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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ६/१००6%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.6

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः । वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ ६ ॥

IAST लिप्यंतरण

vyāmohamātraviratau svarūpādānamātrataḥ | vītaśokā virājante nirāvaraṇadṛṣṭayaḥ || 6 ||

सरल उच्चारण: vyaamohamaatraviratau svaroopaadaanamaatratah veetashokaa viraajante niraavaranadrishtayah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

व्यामोह-मात्र-विरतौ, स्वरूप-आदान-मात्रतः, वीत-शोकाः, विराजन्ते, निरावरण-दृष्टयः

व्यामोह-मात्र-विरतौ
केवल मोह (अज्ञान) के शांत हो जाने पर
स्वरूप-आदान-मात्रतः
और अपने वास्तविक स्वरूप को स्वीकार कर लेने मात्र से
निरावरण-दृष्टयः
जिनकी दृष्टि का अज्ञान रूपी पर्दा पूरी तरह हट चुका है, वे
वीत-शोकाः विराजन्ते
शोक से सर्वथा मुक्त होकर दिव्य रूप से प्रकाशित होते हैं

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

केवल मोह के निवृत्त होने और अपने स्वरूप को पहचान लेने मात्र से, अज्ञान के आवरण से मुक्त दृष्टि वाले ज्ञानी शोकरहित होकर सुशोभित होते हैं।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: आत्म-साक्षात्कार में कुछ नया जोड़ना नहीं पड़ता, केवल जो ’व्यामोह’ (भ्रांति) है उसे हटाना होता है। जैसे बादल हटने पर सूर्य स्वतः चमकता है, वैसे ही देहाध्यास और मोह का पर्दा हटते ही साधक की दृष्टि ’निरावरण’ हो जाती है। वह अपने वास्तविक सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित होकर समस्त शोकों से पार हो जाता है और अखंड आनंद में प्रकाशित रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

मुक्ति पाने के लिए आपको कोई नई चीज़ खरीदनी या लानी नहीं है।

बस जो गलतफहमी (मोह) आपने पाल रखी है कि "मैं यह छोटा-सा, कमजोर शरीर हूँ", उसे छोड़ देना है। जैसे ही यह गलतफहमी हटती है, आपकी आँखों से अज्ञान का पर्दा हट जाता है।

फिर जीवन का कोई भी दुख, शोक या चिंता आपको छू नहीं सकती। आप अंदर से पूरी तरह हल्के होकर अपनी स्वाभाविक चमक और शांति में जीने लगते हैं।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. व्यामोह-मात्र-विरतौ स्पष्ट करता है कि अज्ञान केवल एक भ्रांति है, कोई वास्तविक वस्तु नहीं। 2. निरावरणदृष्टयः उस शुद्ध ज्ञान-दृष्टि का द्योतक है जो माया के आवरण से मुक्त हो चुकी है। 3. वीतशोकाः उपनिषदों के ‘तरति शोकमात्मवित्’ (आत्मज्ञानी शोक को पार कर जाता है) का साक्षात प्रमाण है। 4. विराजन्ते शब्द ज्ञानी की सहज, अहेतुक दिव्यता और गरिमा को व्यक्त करता है। 5. यह अद्वैत वेदांत की उस मौलिक घोषणा को पुष्ट करता है कि मोक्ष कोई निर्माण नहीं, अनावरण है। 6. साधक को व्यर्थ के कर्म-जंजाल से हटाकर केवल विवेक और आत्म-स्वीकृति पर केंद्रित करता है।

उदाहरण से समझें: जैसे गंदे चश्मे को साफ करते ही सब कुछ साफ दिखने लगता है और कोई नई आँख नहीं लगानी पड़ती, वैसे ही मोह हटने पर स्वरूप स्वतः प्रकाशित हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

जब आप किसी अँधेरे कमरे में लटकी रस्सी को सांप समझकर डर रहे हों और टॉर्च जलाते ही डर मिट जाए, तो यह उसी निरावरण दृष्टि का आधुनिक उदाहरण है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुख केवल अज्ञान के पर्दे के कारण है; मोह का पर्दा हटाइए और अपने शोकरहित, दिव्य स्वरूप में चमकिए।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘वीतशोका विराजन्ते’ का अर्थ किसी अपने के वियोग में संवेदनाहीन हो जाना नहीं है; यह आंतरिक आत्मिक संबल और शोक-मुक्ति की बात है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब भी मन में किसी बात को लेकर शोक या पछतावा हो, तो कहें: "यह अतीत केवल एक विचार है, मेरी आत्मा सदा निर्विकार और उज्ज्वल है।" (शोक के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अपनी पुरानी गलतफहमियों और पछतावे को पकड़कर अपने वर्तमान के आनंद को ढक रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें कि आपके भीतर से मोह का पर्दा हट चुका है और आपकी दृष्टि पूर्णतः निर्मल और शोकरहित है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: मोह के मिटने और स्वरूप को जानने मात्र से, आवरण-रहित दृष्टि वाले ज्ञानी शोकरहित होकर प्रकाशित होते हैं।

English

Translation: Merely upon the cessation of delusion and by accepting one’s true nature, those whose vision is unveiled shine resplendent, utterly free from sorrow.

Simple explanation: Enlightenment is not an acquisition but an unveiling. The moment the veil of delusion drops and the true Self is recognized, grief dissolves completely, and the sage abides in unclouded, radiant serenity.

विषय और संबंधित श्लोक

  • निरावरण-दृष्टि
  • व्यामोह-निवृत्ति
  • वीतशोक
  • आत्म-विराज
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.5: निर्विकल्पं निरायासं।
  • श्लोक 18.7: समस्तं कल्पनामात्रम्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 264–265 (PDF पृ. 271–272)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छठा श्लोक।