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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ७९/१००79%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.79

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा । अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ ७९ ॥

IAST लिप्यंतरण

kva dhairyaṃ kva vivekitvaṃ kva nirātaṅkatāpi vā | anirvācyasvabhāvasya niḥsvabhāvasya yoginaḥ || 79 ||

सरल उच्चारण: kva dhairyam kva vivekitvam kva niraatangkataapi vaa anirvaachyasvabhaavasya nihsvabhaavasya yoginah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, धैर्यम्, क्व, विवेकित्वम्, क्व, निरातङ्कता, अपि, वा, अनिर्वाच्य-स्वभावस्य, निःस्वभावस्य, योगिनः

अनिर्वाच्य-स्वभावस्य
जिसका स्वभाव वाणी द्वारा अनिर्वचनीय (शब्दों से परे) है
निःस्वभावस्य योगिनः
और जो किसी भी सीमित स्वभाव या गुण से रहित है, उस योगी के लिए
धैर्यम् क्व
धैर्य कहाँ?
विवेकित्वम् क्व
विवेकशीलता कहाँ?
वा निरातङ्कता अपि क्व
और निर्भयता भी कहाँ? (वह इन सभी सद्गुणों की सीमाओं से भी परे है)

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

जिसका स्वरूप अनिर्वचनीय और किसी भी सीमित स्वभाव से रहित है, उस योगी के लिए धैर्य कहाँ? विवेक कहाँ? और निर्भयता भी कहाँ? (वह समस्त विशेषणों से परे है)।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अष्टावक्र की चरम नेति-नेति दृष्टि है। पिछले श्लोक में उन्होंने ज्ञानी को "धीर" और "निरातंक" कहा था। अब वे कहते हैं कि आत्मा में ये विशेषण भी नहीं टिकते। धैर्य की ज़रूरत उसे होती है जो अधीर हो सकता हो; विवेक की ज़रूरत उसे होती है जहाँ अज्ञान का खतरा हो; और निर्भयता की बात वहाँ होती है जहाँ भय की संभावना हो। किंतु जिस योगी का स्वरूप शब्दों से परे (अनिर्वाच्य) और किसी उपाधि से रहित (निःस्वभाव) है, उसके लिए ये सारे गुण भी शांत हो जाते हैं। वह केवल शुद्ध सच्चिदानंद है।

सरल हिन्दी में समझें

जब तक कोई बीमार होता है, तब तक हम कहते हैं कि वह ठीक हो रहा है; लेकिन जब वह पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है, तो क्या हम उसे दिन-रात "मरीज़" या "दवा लेने वाला" कहते हैं? नहीं, वह सामान्य हो जाता है।

साधक को धैर्य और विवेक की ज़रूरत पड़ती है। लेकिन जब कोई अपनी असली आत्मा में पहुँच जाता है, तो वह इन सारे शब्दों और लेबल्स से भी ऊपर उठ जाता है।

वह इतना गहरा और शब्दों से परे हो जाता है कि उसे न तो धीर कहने की ज़रूरत है और न विवेकी। वह बस जैसा है, वैसा ही अद्भुत और शांत रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. अनिर्वाच्यस्वभावस्य आत्मा की अनिर्वचनीयता और अप्राप्यमनसागोचरता का द्योतक है (तैत्तिरीय २.९ ‘यतो वाचो निवर्तन्ते’)। 2. निःस्वभावस्य यह सिद्ध करता है कि आत्मा कोई वस्तु या गुण नहीं है; वह समस्त गुणों (सत्व, रज, तम) से परे निर्गुण है। 3. क्व धैर्यं क्व विवेकित्वम् सद्गुणों के अहंकार और सीमाओं के अतिक्रमण की पराकाष्ठा है। 4. साधना के उच्च शिखर पर पहुँचकर साधक को अपने "साधकपन" और "विवेकीपन" का चोला भी उतार फेंकना होता है। 5. यह अद्वैत की परम निष्कलंक और निष्प्रपंच स्थिति का उद्घाटन है।

उदाहरण से समझें: जैसे शुद्ध जल का अपना कोई रंग या स्वाद नहीं होता पर वह सब रंगों और स्वादों का आधार है, वैसे ही निःस्वभाव योगी समस्त गुणों का आधार होकर भी सबसे परे रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब कोई गणितज्ञ किसी समीकरण को सिद्ध कर लेता है, तो रफ कॉपी और पेंसिल किनारे रख दी जाती है; ज्ञानी के लिए विवेक और धैर्य के रफ नोट्स ऐसे ही किनारे हो जाते हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने ऊपर "मैं बहुत विवेकी और धीर हूँ" का लेबल भी मत चिपकाइए; सारे शब्दों से परे हो जाइए, आपका असली स्वरूप अनिर्वचनीय है।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘क्व विवेकित्वम्’ का अर्थ अविवेकी या मूर्ख हो जाना नहीं है; यह विवेक के अहंकार से भी परे सहज आत्म-स्थिति की बात है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन में अपने ज्ञान या संयम का घमंड आए, तो कहें: "मेरी आत्मा समस्त गुणों और विशेषणों से परे मौन है।" (घमंड के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपने आध्यात्मिक सद्गुणों को भी एक नई पहचान बनाकर अपने अहंकार को सजा रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर सारे शब्दों, विचारों और लेबल्स को विदा कर दें: "न मैं धीर हूँ, न विवेकी; मैं केवल अनिर्वचनीय, शुद्ध और निशब्द चैतन्य हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अनिर्वचनीय और उपाधि-रहित योगी के लिए न धैर्य है, न विवेक और न निर्भयता; वह शब्दों से परे है।

English

Translation: Where is fortitude, where is discrimination, or where even is fearlessness, for the yogi whose nature is ineffable and free of all attributes?

Simple explanation: Where is patience, where is discrimination, or where even is fearlessness, for the yogi whose nature is completely inexpressible and devoid of any conditioned attribute?

विषय और संबंधित श्लोक

  • अनिर्वाच्य-स्वभाव
  • निःस्वभाव-योगी
  • सद्गुण-अहंकार-पार
  • निर्गुण-कैवल्य
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.78: निरातङ्कस्य सर्वदा।
  • श्लोक 18.80: न स्वर्गो नैव नरको।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 387–389 (PDF पृ. 394–396)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का उनासीवाँ श्लोक।