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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ८७/१००87%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.87

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः । असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः ॥ ८७ ॥

IAST लिप्यंतरण

akiñcanaḥ kāmacāro nirdvandvaś chinnasaṃśayaḥ | asaktaḥ sarvabhāveṣu kevalo ramate budhaḥ || 87 ||

सरल उच्चारण: akinychanah kaamachaaro nirdvandvash chhinnasamshayah asaktah sarvabhaaveshu kevalo ramate budhah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

अकिञ्चनः, काम-चारः, निर्द्वन्द्वः, छिन्न-संशयः, असक्तः, सर्व-भावेषु, केवलः, रमते, बुधः

अकिञ्चनः
परिग्रह (संपत्ति के अभिमान) से रहित
काम-चारः
अपनी इच्छा और सहज प्रेरणा से विचरण करने वाला
निर्द्वन्द्वः छिन्न-संशयः
द्वंद्वों से मुक्त और जिसके समस्त संशय कट चुके हैं
सर्व-भावेषु असक्तः
समस्त पदार्थों और संबंधों में अनासक्त
बुधः केवलः रमते
वह ज्ञानी अपने अकेले (अद्वैत) आत्मस्वरूप में ही सदा रमण करता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अकिंचन (संग्रह-रहित), स्वच्छंद विचरने वाला, द्वंद्वातीत, संशय-मुक्त और समस्त पदार्थों में अनासक्त ज्ञानी पुरुष केवल अपने अद्वितीय आत्मस्वरूप में ही सदा रमण करता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: ‘अकिंचन’ का अर्थ है जिसके पास कोई सांसारिक संपत्ति का अभिमान न हो। ‘कामचारः’ का अर्थ है जो किसी नियम या पाखंड की बेड़ियों में नहीं बंधा, अपनी सहज मौज में जीता है। जिसके सुख-दुख, मान-अपमान के द्वंद्व मिट चुके हैं, जिसके अविद्या रूपी संशय ज्ञान की तलवार से कट चुके हैं, वह ज्ञानी किसी भी सांसारिक वस्तु में चिपके बिना अकेले (केवलः) अपने आत्मा के आनंद में मग्न रहता है। उसे किसी साथी या मनोरंजन की ज़रूरत नहीं होती।

सरल हिन्दी में समझें

जो इंसान अंदर से पूरी तरह अमीर हो चुका है, उसे बाहर किसी चीज़ को इकट्ठा करने की ज़रूरत नहीं होती।

वह बिल्कुल हल्का होकर जीता है, जहाँ मन चाहे वहाँ सहजता से जाता है, और उसके मन में कोई शक या द्वंद्व नहीं बचता।

उसे खुश रहने के लिए किसी भीड़, किसी पार्टी या किसी सहारे की ज़रूरत नहीं है। वह अपने अकेलेपन में, अपने ही भीतर इतना मगन रहता है जैसे कोई शहंशाह अपने तख्त पर बैठा हो।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अकिञ्चनः परिग्रह और स्वामित्व के आत्यंतिक त्याग का द्योतक है। 2. कामचारः स्वच्छंदता का प्रतीक है—सामाजिक पाखंडों और कृत्रिम प्रतिबंधों से मुक्ति। 3. निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः गीता के ‘छिन्दैनं संशयं योगमातिष्ठ’ (४.४२) की प्रत्यक्ष सिद्धि है। 4. केवलो रमते कैवल्य की सर्वोच्च अनुभूति है—आत्मा अपनी अद्वैत महिमा में अकेली ही पूर्ण है। 5. साधक को बाहरी संगति और संग्रह की भूख से छुड़ाकर आत्म-रमण की ओर ले जाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे सिंह वन में अकेला घूमता हुआ भी अपनी शक्ति में मस्त रहता है और उसे किसी झुंड की ज़रूरत नहीं होती, वैसे ही ज्ञानी अपने आत्म-स्वरूप में अकेला रमण करता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक व्यक्ति जो वीकेंड पर अकेले किसी शांत पहाड़ी पर बैठकर सूर्यास्त देखता है और उसे फोन या दोस्तों की कमी तनिक भी नहीं खलती; ज्ञानी अपने भीतर ऐसे ही परम तृप्त रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अकेलेपन से डरना बंद कीजिए; आपकी आत्मा इतनी परिपूर्ण है कि जब आप भीतर उतरते हैं, तो अकेलापन ही परम आनंद बन जाता है।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘कामचारः’ का अर्थ अनैतिक या गैर-कानूनी आचरण करना नहीं है; यह आंतरिक बंधनों और पाखंड से मुक्ति का प्रतीक है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज दिन में 15 मिनट बिना किसी फोन, किताब या बातचीत के अकेले बैठें; अपने भीतर की शांति का आनंद लें। (एकांत का अभ्यास)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अकेले रहने से डरता हूँ और खालीपन को भरने के लिए दिन-रात लोगों और सोशल मीडिया के पीछे भागता हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "मैं अकेला हूँ, अद्वितीय हूँ, पूर्ण हूँ; मुझे किसी बाहरी साथी की ज़रूरत नहीं, मैं स्वयं आनंद हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: संग्रह-रहित, द्वंद्वातीत और संशय-मुक्त ज्ञानी सबमें अनासक्त होकर अपनी आत्मा में ही रमण करता है।

English

Translation: Possessionless, moving at will, free from dualities and with doubts severed, unattached to all objects, the wise one delights in solitude.

Simple explanation: Without possessions, moving freely at will, beyond dualities and with all doubts severed, unattached to all phenomena, the wise sage rejoices solely in the solitary Self.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अकिंचन
  • कामचार
  • छिन्न-संशय
  • केवल-रमण
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.86: नास्य चिन्ता महात्मनः।
  • श्लोक 18.88: निर्ममः शोभते धीरः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 403–405 (PDF पृ. 410–412)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सत्तासीवाँ श्लोक।