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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक १०/१००10%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.10

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता । न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः ॥ १० ॥

IAST लिप्यंतरण

na vikṣepo na caikāgryaṃ nātibodho na mūḍhatā | na sukhaṃ na ca vā duḥkham upaśāntasya yoginaḥ || 10 ||

सरल उच्चारण: na vikshepo na chaikaagryam naatibodho na moodhataa na sukham na cha vaa duhkham upashaantasya yoginah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, विक्षेपः, न, च, एकाग्र्यम्, न, अतिबोधः, न, मूढता, न, सुखम्, न, च, वा, दुःखम्, उपशान्तस्य, योगिनः

उपशान्तस्य योगिनः
परम उपशम (शांति) को प्राप्त हुए योगी के लिए
न विक्षेपः न च एकाग्र्यम्
न मन का कोई भटकाव (विक्षेप) है और न एकाग्रता का हठ
न अतिबोधः न मूढता
न कोई अति-पांडित्य का घमंड है और न कोई मूर्खता
न सुखम् न च वा दुःखम्
और न सांसारिक सुख है और न कोई दुख

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

पूर्ण शांत (उपशांत) योगी के लिए न कोई विक्षेप है न एकाग्रता, न अति-ज्ञान है न मूढ़ता, और न सुख है न दुख।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अठारहवें प्रकरण के केंद्रीय विषय ‘उपशम’ की परिभाषा देता है। उपशांत योगी वह है जिसके मन के सारे द्वंद्व शांत हो चुके हैं। वह ध्यान में मन को जबरन एकाग्र करने का हठ नहीं करता, क्योंकि उसका मन कहीं भटकता ही नहीं (न विक्षेपः)। वह खुद को बड़ा ज्ञानी नहीं समझता और न वह मूर्ख है। उसके लिए अनुकूलता में कोई हर्ष नहीं और प्रतिकूलता में कोई शोक नहीं। वह इन सारे मानसिक तरंगों से पार होकर अपनी स्वाभाविक शांति में प्रतिष्ठित रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

जो व्यक्ति पूरी तरह शांत हो चुका है, उसके मन में कोई खींचतान नहीं होती।

उसे मन को जबरन एकाग्र करने की कोशिश नहीं करनी पड़ती, क्योंकि उसका मन कहीं भटकता ही नहीं। वह न तो बहुत बड़ा पंडित बनने का दिखावा करता है और न अज्ञानी रहता है।

उसके लिए सांसारिक सुख और दुख दोनों ऐसे हैं जैसे हवा के झोंके। वह किसी चीज़ से न चिपकता है और न भागता है। वह हर समय एक गहरी, अचल और सहज शांति में टिका रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. उपशान्तस्य योगिनः अष्टादश प्रकरण का केंद्रीय पारिभाषिक शब्द है। 2. विक्षेप और एकाग्रता चित्त की गतियाँ हैं; आत्म-स्थिति इन दोनों से परे है। 3. अतिबोध (intellectual pride) और मूढ़ता (ignorance) दोनों अविद्या के ही सूक्ष्म रूप हैं। 4. सुख-दुख के द्वंद्व का अभाव ही मोक्ष का प्रत्यक्ष अनुभव है। 5. यह हठयोग की जबरन एकाग्रता के स्थान पर सहज समाधि की प्रतिष्ठा करता है। 6. साधक को समस्त मानसिक संघर्षों से मुक्त होकर सहज प्रशांतता में टिकने का मार्ग दिखाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे जब हवा पूरी तरह बंद हो जाती है तो दीप की लौ बिना हिले-डुले शांत जलती है, वैसे ही उपशांत योगी का चित्त समस्त द्वंद्वों से शांत रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी बहुत तनावपूर्ण स्थिति के बाद सब कुछ सुलझ जाने पर एक गहरी राहत की सांस लेते हैं और कोई नया काम नहीं करना चाहते; योगी का जीवन उसी सतत विश्रांति का रूप है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मन को जबरन एकाग्र करने का तनाव छोड़िए; जब सारे द्वंद्व शांत होंगे, तो उपशम की सहज शांति अपने आप प्रकट होगी।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न सुखं न दुःखम्’ का अर्थ पत्थर की तरह भावशून्य या संवेदनहीन हो जाना नहीं है; यह आंतरिक संतुलन और समभाव की बात है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन भटके, तो खुद को डांटने या जबरन एकाग्र करने के बजाय बस चुपचाप भटकाव को देखें; वह अपने आप शांत हो जाएगा। (दिनभर)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं ध्यान लगाने को भी मन की एक नई लड़ाई बना रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न मुझे एकाग्र होना है, न भटकना है; मैं केवल उपशांत, अचल चेतना हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: पूर्ण शांत योगी के लिए न विक्षेप है न एकाग्रता, न अति-ज्ञान है न मूढ़ता, और न सुख है न दुख।

English

Translation: For the fully tranquil yogi, there is neither distraction nor one-pointed concentration, neither intellectual brilliance nor dullness, neither pleasure nor pain.

Simple explanation: For the sage who has arrived at absolute pacification (upaśānta), all psychological polarities collapse. He feels no need to force mental concentration because mental agitation has ceased entirely; he abides beyond joy and sorrow.

विषय और संबंधित श्लोक

  • उपशांत-योगी
  • विक्षेप-एकाग्रता-पार
  • अतिबोध-मूढ़ता-पार
  • उपशम-स्थिति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.9: तूष्णीम्भूतस्य योगिनः।
  • श्लोक 18.11: स्वाराज्ये भैक्षवृत्तौ।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 268–269 (PDF पृ. 275–276)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का दसवाँ श्लोक।