कल्पनाओं से मुक्त ज्ञानी चाहे बड़े भोगों में रहे या गुफाओं में, वह सदा बंधन-मुक्त रहता है।
English
Translation: Free from conceptualizing, unchained and of liberated intellect, the wise may revel in great luxuries or enter mountain caves—ever free.
Simple explanation: Discarding all mental fabrications, unconditioned and of liberated intellect, the steadfast sage may revel in sumptuous pleasures or retire into desolate mountain caves—equally untethered in both.
विषय और संबंधित श्लोक
- निरस्त-कल्पना
- मुक्त-बुद्धि
- भोग-त्याग-समता
- अखंड-कैवल्य
- श्लोक 18.52: स्थितिर्धीरस्य राजते।
- श्लोक 18.54: श्रोत्रियं देवतां तीर्थम्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तिरेपनवाँ श्लोक।