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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ५०/१००50%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.50

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् । स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात्परमं पदम् ॥ ५० ॥

IAST लिप्यंतरण

svātantryāt sukham āpnoti svātantryāl labhate param | svātantryān nirvṛtiṃ gacchet svātantryāt paramaṃ padam || 50 ||

सरल उच्चारण: svaatantryaat sukham aapnoti svaatantryaal labhate param svaatantryaan nirvritim gachchhet svaatantryaat paramam padam (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

स्वातन्त्र्यात्, सुखम्, आप्नोति, स्वातन्त्र्यात्, लभते, परम्, स्वातन्त्र्यात्, निर्वृतिम्, गच्छेत्, स्वातन्त्र्यात्, परमम्, पदम्

स्वातन्त्र्यात् सुखम् आप्नोति
सच्ची स्वतंत्रता (आत्म-निर्भरता) से ही सच्चा सुख मिलता है
स्वातन्त्र्यात् परम् लभते
स्वतंत्रता से ही परम ब्रह्म की प्राप्ति होती है
स्वातन्त्र्यात् निर्वृतिम् गच्छेत्
स्वतंत्रता से ही चित्त की परम शांति (निर्वृति) मिलती है
स्वातन्त्र्यात् परमम् पदम्
और स्वतंत्रता से ही परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सच्ची आंतरिक स्वतंत्रता से ही सुख मिलता है, स्वतंत्रता से ही परम तत्त्व मिलता है, स्वतंत्रता से ही परम शांति मिलती है और स्वतंत्रता से ही परम पद की प्राप्ति होती है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अष्टावक्र गीता का महा-उद्घोष है। ‘स्वातंत्र्य’ का अर्थ है अपने स्वरूप में स्थित होना, किसी दूसरे पर निर्भर न होना (स्व-तन्त्र)। जब तक मनुष्य किसी दूसरे व्यक्ति, वस्तु, पद या परिस्थिति पर सुख के लिए निर्भर है, तब तक वह परतंत्र और दुखी है। जैसे ही वह सारी मानसिक निर्भरताओं को छोड़कर केवल अपनी आत्मा पर निर्भर हो जाता है, उसे सच्चा सुख, परम शांति, परम तत्त्व और मोक्ष का सर्वोच्च पद एक साथ मिल जाते हैं।

सरल हिन्दी में समझें

जब तक आप किसी दूसरे से पूछकर जीते हैं कि "क्या मैं खुश रह सकता हूँ?", तब तक आप गुलाम हैं।

सच्ची आज़ादी यह है कि आपकी खुशी किसी इंसान, किसी पैसे या किसी परिस्थिति की मोहताज न रहे।

अष्टावक्र कहते हैं कि इस दुनिया का सबसे बड़ा सुख, सबसे गहरी शांति और परमात्मा का सबसे ऊँचा मुकाम केवल और केवल अपने आत्म-स्वरूप में पूरी तरह स्वतंत्र होने से मिलता है। जब आप भीतर से आज़ाद हैं, तो आप सम्राट हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. स्वातन्त्र्यात् का चार बार प्रयोग अद्वैत वेदांत में आंतरिक स्वाधीनता की सर्वोच्च महिमा को सिद्ध करता है। 2. परतंत्रता ही समस्त दुखों की जननी है (‘सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्’—मनुस्मृति ४.१६०)। 3. स्वतंत्रता का अर्थ अहंकार का मनमानापन नहीं, बल्कि आत्मा का स्व-महिमा में प्रतिष्ठित होना है। 4. सुखम्, परम्, निर्वृतिम्, परमं पदम्—ये चारों शब्द एक ही आत्म-साक्षात्कार के विभिन्न आयाम हैं। 5. यह साधक को किसी भी प्रकार की मानसिक, आध्यात्मिक या गुरु-निर्भरता से ऊपर उठाकर आत्म-दीप बनने का संदेश देता है। 6. उपनिषदों के ‘स्वाराज्य सिद्धि’ (अपने साम्राज्य की प्राप्ति) का यह सीधा उद्घोष है।

उदाहरण से समझें: जैसे पिंजरे का दरवाज़ा खुलते ही पंछी खुले आसमान में उड़कर परम आनंद पाता है, वैसे ही मानसिक निर्भरताओं का पिंजरा टूटते ही आत्मा परम पद में प्रतिष्ठित हो जाती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी भारी कर्ज और ईएमआई से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं, तो आपको जो असीम राहत और स्वाधीनता महसूस होती है; मानसिक वासनाओं से मुक्त होकर आत्मा को ऐसा ही परम सुख मिलता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपनी खुशी के लिए दूसरों की ओर देखना बंद कीजिए; आप अपनी आत्मा में पूरी तरह स्वतंत्र हैं, यही सच्ची मुक्ति है।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘स्वातन्त्र्यात्’ का अर्थ सामाजिक नियमों या पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से मनमाना पलायन नहीं है; यह अंतःकरण की पूर्ण स्वाधीनता है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन किसी से सहानुभूति या खुशामद की उम्मीद करे, तो कहें: "मैं अपनी आत्मा में स्वतंत्र और पूर्ण हूँ, मुझे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं।" (अकेलेपन में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी मानसिक शांति और खुशी किसी दूसरे इंसान के व्यवहार पर टिकी हुई है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट अपनी रीढ़ सीधी करके बैठें और सीना तानकर अनुभव करें: "मैं पूर्णतः स्वतंत्र हूँ; मेरी शांति किसी पर निर्भर नहीं, मैं स्वयं परम पद हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: आंतरिक स्वतंत्रता से ही सुख, परम तत्त्व, शांति और सर्वोच्च पद की प्राप्ति होती है।

English

Translation: Through inner freedom one attains happiness, through freedom one reaches the Supreme, through freedom one comes to peace, through freedom to the Ultimate State.

Simple explanation: Through absolute inner freedom one attains true happiness; through freedom one reaches the Supreme; through freedom one enters perfect tranquility; and through freedom one abides in the Ultimate State.

विषय और संबंधित श्लोक

  • स्वातन्त्र्य
  • स्वाराज्य
  • परम-पद
  • आत्म-निर्भरता
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.49: तस्य चेष्टा हि बालवत्।
  • श्लोक 18.51: अकर्तृत्वमभोक्तृत्वम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 329–331 (PDF पृ. 336–338)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पचासवाँ श्लोक।