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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक १६/१००16%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.16

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् । किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति ॥ १६ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

yena dṛṣṭaṃ paraṃ brahma so'haṃ brahmeti cintayet | kiṃ cintayati niścinto dvitīyaṃ yo na paśyati || 16 ||

सरल उच्चारण: yena drishtam param brahma soham brahmeti chintayet kim chintayati nishchinto dviteeyam yo na pashyati (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

येन, दृष्टम्, परम्, ब्रह्म, सः, अहम्, ब्रह्म, इति, चिन्तयेत्, किम्, चिन्तयति, निश्चिन्तः, द्वितीयम्, यः, न, पश्यति

येन परम् ब्रह्म दृष्टम्
जिसने परब्रह्म को अपने से अलग किसी वस्तु की तरह देखा है
सः अहम् ब्रह्म इति चिन्तयेत्
वह भले ही यह चिंतन करे कि 'मैं ब्रह्म हूँ’
यः द्वितीयम् न पश्यति
किंतु जो अपने से भिन्न किसी दूसरे को देखता ही नहीं
सः निश्चिन्तः किम् चिन्तयति
वह निश्चिंत पुरुष अब क्या चिंतन करे?

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जिसने परब्रह्म को (अलग रूप से) देखा है, वह चिंतन करे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’; किंतु जो दूसरे किसी को देखता ही नहीं, वह निश्चिंत पुरुष क्या चिंतन करे?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक अद्वैत साधना के सबसे सूक्ष्म बिंदु को स्पष्ट करता है। कुछ साधक दिन-रात "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) का मानसिक जप या चिंतन करते रहते हैं। अष्टावक्र कहते हैं कि यह चिंतन भी तब तक है जब तक मन में यह सूक्ष्म द्वैत बना हुआ है कि "मैं अलग हूँ और ब्रह्म अलग है, जिसे मुझे याद रखना है।" किंतु जिसने अद्वैत का साक्षात कर लिया है, जिसके लिए अपने सिवा कोई दूसरा बचा ही नहीं, वह किसका चिंतन करे? वह सर्वथा निश्चिंत होकर अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

क्या आपको दिनभर यह याद रखना पड़ता है कि "मैं एक इंसान हूँ, मैं एक इंसान हूँ"? नहीं, क्योंकि आप पहले से ही इंसान हैं।

इसी तरह, जो व्यक्ति सचमुच ब्रह्म (परमात्मा) हो चुका है, उसे बैठकर यह दोहराने की ज़रूरत नहीं होती कि "मैं ब्रह्म हूँ।"

चिंतन तो वह करे जिसे अभी भी संशय है। जिसे अपने भीतर कोई दूसरा दिखता ही नहीं, वह पूरी तरह बेफिक्र और निश्चिंत हो जाता है। वह सारे विचारों और मंत्रों से आगे निकलकर अपनी स्वाभाविक शांति में विश्राम करता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् साधन-काल का मंत्र है, सिद्धि-काल का नहीं। 2. चिंतन (cogitation) मन की एक क्रिया है; जहाँ मन शांत हो गया, वहाँ चिंतन का अभाव हो जाता है। 3. द्वितीयं यो न पश्यति अद्वैत वेदांत की चरम स्थिति है जहाँ कोई पृथक ज्ञेय नहीं बचता। 4. निश्चिन्तः पद चित्त की उस पूर्ण विश्रांति को प्रकट करता है जहाँ कोई आध्यात्मिक चिंता भी शेष नहीं। 5. यह साधक को बौद्धिक मंत्र-जाप से ऊपर उठाकर प्रत्यक्ष अपरोक्षानुभूति में स्थापित करता है। 6. जब ज्ञाता और ज्ञेय एक हो जाते हैं, तो समस्त चिंतन स्वतः शांत हो जाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे जाग जाने के बाद कोई यह चिंतन नहीं करता कि "मैं जाग गया हूँ", वह सीधे जागकर काम करता है; वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार के बाद "मैं ब्रह्म हूँ" का चिंतन छूट जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी गाड़ी को चलाना पूरी तरह सीख जाते हैं, तो आप यह नहीं सोचते कि "अब क्लच दबाना है या गियर बदलना है", सब कुछ अपने आप होता है; ज्ञानी का आत्मभाव भी इतना ही स्वाभाविक हो जाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मंत्रों को रटने का तनाव भी छोड़िए; जब कोई दूसरा है ही नहीं, तो निश्चिंत होकर अपनी सहज आत्मा में जिएँ।

सामान्य गलतफहमी

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘किं चिन्तयति निश्चिन्तः’ का अर्थ व्यावहारिक चिंतन या योजना बनाना छोड़ देना नहीं है; यह आध्यात्मिक द्वैत के चिंतन की समाप्ति है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज दिन में जब भी मन बहुत ज़्यादा आध्यात्मिक सोच-विचार में उलझ जाए, तो सब सोचना बंद करके केवल निश्चिंत बैठें। (लगभग 2 मिनट)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अभी भी "मैं ब्रह्म हूँ" को केवल दिमाग में दोहरा रहा हूँ, या यह मेरा स्वाभाविक अनुभव बन चुका है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मुझे कुछ याद नहीं रखना है; मैं निश्चिंत, अद्वितीय और अखंड आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जिसने ब्रह्म को अलग देखा वह चिंतन करे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’; जो दूसरे को देखता ही नहीं, वह निश्चिंत क्या चिंतन करे?

English

Translation: Let him who has perceived the supreme Brahman contemplate "I am Brahman"; but what can he contemplate who is free from thought, seeing no second?

Simple explanation: Repeating "I am Brahman" is a stepping stone for the seeker who still feels separate. The sage who perceives no second reality is utterly free of conceptual contemplation (niścinta); he does not think about the Self—he is the Self.

विषय और संबंधित श्लोक

  • निश्चिंत-स्थिति
  • अद्वैत-साक्षात्कार
  • चिंतन-पार
  • द्वितीय-अभाव
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.15: निर्वासनः किं कुरुते।
  • श्लोक 18.17: दृष्टो येनात्मविक्षेपः।

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक अनुमानित पुस्तक पृ. 274–275 (PDF पृ. 281–282); स्कैन इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मानक 100-श्लोक क्रम में यह श्लोक 16 है (पहले ड्राफ्ट में 15 लिखा गया था, क्योंकि स्वाराज्ये वाला श्लोक छूट गया था)। मूल पाठ सार्वजनिक अष्टावक्रगीता से मिलाया गया; इस सत्र में पुस्तक का स्कैन फिर नहीं देखा गया।