दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९७/१००97%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.97

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान् । जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः ॥ ९७ ॥

IAST लिप्यंतरण

vikṣepe'pi na vikṣiptaḥ samādhau na samādhimān | jāḍye'pi na jaḍo dhanyaḥ pāṇḍitye'pi na paṇḍitaḥ || 97 ||

सरल उच्चारण: vikshepepi na vikshiptah samaadhau na samaadhimaan jaadyepi na jado dhanyah paandityepi na panditah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

विक्षेपे, अपि, न, विक्षिप्तः, समाधौ, न, समाधिमान्, जाड्ये, अपि, न, जडः, धन्यः, पाण्डित्ये, अपि, न, पण्डितः

विक्षेपे अपि न विक्षिप्तः
संसार के कोलाहल (विक्षेप) में भी वह तनिक भी विक्षिप्त (अशांत) नहीं होता
समाधौ न समाधिमान्
और समाधि की अवस्था में भी उसे समाधि का कोई अहंकार नहीं होता
जाड्ये अपि न जडः
जड़ता (मौन या निष्क्रियता) में भी वह अज्ञानी या जड़ नहीं होता
पाण्डित्ये अपि न पण्डितः
और भारी विद्वत्ता में भी वह पंडित (अहंकारी विद्वान) नहीं बनता
धन्यः
ऐसा ज्ञानी पुरुष वास्तव में धन्य है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

संसार के विक्षेप में भी जो विक्षिप्त नहीं होता, समाधि में भी समाधि के अभिमान से मुक्त रहता है, जड़ता में भी जड़ नहीं होता और विद्वत्ता में भी पंडित नहीं बनता—वह ज्ञानी धन्य है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह जीवनमुक्त की परम समता का अद्भुत चित्र है। यदि चारों तरफ भारी शोरगुल और अशांति मची हो, तो भी ज्ञानी का अंतःकरण शांत रहता है; जब वह समाधि में बैठता है, तो उसे यह घमंड नहीं होता कि "मैं समाधि लगा रहा हूँ।" जब वह बच्चों की तरह सीधा और चुप बैठता है, तो वह मूर्ख नहीं होता; और जब वह शास्त्रों के गहरे रहस्य खोलता है, तो उसमें पंडिताई का कोई घमंड नहीं होता। वह हर परिस्थिति में अपने सच्चे, अचल आत्म-स्वरूप में स्थित रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

एक असली सोने के सिक्के को चाहे आप बाज़ार की भीड़ में उछालें या किसी शांत तिजोरी में बंद कर दें, क्या उसकी कीमत बदलती है? बिल्कुल नहीं।

ज्ञानी व्यक्ति का मन भी उस सोने के सिक्के की तरह होता है। दुनिया के शोरगुल में भी वह अंदर से अशांत नहीं होता, और ध्यान में बैठकर भी खुद को बड़ा ध्यानी नहीं समझता।

वह सीधा-सादा रहकर भी मूर्ख नहीं होता, और बड़ी-बड़ी बातें जानकर भी घमंडी पंडित नहीं बनता। वह हर हाल में बिल्कुल सच्चा, सहज और धन्य रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः चित्त की अगाध स्थिरता का प्रमाण है जो बाहरी परिवेश पर निर्भर नहीं करती। 2. समाधौ न समाधिमान् समाधि के भी अहंकार से मुक्ति की तुरीयावस्था है। 3. पाण्डित्येऽपि न पण्डितः छांदोग्य उपनिषद् के ‘पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत्’ (विद्वत्ता छोड़कर बालक बनो) का साकार रूप है। 4. धन्यः उस साधक का सर्वोच्च सम्मान है जो ज्ञान और अज्ञान दोनों के अहंकार से पार पा चुका है। 5. साधक को आध्यात्मिक अहंता और दिखावटी पांडित्य से बचने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे गहरा समुद्र सतह पर तूफान आने पर भी अपनी गहराई में शांत रहता है और शांत होने पर कोई घमंड नहीं करता, वैसे ही ज्ञानी विक्षेप और समाधि दोनों में एकरस रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक विश्व-प्रसिद्ध सर्जन जो अस्पताल की इमरजेंसी के भयानक तनाव में भी बिना हाथ काँपे शांत सर्जरी करता है और बाद में कोई घमंड नहीं दिखाता; ज्ञानी जीवन के विक्षेपों में ऐसे ही अडिग रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: विद्वत्ता और ध्यान का घमंड छोड़िए; सच्चे ज्ञानी बनिए जो बाज़ार के शोर में भी शांत रहे और ज्ञान पाकर भी सरल बना रहे।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘पाण्डित्येऽपि न पण्डितः’ का अर्थ विद्या का अनादर करना नहीं है; यह केवल पांडित्य के अहंकार को विसर्जित करने का उपदेश है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब चारों तरफ बहुत शोरगुल या तनाव हो, तो 1 मिनट के लिए कहें: "बाहर शोर है, लेकिन मेरी आत्मा के केंद्र में परम शांति है।" (शोरगुल के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं थोड़ा सा ध्यान या ज्ञान सीखकर खुद को दूसरों से श्रेष्ठ और बड़ा ज्ञानी मानने लगा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न मैं विक्षिप्त हूँ, न समाधिस्थ; न अज्ञानी हूँ, न पंडित; मैं केवल नित्य, शांत और धन्य आत्म-चैतन्य हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: विक्षेप में शांत, समाधि में अभिमान-मुक्त, जड़ता में चैतन्य और पांडित्य में अहंकार-रहित ज्ञानी धन्य है।

English

Translation: Undistracted even in distraction, without pride even in samadhi, not dull even in stupor, and not pedantic even in learning—blessed is the wise.

Simple explanation: Undisturbed even in the midst of worldly chaos, free of spiritual pride even in samadhi, not sluggish even in stillness, and free of pedantry even in profound learning—truly blessed is the sage.

विषय और संबंधित श्लोक

  • विक्षेप-समाधि-पार
  • पांडित्य-अहंकार-मुक्ति
  • धन्य-ज्ञानी
  • परम-समत्व
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.96: न किञ्चिन्न च किञ्चन।
  • श्लोक 18.98: मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 423–425 (PDF पृ. 430–432)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सत्तानवेवाँ श्लोक।