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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९/१००9%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.9

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना । सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः ॥ ९ ॥

IAST लिप्यंतरण

ayaṃ so'ham ayaṃ nāham iti kṣīṇā vikalpanā | sarvam ātmeti niścitya tūṣṇīmbhūtasya yoginaḥ || 9 ||

सरल उच्चारण: ayam soham ayam naaham iti ksheenaa vikalpanaa sarvam aatmeti nishchitya tooshneembhootasya yoginah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अयम्, सः, अहम्, अयम्, न, अहम्, इति, क्षीणा, विकल्पना, सर्वम्, आत्मा, इति, निश्चित्य, तूष्णीम्-भूतस्य, योगिनः

सर्वम् आत्मा इति निश्चित्य
'सब कुछ मेरी ही आत्मा है’ ऐसा पक्का निश्चय करके
तूष्णीम्-भूतस्य योगिनः
परम मौन में स्थित हुए योगी की
अयम् सः अहम्
'यह वह (ब्रह्म) मैं हूँ’
अयम् न अहम् इति
और 'यह (शरीर आदि) मैं नहीं हूँ’ ऐसी
विकल्पना क्षीणा
समस्त मानसिक कल्पनाएं सर्वथा क्षीण हो जाती हैं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

‘सब कुछ आत्मा ही है’—ऐसा निश्चय करके परम मौन में स्थित योगी की ‘यह मैं हूँ’ और ‘यह मैं नहीं हूँ’ की सारी कल्पनाएँ क्षीण हो जाती हैं।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: साधना के आरंभ में साधक ‘नेति-नेति’ (यह मैं नहीं हूँ) का विचार करता है और फिर ‘सोऽहम्’ (वह परमात्मा मैं हूँ) का ध्यान करता है। किंतु जब यह साक्षात हो गया कि सब कुछ केवल आत्मा ही है, तो फिर ‘यह मैं हूँ’ और ‘यह मैं नहीं हूँ’ का भेद भी एक कल्पना मात्र सिद्ध हो जाता है। जब कोई दूसरा बचा ही नहीं, तो किससे अलग होना? ऐसा योगी ‘तूष्णीम्’—अर्थात मन और वाणी दोनों के परम मौन में स्थित हो जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

साधना की शुरुआत में हम सोचते हैं—"मैं शरीर नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ।"

लेकिन जब सच पूरी तरह समझ आ जाता है कि यह पूरी दुनिया ही मेरी आत्मा है, तो फिर "यह मैं हूँ और यह मैं नहीं हूँ" का हिसाब-किताब भी खत्म हो जाता है। जब सब कुछ आप ही हैं, तो क्या छोड़ना और क्या पकड़ना?

ऐसा योगी बिल्कुल चुप (तूष्णीम्) हो जाता है। उसके दिमाग के सारे सवाल, सारे मंत्र और सारे विचार शांत हो जाते हैं और वह एक गहरे सन्नाटे और शांति में डूब जाता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. सोऽहम् और नाहम् दोनों विचार की अवस्थाएं हैं; अद्वैत में इन दोनों का अतिक्रमण हो जाता है। 2. सर्वमात्मेति निश्चित्य छांदोग्य के ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ का पूर्ण अनुभव है। 3. तूष्णीम्-भूतस्य पद केवल वाक्-मौन नहीं, बल्कि चित्त-मौन (mind transcending itself) का परिचायक है। 4. विकल्पनाओं का क्षय होना ही वास्तविक समाधि है। 5. यह साधक को बौद्धिक अद्वैत (intellectual non-duality) से उठाकर मौन अनुभूति (silent realization) में ले जाता है। 6. परम मौन ही सत्य की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।

उदाहरण से समझें: जैसे सोने का पूरा पहाड़ हो जाने पर कोई यह नहीं कहता कि "यह कंगन है और यह हार नहीं", सब केवल सोना है; वैसे ही सब कुछ आत्मा हो जाने पर ‘मैं’ और ‘ना-मैं’ का भेद मिट जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी शांत झील के किनारे अकेले बैठते हैं और मन में कोई विचार, शिकायत या तुलना नहीं होती, बस एक गहरा मौन होता है; योगी का जीवन उसी मौन का शाश्वत रूप बन जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: ‘यह मैं हूँ और यह मैं नहीं’ का विभाजन छोड़ दीजिए; जब सब कुछ आत्मा है, तो परम मौन में विश्राम कीजिए।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘तूष्णीम्भूतस्य’ का अर्थ समाज में गूंगे या उदास हो जाना नहीं है; यह आंतरिक विचारों के शांत होने और आत्म-संतुष्टि की बात है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज दिन में 5 मिनट के लिए बिना किसी विचार के पूरी तरह मौन बैठें; न कुछ बोलें, न मन में कोई योजना बनाएँ। (मौन समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी अपने मन में ‘मैं’ और ‘दूसरे’ का मानसिक खेल खेल रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन से कहें: "सब कुछ मेरी ही आत्मा है, अब कोई विभाजन नहीं है; मैं मौन में विश्राम करता हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: सब कुछ आत्मा है—यह जानकर मौन हुए योगी की ‘यह मैं हूँ’ और ‘यह मैं नहीं’ की सारी कल्पनाएँ मिट जाती हैं।

English

Translation: Realizing that all is the Self, for the yogi who has become utterly silent, the conceptual dualities of "this is that I" and "this am I not" completely fade away.

Simple explanation: Initially, spiritual practice relies on the discrimination of "I am not this body" and "I am Brahman." But upon realizing that all is consciousness, even this subtle polarity dissolves, and the sage abides in profound, thought-free silence (tūṣṇīmbhūta).

विषय और संबंधित श्लोक

  • तूष्णीम्-भाव
  • परम-मौन
  • सोऽहम्-पार
  • सर्वमात्म-निश्चय
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.8: किं विजानाति किं ब्रूते।
  • श्लोक 18.10: न विक्षेपो न चैकाग्र्यम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 267–268 (PDF पृ. 274–275)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का नवाँ श्लोक।