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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ३९/१००39%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.39

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति । धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः ॥ ३९ ॥

IAST लिप्यंतरण

na śāntiṃ labhate mūḍho yataḥ śamitum icchati | dhīras tattvaṃ viniścitya sarvadā śāntamānasaḥ || 39 ||

सरल उच्चारण: na shaantim labhate moodho yatah shamitum ichchhati dheeras tattvam vinishchitya sarvadaa shaantamaanasah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, शान्तिम्, लभते, मूढः, यतः, शमितुम्, इच्छति, धीरः, तत्त्वम्, विनिश्चित्य, सर्वदा, शान्त-मानसः

मूढः शान्तिम् न लभते
अज्ञानी शांति को प्राप्त नहीं कर पाता
यतः शमितुम् इच्छति
क्योंकि वह मन को शांत करने का हठ (प्रयास) करता है
धीरः तत्त्वम् विनिश्चित्य
किंतु ज्ञानी आत्मतत्त्व का दृढ़ निश्चय करके
सर्वदा शान्त-मानसः
सदा ही शांत मन वाला रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अज्ञानी को शांति नहीं मिलती क्योंकि वह मन को शांत करने की इच्छा (प्रयास) करता है; किंतु धीर ज्ञानी तत्त्व का निश्चय करके सदा शांत मन वाला रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह मन का एक अत्यंत विचित्र स्वभाव है। जब आप मन को शांत करने की कोशिश करते हैं, तो वह कोशिश ही मन में एक नया विक्षेप और अशांति पैदा कर देती है। अज्ञानी दिन-रात इस चिंता में रहता है कि "मेरा मन कब शांत होगा।" ज्ञानी जानता है कि मन तो स्वभाव से ही चंचल है, किंतु आत्मा सदा परम शांत है। जैसे ही वह अपने आत्म-तत्त्व का निश्चय करता है, मन की चंचलता उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती और वह सदा शांत रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

अगर किसी गंदे पानी से भरे तालाब को साफ करने के लिए आप उसमें डंडा लेकर पानी को हिलाने लगें, तो क्या पानी साफ होगा? नहीं, वह और गंदा हो जाएगा। पानी को साफ करने का एक ही तरीका है—उसे छूना बंद कर दीजिए।

अज्ञानी व्यक्ति मन को शांत करने के लिए मन से ही लड़ता रहता है, और इस लड़ाई से वह और अशांत हो जाता है।

ज्ञानी समझता है कि आत्मा तो हमेशा शांत है। वह शांति ढूँढने की कोशिश ही छोड़ देता है, और अपने आप हर समय शांत रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. शमितुम् इच्छति अशांति का ही एक सूक्ष्म रूप है—इच्छा मात्र चित्त का स्पंदन है। 2. मन से लड़कर मन को शांत नहीं किया जा सकता; लोहे से लोहा कटता है पर चोट दोनों को लगती है। 3. तत्त्वं विनिश्चित्य साक्षी-भाव की प्रतिष्ठा है—यह जानना कि मन की लहरें आत्मा को नहीं छूतीं। 4. सर्वदा शान्तमानसः उस नित्य शांति का द्योतक है जो परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। 5. यह अष्टावक्र के उपशम-दर्शन का केंद्रीय सूत्र है कि शांति कोई उपलब्धि नहीं, हमारी मूल प्रकृति है। 6. साधक को मन को नियंत्रित करने के तनाव से निकालकर साक्षी-भाव में विश्राम दिलाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे कीचड़ को शांत करने के लिए किनारे बैठकर देखना पड़ता है, उसमें कूदना नहीं होता; वैसे ही मन को शांत करने के लिए साक्षी बनकर देखना होता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

अनिद्रा (इंसोम्निया) के मरीज़ जब ज़बरदस्ती सोने की कोशिश करते हैं तो नींद और भाग जाती है; लेकिन जब वे सोने की ज़िद छोड़ देते हैं तो नींद आ जाती है; मन की शांति भी ज़िद छोड़ने से मिलती है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मन को शांत करने के लिए उससे लड़ना बंद कीजिए; यह जानिए कि आपकी आत्मा सदा शांत है, और उस शांति में टिक जाइए।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘न शान्तिं लभते’ का अर्थ यह नहीं है कि शांति असंभव है; यह मन को शांत करने के गलत तरीकों की ओर इशारा है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब मन बहुत अशांत लगे, तो उससे लड़ने के बजाय कहें: "मन चल रहा है, चलने दो; मैं शांत साक्षी आत्मा हूँ।" (मानसिक अशांति में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं शांति पाने की इतनी ज़िद कर रहा हूँ कि वही ज़िद मेरे लिए तनाव बन गई है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर मन के विचारों को केवल आते-जाते देखें; किसी विचार को रोकने की कोशिश न करें; अनुभव करें कि आप शांत आकाश हैं।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अज्ञानी मन को शांत करने की इच्छा से अशांत रहता है; ज्ञानी तत्त्व का निश्चय करके सदा शांत रहता है।

English

Translation: The fool does not find peace because he desires to pacify the mind; the wise, having ascertained the Truth, is always of tranquil mind.

Simple explanation: The deluded person never attains peace because he strains to quiet the mind; whereas the steadfast sage, firmly grounded in the Truth, abides in perpetual tranquility.

विषय और संबंधित श्लोक

  • सहज-शांति
  • शमितुम्-इच्छा-त्याग
  • तत्त्व-निश्चय
  • साक्षी-विश्राम
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.38: मूलच्छेदः कृतो बुधैः।
  • श्लोक 18.40: क्वात्मनो दर्शनं तस्य।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 308–310 (PDF पृ. 315–317)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का उनतालीसवाँ श्लोक।