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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ११/१००11%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.11

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

स्वाराज्ये भैक्षवृत्तौ च लाभालाभे जने वने । निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः ॥ ११ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

svārājye bhaikṣavṛttau ca lābhālābhe jane vane | nirvikalpasvabhāvasya na viśeṣo'sti yoginaḥ || 11 ||

सरल उच्चारण: svaaraajye bhaikshavrittau cha laabhaalaabhe jane vane nirvikalpasvabhaavasya na visheshosti yoginah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

स्वाराज्ये, भैक्ष-वृत्तौ, च, लाभ-अलाभे, जने, वने, निर्विकल्प-स्वभावस्य, न, विशेषः, अस्ति, योगिनः

स्वाराज्ये भैक्ष-वृत्तौ च
अपना राज्य चलाने में और भिक्षावृत्ति में
लाभ-अलाभे
लाभ और हानि में
जने वने
भीड़ में और एकान्त वन में
निर्विकल्प-स्वभावस्य योगिनः
निर्विकल्प स्वभाव वाले योगी के लिए
विशेषः न अस्ति
कोई भेद नहीं रहता

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जिस योगी का स्वभाव निर्विकल्प हो गया है, उसके लिए राज्य और भिक्षा, लाभ और हानि, जनसमूह और वन में कोई भेद नहीं रहता।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

यह श्लोक पहले ड्राफ्ट में छूट गया था। मानक अष्टावक्रगीता में यह ग्यारहवाँ श्लोक है और आगे के श्लोक इसी क्रम में चलते हैं। भाव यह है कि जब चित्त विकल्पों से ऊपर उठ जाता है, तब बाहरी परिस्थिति का प्रकार शांति को घटाता-बढ़ाता नहीं। राजा जनक के सामने कही यह बात राज्य छोड़ने का आदेश नहीं है; यह भीतरी समता का वर्णन है। बाबू जालिमसिंह की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया, इसलिए सत्यापन स्थिति समीक्षा-आवश्यक रखी गई है।

सरल हिन्दी में समझें

एक व्यक्ति सिंहासन पर बैठा हो और दूसरा भिक्षा माँगता हो। बाहर से दोनों की ज़िंदगी बिल्कुल अलग दिखती है।

अष्टावक्र कहते हैं कि जिस व्यक्ति के मन में "यह अच्छा है, वह बुरा है" का झूला थम गया है, उसके लिए ये बाहरी फर्क शांति को नहीं छीनते। भीड़ में भी वह अकेला नहीं होता, और अकेले में भी वह अधूरा नहीं होता।

इसका मतलब यह नहीं कि राज्य की जिम्मेदारी छोड़ दी जाए। मतलब यह है कि जिम्मेदारी निभते हुए भी मन लाभ-हानि से हिल न जाए।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. स्वाराज्य और भैक्षवृत्ति बाहरी भूमिकाएँ हैं; निर्विकल्प चित्त उन भूमिकाओं से अपनी शांति नहीं तोलता। 2. लाभालाभे समता गीता की स्थितप्रज्ञ दृष्टि के अनुरूप है, पर यहाँ वह अभ्यास का लक्ष्य नहीं, उपशांत स्वभाव का वर्णन है। 3. जन और वन सामाजिक निकटता और एकान्त के दो छोर हैं; दोनों में विशेष न होना उदासीनता नहीं, निर्भरता का अंत है। 4. यह श्लोक 18.10 की उपशांत स्थिति को व्यावहारिक परिस्थितियों पर उतारता है। 5. जनक को संबोधित होने से यह स्पष्ट है कि गृहस्थ और राजा भी इस समता का अधिकारी है। 6. बाहरी समानता थोपना इस श्लोक का अर्थ नहीं; भीतरी अभेद इसका अर्थ है।

ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे आकाश को महल और झोपड़ी दोनों समान रूप से घेरते हैं, और आकाश किसी एक को अपना घर नहीं मानता, वैसे ही निर्विकल्प योगी राज्य और भिक्षा में बँटता नहीं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई व्यक्ति ऊँचे पद पर हो या काम ढूँढ रहा हो, और दोनों स्थितियों में उसकी नींद और वाणी एक जैसी शांत रहें, तो वह इस श्लोक की समता के करीब है। पद छोड़ देना इसका अर्थ नहीं है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: बाहर की भूमिका बदल सकती है। मन की शांति को पद, भीड़ या लाभ-हानि से मत तौलें।

सामान्य गलतफहमी

वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। राज्य और भिक्षा में भेद न देखना जिम्मेदारी छोड़ने की आज्ञा नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज अपने काम की एक ऊँची और एक साधारण परिस्थिति को याद करें, और दोनों में एक ही शांत वाक्य दोहराएँ: "मेरी शांति इस भूमिका से नहीं बँधी।" (काम के बीच)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी शांति इस बात पर टिकी है कि मैं भीड़ में सम्मानित हूँ या एकान्त में उपेक्षित?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर दो चित्र देखें: एक में आप जिम्मेदारी सँभाल रहे हैं, दूसरे में आपके पास प्रसिद्धि नहीं है। दोनों में वही श्वास रहने दें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: निर्विकल्प योगी के लिए राज्य और भिक्षा, लाभ और हानि, भीड़ और वन में कोई भेद नहीं रहता।

English

Translation: For the yogi whose nature is free of mental alternatives, there is no difference between sovereignty and alms, gain and loss, a crowd and a forest.

Simple explanation: Outer roles stop deciding the yogi’s peace. Ruling a kingdom and living on alms are different jobs, not different degrees of inner freedom.

विषय और संबंधित श्लोक

  • निर्विकल्प-समता
  • राज्य-और-भिक्षा
  • लाभ-हानि
  • जन-और-वन
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.10: उपशान्तस्य योगिनः।
  • श्लोक 18.12: क्व धर्मः क्व च वा कामः।

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक अनुमानित पुस्तक पृ. 269–270 (PDF पृ. 276–277); स्कैन इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम का ग्यारहवाँ श्लोक। पहले ड्राफ्ट में यह श्लोक छूट गया था, इसलिए आगे की संख्या एक पीछे चली गई थी। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।