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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ७३/१००73%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.73

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते । निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः ॥ ७३ ॥

IAST लिप्यंतरण

buddhiparyantasaṃsāre māyāmātraṃ vivartate | nirmamo nirahaṅkāro niṣkāmaḥ śobhate budhaḥ || 73 ||

सरल उच्चारण: buddhiparyantasamsaare maayaamaatram vivartate nirmamo nirahangkaaro nishkaamah shobhate budhah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

बुद्धि-पर्यन्त-संसारे, माया-मात्रम्, विवर्तते, निर्ममः, निरहङ्कारः, निष्कामः, शोभते, बुधः

बुद्धि-पर्यन्त-संसारे
बुद्धि तक फैला हुआ यह सारा संसार
माया-मात्रम् विवर्तते
केवल माया का विवर्त (कल्पित भ्रम) मात्र है
बुधः शोभते
किंतु यह जानने वाला ज्ञानी सुशोभित होता है
निर्ममः निरहङ्कारः निष्कामः
ममता-रहित, अहंकार-शून्य और समस्त कामनाओं से मुक्त होकर

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

बुद्धि तक फैला हुआ यह संपूर्ण संसार केवल माया का कल्पित खेल (विवर्त) मात्र है; इस सत्य को जानने वाला ज्ञानी ममतारहित, अहंकारशून्य और निष्काम होकर परम सुशोभित होता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह श्लोक वेदांत के प्रसिद्ध ‘विवर्तवाद’ का प्रतिपादन करता है। विवर्त का अर्थ है कारण का अपने स्वरूप को बदले बिना भ्रमवश किसी अन्य रूप में दिखाई देना—जैसे रस्सी का साँप रूप में दिखना। महत्तत्त्व से लेकर हमारी बुद्धि तक जो कुछ भी संसार है, वह केवल माया की कल्पना है। ज्ञानी जानता है कि आत्मा में कोई संसार नहीं है। इसलिए वह ‘यह मेरा है’ (ममता), ‘मैं हूँ’ (अहंकार) और ‘मुझे चाहिए’ (कामना)—इन तीनों विकारों से मुक्त होकर शोभा पाता है।

सरल हिन्दी में समझें

रात को सपने में हम जो शहर, पहाड़ और लोग देखते हैं, वे कहाँ से आते हैं? वे हमारे दिमाग के सिवा और कहीं नहीं होते। आँख खुलते ही सब गायब हो जाता है।

हमारी बुद्धि में चल रहा यह सारा संसार भी बिल्कुल वैसा ही एक सपना है।

ज्ञानी व्यक्ति इस सपने की सच्चाई को पहचान लेता है। वह न तो किसी चीज़ को "मेरी" कहता है, न "मैं" का घमंड करता है, और न किसी चीज़ के पीछे भागता है। वह पूरी तरह हल्का, आज़ाद और शांत होकर चमकता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. मायामात्रं विवर्तते अद्वैत वेदांत के विवर्तवाद का मुख्य आधार है—जगत की प्रातिभासिक सत्ता। 2. बुद्धिपर्यन्तसंसारे यह स्पष्ट करता है कि संसार बाह्य नहीं, बुद्धि की वृत्तियों तक ही सीमित है। 3. निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः गीता के ‘निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति’ (२.७१) का पूर्ण प्रतिफलन है। 4. ममता, अहंता और कामना—ये ही अविद्या की तीन मुख्य ग्रंथियाँ हैं जिनका नाश होते ही कैवल्य सिद्ध होता है। 5. साधक को मानसिक प्रपंच से ऊपर उठकर इन तीनों बंधनों को काटने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे सिनेमा के प्रोजेक्टर से निकलने वाली रोशनी परदे पर पूरी दुनिया रच देती है पर लाइट खुद खाली रहती है, वैसे ही बुद्धि में संसार का विवर्त होता है पर आत्मा अछूती रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

वीडियो गेम की दुनिया में आपका कैरेक्टर चाहे कितना भी बड़ा महल बना ले, वह केवल कंप्यूटर की रैम में चल रहा कोड है; बुद्धि का संसार भी ऐसा ही वर्चुअल विवर्त है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: ममता और घमंड का बोझ उतारिए; जब "मेरा" और "मैं" मिटता है, तब जीवन की असली सुंदरता और शांति खिलती है।

सामान्य गलतफहमी

यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘मायामात्रं विवर्तते’ का अर्थ व्यावहारिक कर्तव्यों की उपेक्षा करना नहीं है; यह आंतरिक अनासक्ति का आध्यात्मिक दृष्टिकोण है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब किसी चीज़ पर बहुत मालिकाना हक़ (ममता) जताने का मन करे, तो कहें: "यह सब थोड़े समय का खेल है, मेरा एकमात्र स्वरूप शुद्ध आत्मा है।" (ममता के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं उन नश्वर चीज़ों पर "यह मेरा है" का ठप्पा लगाकर खुद को बंधनों में जकड़ रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न कुछ मेरा है, न मैं कोई शरीर हूँ; मैं निर्मम, निरहंकार और निष्काम ज्योति हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: बुद्धि तक फैला संसार केवल माया का खेल है; निर्मम, निरहंकार और निष्काम ज्ञानी शोभा पाता है।

English

Translation: In this world extending up to the intellect, mere illusion unfolds; free from mine-ness, egoism, and craving, the wise one shines resplendent.

Simple explanation: In this entire empirical realm extending up to the intellect, mere maya unfolds as an illusory appearance; free from possessiveness, egoism, and craving, the wise sage shines resplendent.

विषय और संबंधित श्लोक

  • विवर्तवाद
  • निर्मम-निरहंकार
  • मायामात्र-जगत
  • निष्काम-शोभा
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.72: क्व हर्षः क्व विषादिता।
  • श्लोक 18.74: अक्षयं गतसन्तापम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 375–377 (PDF पृ. 382–384)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तिहत्तरवाँ श्लोक।