दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.93
सत्यापित
मूल संस्कृत
आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना । अन्तर्यदनुभूयेत तत् कथं कस्य कथ्यते ॥ ९३ ॥
IAST लिप्यंतरण
ātmaviśrāntitṛptena nirāśena gatārtinā | antar yad anubhūyeta tat kathaṃ kasya kathyate || 93 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
आत्म-विश्रान्ति-तृप्तेन, निराशेन, गत-आर्तिना, अन्तः, यत्, अनुभूयेत, तत्, कथम्, कस्य, कथ्यते
- आत्म-विश्रान्ति-तृप्तेन
- अपनी ही आत्मा में विश्राम पाकर तृप्त हुए
- निराशेन गत-आर्तिना
- आशा-रहित और समस्त संतापों (पीड़ाओं) से मुक्त ज्ञानी द्वारा
- अन्तः यत् अनुभूयेत
- भीतर जो अलौकिक परमानंद अनुभव किया जाता है
- तत् कथम् कस्य कथ्यते
- वह भला कैसे और किसको कहा जा सकता है? (वह सर्वथा अनिर्वचनीय है)
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अपनी आत्मा में विश्राम पाकर तृप्त, आशारहित और समस्त संतापों से मुक्त ज्ञानी के भीतर जो अनुभव होता है, उसे कैसे और किसको कहा जा सकता है? (वह शब्दों से परे है)।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह गूंगे के गुड़ के समान आत्मानंद की अनिर्वचनीयता का प्रतिपादन है। जब मनुष्य अपनी ही आत्मा में सदा के लिए विश्राम पा लेता है, जब उसकी सारी सांसारिक आशाएँ मिट जाती हैं और सारे दुख-संताप बुझ जाते हैं, तब उसके अंतःकरण में जो परमानंद का सागर उमड़ता है, उसे वाणी से नहीं बताया जा सकता। कहने वाला कौन? सुनने वाला कौन? और किन शब्दों से कहा जाए? वह केवल स्वयं ही अनुभव करने का विषय है।
सरल हिन्दी में समझें
अगर कोई गूंगा व्यक्ति बहुत मीठा और स्वादिष्ट आम खाए, तो क्या वह बोलकर बता सकता है कि आम कितना मीठा था? वह केवल मुस्कुरा सकता है और आनंद में सिर हिला सकता है।
ज्ञानी व्यक्ति के अंदर जो परमात्मा का अमृत बह रहा होता है, वह शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।
उसकी सारी चिंताएं और दर्द खत्म हो चुके हैं। वह अपने ही भीतर इतना खुश और शांत है कि उस खुशी को बयान करने के लिए इस दुनिया की कोई भी भाषा बहुत छोटी पड़ जाती है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. तत्कथं कस्य कथ्यते अद्वैत आत्मानंद की अनिर्वचनीयता (ineffability) का सर्वोच्च सूत्र है। 2. आत्मविश्रान्तितृप्तेन यह सिद्ध करता है कि वास्तविक तृप्ति केवल स्व-स्वरूप में विश्राम से ही संभव है। 3. निराशेन गतार्तिना समस्त वासनाओं और तीनों तापों के आत्यंतिक शमन का परिचायक है। 4. अंतरनुभूति शब्दों और वाक्-इंद्रिय का विषय नहीं, अपरोक्ष आत्म-सत्ता का साक्षात्कार है। 5. साधक को वाद-विवाद और शब्दों के जाल से निकालकर अंतर्मुखी होकर स्वयं उस रस को चखने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे गूंगे का गुड़ खाकर स्वाद का बखान नहीं किया जा सकता, वैसे ही आत्म-विश्रांति के आनंद को शब्दों में नहीं कहा जा सकता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी बहुत गहरे आध्यात्मिक अनुभव या ध्यान में डूबते हैं, तो आँखें खुलने के बाद आपके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं होते, केवल गहरा मौन होता है; ज्ञानी का पूरा जीवन ऐसा ही मौन बन जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अध्यात्म को केवल बातों और बहसों में मत उलझाइए; अपने भीतर उतरिए और उस अमृत का स्वाद लीजिए जो शब्दों से बहुत बड़ा है।
सामान्य गलतफहमी
यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘कथं कथ्यते’ का अर्थ दूसरों को ज्ञान देने से मना करना नहीं है; यह आत्म-आनंद के अवर्णनीय होने का दार्शनिक सत्य है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई बहुत गहरा और शांत पल मिले, तो तुरंत किसी को बताने या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बजाय उस मौन को अपने भीतर ही सुरक्षित रखें। (मौन का संरक्षण)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने आध्यात्मिक अनुभवों को भी दूसरों को बताकर अपनी प्रशंसा बटोरने का साधन बना लेता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट पूर्ण मौन में बैठें और अनुभव करें: "यह शांति शब्दों से परे है; इसे किसी को नहीं बताना, केवल इसमें डूब जाना है।"
एक पंक्ति में सार: आत्म-विश्रांति से तृप्त और संताप-मुक्त ज्ञानी का आंतरिक अनुभव कैसे और किसको कहा जा सकता है?
English
Translation: By one contented in resting in the Self, free from desires and affliction, what is experienced within—how and to whom can it be told?
Simple explanation: By the sage contented in supreme rest within the Self, devoid of expectations and purged of all suffering, whatever is experienced within—how and to whom can it ever be told?
विषय और संबंधित श्लोक
- अनिर्वचनीय-आनन्द
- आत्म-विश्रांति
- गतार्ति
- गूंगे-का-गुड़
- श्लोक 18.92: चरितार्थस्य योगिनः।
- श्लोक 18.94: सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तिरानवेवाँ श्लोक।