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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.95
सत्यापित
मूल संस्कृत
ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः । सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहंकारोऽनहंकृतिः ॥ ९५ ॥
IAST लिप्यंतरण
jñaḥ sacinto'pi niścintaḥ sendriyo'pi nirindriyaḥ | subuddhir api nirbuddhiḥ sāhaṅkāro'nahaṅkṛtiḥ || 95 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
ज्ञः, स-चिन्तः, अपि, निश्चिन्तः, स-इन्द्रियः, अपि, निरिन्द्रियः, सुबुद्धिः, अपि, निर्बुद्धिः, स-अहंकारः, अनहंकृतिः
- ज्ञः स-चिन्तः अपि निश्चिन्तः
- तत्त्वज्ञानी चिंतायुक्त दिखने पर भी भीतर से सर्वथा निश्चिंत है
- स-इन्द्रियः अपि निरिन्द्रियः
- इंद्रियों से युक्त होकर भी इंद्रियातीत (अलिप्त) है
- सुबुद्धिः अपि निर्बुद्धिः
- कुशाग्र बुद्धि वाला होकर भी बुद्धि के आग्रहों से परे है
- स-अहंकारः अनहंकृतिः
- और लोकव्यवहार में ‘मैं’ कहता हुआ भी वास्तव में अहंकार-शून्य है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी चिंतन करता हुआ दिखने पर भी भीतर से निश्चिंत है, इंद्रियों से युक्त होकर भी इंद्रियातीत है, उत्तम बुद्धि वाला होकर भी बुद्धिरहित (निर्विकल्प) है, और ‘मैं’ कहता हुआ भी अहंकार-शून्य है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह ज्ञानी के व्यवहार की सबसे सूक्ष्म पहेली है। बाहर से जब वह किसी समस्या पर विचार करता दिखता है, तो लगता है कि वह चिंतित है; किंतु भीतर से वह पूर्णतः निश्चिंत और साक्षी रहता है। जब वह आँखों और कानों से काम लेता है, तो लगता है कि वह इंद्रियों में है; किंतु वह जानता है कि आत्मा निरिंद्रिय है। जब वह बुद्धिमत्ता से निर्णय लेता है, तो बुद्धि का घमंड नहीं होता। और जब वह व्यवहार में कहता है कि "मैं जनक हूँ या मैं अष्टावक्र हूँ", तो भी उसके अंदर कर्तृत्व का कोई अहंकार नहीं होता। वह पूर्णतः निर्लेप रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
एक अच्छे अभिनेता को देखिए: जब वह नाटक में किसी परेशान राजा का रोल करता है, तो उसके माथे पर चिंता की लकीरें दिखती हैं। लेकिन क्या वह अंदर से सचमुच परेशान है? नहीं, वह अंदर से बिल्कुल शांत है।
ज्ञानी व्यक्ति का जीवन भी वैसा ही अद्भुत होता है। वह बाहर से सोचता-विचारता दिखता है पर अंदर से पूरी तरह निश्चिंत रहता है।
वह इंद्रियों का उपयोग करता है पर उनका गुलाम नहीं बनता। वह बुद्धि से सही फैसले लेता है पर बुद्धि का घमंड नहीं करता। और वह "मैं" शब्द बोलता है पर उसके दिल में अहंकार का कोई मैल नहीं होता।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः व्यावहारिक विचार और आंतरिक आत्म-विश्रांति के सह-अस्तित्व को सिद्ध करता है। 2. सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः उपनिषदिक सिद्धांत ‘अपाणिपादो जवनो ग्रहीता’ (श्वेताश्वतर ३.१९) का व्यावहारिक रूप है। 3. सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः प्रज्ञा की उस पराकाष्ठा का नाम है जो बौद्धिक आग्रहों और पूर्वग्रहों से मुक्त है। 4. साहंकारोऽनहंकृतिः ‘अहं’ पद के केवल व्यावहारिक प्रयोग और पारमार्थिक अहंकार-शून्यता को प्रकट करता है। 5. साधक को बाह्य क्रियाओं और आंतरिक स्थिति के इस परम विवेक को समझने का उपदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे रोबोट सारे काम इंसानों की तरह सोचकर करता है पर उसके अंदर कोई निजी अहंकार या दुख नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी सारे व्यवहार करता हुआ भी भीतर से सर्वथा अकर्ता रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक अनुभवी सीईओ जो किसी आपातकालीन संकट की मीटिंग में सारे फैसले शांति से लेता है लेकिन रात को घर जाकर पूरी तरह निश्चिंत सो जाता है; ज्ञानी संसार के दायित्वों को ऐसे ही अनासक्त भाव से निभाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया के काम सोच-समझकर कीजिए, लेकिन अंदर से निश्चिंत रहिए; आप इंद्रियों और बुद्धि से परे शुद्ध परमात्मा हैं।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘साहंकारोऽनहंकृतिः’ का अर्थ पाखंडी बनकर अहंकार को छिपाना नहीं है; यह लोक-व्यवहार में ‘मैं’ शब्द के मात्र औपचारिक उपयोग का रहस्य है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब दिन में कोई जटिल समस्या सुलझानी पड़े, तो बुद्धि से काम लें लेकिन मन में दोहराएँ: "मैं भीतर से पूरी तरह निश्चिंत और शांत आत्मा हूँ।" (समस्या के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने विचारों और बुद्धि की योजनाओं में इतना खो जाता हूँ कि अपनी अंदरूनी निश्चिंतता को गँवा बैठता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "विचार आ रहे हैं, इंद्रियाँ काम कर रही हैं; लेकिन मैं इन सबके परे सर्वथा निश्चिंत, निरिंद्रिय और अहंकार-रहित आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: ज्ञानी सोचता हुआ भी निश्चिंत है, इंद्रियों में रहकर भी निरिंद्रिय है, और ‘मैं’ कहकर भी अहंकार-शून्य है।
English
Translation: The wise one is carefree even when appearing concerned, sensory-free even with senses, intellect-free though clever, and ego-free even when saying "I".
Simple explanation: The knower of Truth is utterly carefree even when appearing pensive, devoid of sense-clinging even with senses active, free of mental dogmatism though highly intelligent, and free of ego even in using the word "I".
विषय और संबंधित श्लोक
- निश्चिंत-ज्ञानी
- निरिन्द्रिय
- अनहंकृति
- व्यवहार-साक्षी
- श्लोक 18.94: धीरस्तृप्तः पदे पदे।
- श्लोक 18.96: न सुखी न च वा दुःखी।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पचानवेवाँ श्लोक।