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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.51
सत्यापित
मूल संस्कृत
अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा । तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥
IAST लिप्यंतरण
akartṛtvam abhoktṛtvaṃ svātmano manyate yadā | tadā kṣīṇā bhavanty eva samastāś cittavṛttayaḥ || 51 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
अकर्तृत्वम्, अभोक्तृत्वम्, स्व-आत्मनः, मन्यते, यदा, तदा, क्षीणाः, भवन्ति, एव, समस्ताः, चित्त-वृत्तयः
- यदा मन्यते
- जब मनुष्य अपने अंतःकरण में यह दृढ़ निश्चय कर लेता है
- स्व-आत्मनः अकर्तृत्वम्
- कि मेरी आत्मा सर्वथा अकर्ता है
- अभोक्तृत्वम्
- और सर्वथा अभोक्ता (फल न भोगने वाली) है
- तदा समस्ताः चित्त-वृत्तयः
- तब चित्त की सारी लहरें और वासनाएँ
- क्षीणाः भवन्ति एव
- स्वतः पूरी तरह नष्ट और शांत हो जाती हैं
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जब साधक अपनी आत्मा को सर्वथा अकर्ता और अभोक्ता जान लेता है, तब चित्त की समस्त वृत्तियाँ स्वतः ही सर्वथा क्षीण (शांत) हो जाती हैं।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: चित्त में वृत्तियाँ और विचार क्यों उठते हैं? केवल इसलिए कि मन सोचता है "मैं यह काम करूँगा" (कर्तृत्व) और "इसका फल मैं भोगूँगा" (भोक्तृत्व)। जब तक यह कर्ता-भोक्ता का अहंकार जिंदा है, तब तक चित्त शांत नहीं हो सकता। जैसे ही आत्मज्ञान से यह समझ आ जाता है कि आत्मा न कुछ करती है और न भोगती है, सारे कर्म प्रकृति और शरीर के हैं, वैसे ही चित्त के सारे संकल्प-विकल्प जड़ से कटकर शांत हो जाते हैं।
सरल हिन्दी में समझें
कल्पना कीजिए कि एक नौकर आपके घर में सामान इधर से उधर रख रहा है। अगर आप खुद को उसका मालिक मानकर बैठ जाएँ कि "यह सब मुझे करना है", तो आप थक जाएँगे।
दिमाग में विचार और चिंताएं इसलिए उठती हैं क्योंकि आप सोचते हैं कि "मुझे यह सब संभालना है और भुगतना है।"
लेकिन जैसे ही आप समझ जाते हैं कि आपकी आत्मा न तो कुछ करने वाली है और न कुछ भोगने वाली, दिमाग की सारी भागदौड़ उसी पल थम जाती है। पूरा मन शांत हो जाता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. अकर्तृत्वम् और अभोक्तृत्वम् अद्वैत वेदांत के दो सबसे शक्तिशाली अस्त्र हैं जो कर्मबंधन को काटते हैं। 2. समस्ताश्चित्तवृत्तयः क्षीणाः भवन्ति योगसूत्र के ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ का ज्ञान-मार्ग द्वारा सहज समाधान है। 3. वृत्तियों को दबाने की ज़रूरत नहीं होती; उनके मूल कारण (कर्तापन) को हटाते ही वे स्वतः विलीन हो जाती हैं। 4. यह गीता के ‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥’ (३.२७) का सीधा भाष्य है। 5. साधक को मन से लड़ने के बजाय कर्तापन के मिथ्या अभिमान को छोड़ने का निर्देश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे चूल्हे से लकड़ी निकाल लेने पर आग अपने आप बुझ जाती है, वैसे ही कर्तापन का भाव हटते ही मन की सारी वृत्तियाँ अपने आप शांत हो जाती हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी कंपनी के प्रोजेक्ट से आधिकारिक रूप से कार्यमुक्त हो जाते हैं, तो उस प्रोजेक्ट की दिक्कतों की चिंता आपके दिमाग से तुरंत गायब हो जाती है; अकर्ता भाव मन को ऐसे ही शांत करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: कर्ता और भोक्ता बनने का झूठा बोझ उतार फेंकिए; आप न करने वाले हैं न भोगने वाले, आप केवल शुद्ध साक्षी हैं।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘अकर्तृत्वं मन्यते’ का अर्थ अपने कर्तव्यों से भागना नहीं है; यह कर्म करते हुए भी आंतरिक कर्ता-अहंकार से मुक्ति का सूत्र है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब काम का बहुत भारी तनाव महसूस हो, तो 2 मिनट आँखें मूँदकर कहें: "प्रकृति कार्य कर रही है, मेरी आत्मा अकर्ता और अभोक्ता है।" (तनाव के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने सिर पर कर्तापन का झूठा ताज पहनकर चिंताओं की आग में जल रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "हाथ-पैर और मन काम कर रहे हैं; मैं सदा अकर्ता, अभोक्ता और परम शांत साक्षी आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: जब आत्मा को अकर्ता और अभोक्ता जान लिया जाता है, तब चित्त की समस्त वृत्तियाँ स्वतः शांत हो जाती हैं।
English
Translation: When one realizes oneself to be neither the doer nor the enjoyer, then all the modifications of the mind naturally dissolve away.
Simple explanation: When one truly recognizes the Self to be neither the agent of action nor the experiencer of results, then all fluctuations of the mind spontaneously dissolve into tranquility.
विषय और संबंधित श्लोक
- अकर्तृत्व
- अभोक्तृत्व
- चित्तवृत्ति-क्षय
- साक्षी-विश्रांति
- श्लोक 18.50: स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्।
- श्लोक 18.52: उच्छृङ्खलाप्यकृतिका स्थितिः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का इक्यावनवाँ श्लोक।