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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९९/१००99%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.99

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति । नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ ९९ ॥

IAST लिप्यंतरण

na prīyate vandyamāno nindyamāno na kupyati | naivodvijati maraṇe jīvane nābhinandati || 99 ||

सरल उच्चारण: na preeyate vandyamaano nindyamaano na kupyati naivodvijati marane jeevane naabhinandati (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, प्रीयते, वन्द्यमानः, निन्द्यमानः, न, कुप्यति, न, एव, उद्विजति, मरणे, जीवने, न, अभिनन्दति

वन्द्यमानः न प्रीयते
दूसरों द्वारा वंदना और पूजा किए जाने पर वह प्रसन्न (अहंकारी) नहीं होता
निन्द्यमानः न कुप्यति
और निंदा किए जाने पर तनिक भी क्रोधित नहीं होता
मरणे न एव उद्विजति
मृत्यु के आने पर तनिक भी भयभीत या उद्विग्न नहीं होता
जीवने न अभिनन्दति
और जीने के प्रति कोई विशेष आसक्ति या अभिनंदन नहीं करता

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

वंदना किए जाने पर जो प्रसन्न नहीं होता, निंदा किए जाने पर जो क्रोधित नहीं होता, मृत्यु के आने पर जो उद्विग्न नहीं होता और जीने के प्रति भी जो आसक्त नहीं होता (वह सच्चा ज्ञानी है)।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह जीवनमुक्ति की पूर्ण परिपक्वता और द्वंद्वातीत स्थिति का शिखर है। जब लोग ज्ञानी की आरती उतारते हैं और जय-जयकार करते हैं, तो वह फूलकर कुप्पा नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि पूजा आत्मा की हो रही है, शरीर की नहीं। जब लोग उसे गाली देते हैं और अपमानित करते हैं, तो वह क्रोध नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि गाली केवल देह को दी जा रही है। जब मौत सामने आती है तो वह डरता नहीं, और जब जीवन चलता है तो वह उससे चिपकता नहीं। वह इन चारों द्वंद्वों से सर्वथा मुक्त होकर अचल रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

अगर कोई सोने की मूर्ति के आगे हाथ जोड़े, तो क्या मूर्ति मुस्कुराने लगती है? और अगर कोई मूर्ति पर कीचड़ फेंके, तो क्या मूर्ति को गुस्सा आता है? बिल्कुल नहीं।

ज्ञानी व्यक्ति का अंतःकरण भी उस सोने की मूर्ति की तरह अचल और पवित्र हो जाता है।

कोई उसकी तारीफ़ करे तो वह घमंड नहीं करता, कोई बुराई करे तो वह गुस्सा नहीं होता। जब मौत आएगी तो वह बिना किसी डर के मुस्कुराकर विदा होगा, और जब तक सांसें हैं तब तक बिना किसी ज़िद के शांति से जिएगा। वह पूरी तरह मुक्त है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. वन्द्यमानो न प्रीयते निन्द्यमानो न कुप्यति मान और अपमान के द्वंद्व से पूर्ण मुक्ति का लक्षण है। 2. नैवोद्विजति मरणे मृत्यु के भय (अभिनिवेश) के आत्यंतिक विलय की घोषणा है। 3. जीवने नाभिनन्दति जीने की तृष्णा और आसक्ति के अभाव का परिचायक है। 4. यह गीता के ‘न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्’ (५.२०) का साक्षात अद्वैत स्वरूप है। 5. साधक को जीवन और मृत्यु, स्तुति और निंदा के समस्त बंधनों को काटकर परम पद में प्रतिष्ठित होने का उपदेश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे पेड़ की छाया को चाहे कोई प्रणाम करे या कुल्हाड़ी से काटे, छाया पर कोई असर नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी स्तुति-निंदा और जीवन-मरण से सर्वथा अछूता रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक महान पर्वतारोही जो एवरेस्ट पर चढ़कर भी घमंड से नहीं उछलता और नीचे उतरते समय तूफान आने पर भी घबराता नहीं, शांत संतुलन बनाए रखता है; ज्ञानी जीवन के हर मोड़ पर ऐसा ही अडिग रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: तारीफ़ से फूलना और गाली से जलना बंद कीजिए; मौत का डर छोड़िए और जीवन से चिपके बिना हर पल शांति से जीना सीखिए।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘मरणे नोद्विजति’ का अर्थ जीवन की उपेक्षा करना या आत्महत्या को उचित ठहराना नहीं है; यह मृत्यु के मनोवैज्ञानिक भय से मुक्ति का सत्य है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब कोई आपकी बहुत तारीफ़ करे, तो चुपचाप मुस्कुराकर मन में कहें: "यह सब परमात्मा की कृपा है, मेरी शांत आत्मा मान-अपमान से परे है।" (तारीफ़ के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी खुशी और गुस्सा दूसरों के शब्दों की कठपुतली बने हुए हैं?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न स्तुति मुझे बढ़ा सकती है, न निंदा मुझे घटा सकती है; न जीवन मेरा आदि है, न मृत्यु मेरा अंत; मैं नित्य अमर आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: पूजा करने पर प्रसन्न न होने वाला, निंदा पर क्रोध न करने वाला, मौत से न डरने वाला ज्ञानी ही मुक्त है।

English

Translation: Pleased not when honored nor angered when insulted, he trembles not at death nor rejoices in living.

Simple explanation: Neither elated when praised nor enraged when blamed, he trembles not at the approach of death, nor does he greedily cling to physical life.

विषय और संबंधित श्लोक

  • स्तुति-निंदा-समता
  • जीवन-मृत्यु-पार
  • अभिनिवेश-मुक्ति
  • अचल-स्थिति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.98: न स्मरत्यकृतं कृतम्।
  • श्लोक 18.100: न धावति जनाकीर्णं।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 427–429 (PDF पृ. 434–436)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का निन्यानवेवाँ श्लोक।