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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९८/१००98%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.98

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः । समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ९८ ॥

IAST लिप्यंतरण

mukto yathāsthitisvasthaḥ kṛtakartavyanirvṛtaḥ | samaḥ sarvatra vaitṛṣṇyān na smaraty akṛtaṃ kṛtam || 98 ||

सरल उच्चारण: mukto yathaasthitisvasthah kritakartavyanirvritah samah sarvatra vaitrishnyaan na smaraty akritam kritam (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

मुक्तः, यथा-स्थिति-स्वस्थः, कृत-कर्तव्य-निर्वृतः, समः, सर्वत्र, वैतृष्ण्यात्, न, स्मरति, अकृतम्, कृतम्

मुक्तः यथा-स्थिति-स्वस्थः
मुक्त ज्ञानी जैसी भी परिस्थिति हो उसी में अपने स्वरूप में स्थित (स्वस्थ) रहता है
कृत-कर्तव्य-निर्वृतः
समस्त कर्तव्य पूरे हो जाने के कारण पूर्णतः शांत और निवृत्त है
वैतृष्ण्यात् सर्वत्र समः
तृष्णा के अभाव से सब जगह और सब काल में समभाव रहता है
कृतम् अकृतम् न स्मरति
और ‘मैंने क्या किया’ और ‘क्या नहीं किया’—इसकी कोई चिंता या स्मृति नहीं रखता

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

मुक्त पुरुष जैसी भी परिस्थिति हो उसी में आत्मस्वरूप में स्थित रहता है; सारे कर्तव्य समाप्त हो जाने से वह शांत है, तृष्णा-रहित होने से सब जगह सम है, और ‘क्या किया और क्या नहीं किया’ इसका कोई स्मरण नहीं रखता।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह पूर्ण जीवनमुक्ति और कृतकृत्यता का लक्षण है। संसारी मनुष्य हमेशा दो चिंताओं में जलता है: "मैंने जो किया उसका क्या फल मिलेगा?" और "हाय! मैं वह काम नहीं कर पाया।" ज्ञानी के सारे कर्तव्य आत्मज्ञान होते ही समाप्त हो चुके हैं। वह जैसी परिस्थिति सामने आ जाए—सुख हो या दुख, मान हो या अपमान—उसी में अपनी आत्मा में स्वस्थ (स्व-स्थ = अपने में स्थित) रहता है। तृष्णा न होने से वह भूतकाल के किए या न किए कर्मों के बोझ को ढोता नहीं। वह वर्तमान की अखंड शांति में जीता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब आप किसी लंबी यात्रा से अपने घर लौट आते हैं, तो क्या आप रात को बिस्तर पर बैठकर सोचते हैं कि "अरे, मुझे स्टेशन पर टिकट काउंटर पर जाना बाकी रह गया"? नहीं, क्योंकि यात्रा पूरी हो चुकी है।

ज्ञानी व्यक्ति ने अपने जीवन का सबसे बड़ा काम पूरा कर लिया है—उसने परमात्मा को पा लिया है।

अब उसके मन में न तो पुरानी गलतियों का कोई पछतावा होता है और न यह घमंड कि "मैंने इतना बड़ा काम किया।" वह जैसी भी परिस्थिति हो, उसी में पूरी तरह खुश और शांत रहता है। वह बिल्कुल हल्के दिल से जीता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. यथास्थितिस्वस्थः प्रारब्धवश प्राप्त परिस्थितियों के पूर्ण और अद्वैत स्वीकार का परिचायक है। 2. कृतकर्तव्यनिर्वृतः नैष्कर्म्य-सिद्धि और समस्त वैदिक व लौकिक कर्तव्यों के आत्यंतिक अंत को सिद्ध करता है। 3. वैतृष्ण्यात् सर्वत्र समः तृष्णा-क्षय से उत्पन्न होने वाले अखंड समत्व की प्रतिष्ठा है। 4. न स्मरत्यकृतं कृतम् पश्चाताप (guilt) और कर्तापन के अहंकार दोनों से मुक्ति की घोषणा है। 5. साधक को अतीत के बोझ और भविष्य की चिंताओं को छोड़कर वर्तमान आत्म-विश्रांति में जीने का संदेश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे बहती हुई नदी का पानी आगे निकल जाने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखता कि पीछे क्या छूटा, वैसे ही ज्ञानी किए या न किए कर्मों को याद करके पछताता नहीं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी परीक्षा का रिज़ल्ट आ जाने और सफल हो जाने के बाद पुरानी उत्तर-पुस्तिकाओं के पन्नों की चिंता छोड़ देते हैं; ज्ञानी अपने अतीत के कर्मों की चिंता से ऐसे ही सदा के लिए मुक्त हो जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अतीत के पछतावे और भविष्य की चिंताओं को विदा कीजिए; जब आप आत्मा में स्थित हैं, तो सारे कर्तव्य पूरे हो चुके हैं, वर्तमान में शांत रहिए।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘न स्मरत्यकृतं कृतम्’ का अर्थ गैर-जिम्मेदार होकर अपनी भूलों से न सीखना नहीं है; यह मानसिक अपराध-बोध और तनाव से मुक्ति का आध्यात्मिक सूत्र है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज अतीत की किसी पुरानी भूल का पछतावा मन में आए, तो तुरंत कहें: "जो बीत गया वह स्वप्न था, मैं वर्तमान में शुद्ध और निर्दोष आत्मा हूँ।" (पछतावे के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने बीते हुए कल के किए या न किए कामों के बोझ को ढोकर आज की शांति को गँवा रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपने सारे अतीत के कर्मों को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दें: "सब पूरा हो चुका है; मैं यथास्थिति में स्वस्थ, शांत और मुक्त आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: परिस्थिति में शांत, कर्तव्य-मुक्त और तृष्णा-रहित ज्ञानी किए या न किए कर्मों की कोई चिंता नहीं रखता।

English

Translation: Liberated, healthy in whatever situation, peaceful with duties fulfilled, equal everywhere through desirelessness, he recalls not what is done or undone.

Simple explanation: Liberated, ever poised in his true nature whatever the circumstances, serene with all obligations completely fulfilled, equanimous everywhere due to desirelessness, he dwells not upon what has been done or left undone.

विषय और संबंधित श्लोक

  • यथास्थिति-स्वस्थ
  • कृतकर्तव्य-निर्वृति
  • कृत-अकृत-मुक्ति
  • वैतृष्ण्य
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.97: पाण्डित्येऽपि न पण्डितः।
  • श्लोक 18.99: न प्रीयते वन्द्यमानो।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 425–427 (PDF पृ. 432–434)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का अट्ठानवेवाँ श्लोक।