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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ८५/१००85%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.85

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः । स्वच्छन्दं चरतो देशान्यत्रास्तमितशायिनः ॥ ८५ ॥

IAST लिप्यंतरण

tuṣṭiḥ sarvatra dhīrasya yathāpatitavartinaḥ | svacchandaṃ carato deśān yatrāstamitaśāyinaḥ || 85 ||

सरल उच्चारण: tushtih sarvatra dheerasya yathaapatitavartinah svachchhandam charato deshaan yatraastamitashaayinah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

तुष्टिः, सर्वत्र, धीरस्य, यथा-पतित-वर्तिनः, स्वच्छन्दम्, चरतः, देशान्, यत्र, अस्तमित-शायिनः

धीरस्य सर्वत्र तुष्टिः
धीर ज्ञानी की सब जगह पूर्ण संतुष्टि (तृप्ति) रहती है
यथा-पतित-वर्तिनः
जो बिना माँगे जो कुछ सामने आ जाए उसी में संतुष्ट रहता है
स्वच्छन्दम् देशान् चरतः
और बिना किसी बंधन के स्वतंत्र रूप से देशों में विचरण करता है
यत्र अस्तमित-शायिनः
और जहाँ सूर्यास्त हो जाए, वहीं रात को सो जाता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

धीर ज्ञानी की सब जगह पूर्ण संतुष्टि रहती है; जो अनायास सामने आ जाए उसी में निर्वाह करता हुआ, वह स्वतंत्र विचरण करता है और जहाँ सूर्यास्त हो जाए वहीं सो जाता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह अवधूत और जीवनमुक्त के परम स्वाधीन और संतोषी जीवन का चित्र है। ज्ञानी को रहने के लिए किसी खास महल या बिस्तर की ज़रूरत नहीं होती। वह प्रारब्धवश जहाँ चला जाए, जो भोजन बिना माँगे मिल जाए, उसी में परम तृप्त रहता है। जब सूरज ढल जाता है, तो जहाँ वह होता है—चाहे पेड़ के नीचे, किसी मंदिर में या खुले मैदान में—वहीं धरती को बिछौना बनाकर सो जाता है। उसका पूरा अस्तित्व चिंता-मुक्त और आनंदमय होता है।

सरल हिन्दी में समझें

एक पंछी को देखिए: वह सुबह आकाश में आज़ाद उड़ता है, जहाँ दाना मिल जाए खा लेता है, और शाम को जिस पेड़ की डाली मिले वहीं चुपचाप सो जाता है। क्या उसके सिर पर कोई ईएमआई, किराया या चिंता होती है?

ज्ञानी व्यक्ति का जीवन भी उस पंछी की तरह बिल्कुल हल्का और मस्त हो जाता है।

उसे जो मिल जाए, वह उसी में खुश रहता है। न कोई शिकायत, न कोई योजना, न कोई तनाव। जहाँ रात हो गई, वहीं चैन की नींद सो गया। वह दुनिया का सबसे संतुष्ट इंसान होता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. तुष्टिः सर्वत्र आत्मा की आत्यंतिक पूर्णता का व्यावहारिक रूप है—परिस्थितियों से अप्रभावित संतोष। 2. यथापतितवर्तिनः प्रारब्ध के पूर्ण और निर्विरोध स्वीकार को दर्शाता है (यदृच्छालाभसन्तुष्टः)। 3. स्वच्छन्दं चरतः आंतरिक स्वतंत्रता और सामाजिक संकोचों से मुक्ति का प्रतीक है। 4. यत्रास्तमितशायिनः घर, संपत्ति और आश्रय के मोह से सर्वथा मुक्ति की चरम पराकाष्ठा है। 5. साधक को जीवन के प्रति अनावश्यक योजनाएँ और चिंताएँ छोड़कर सहज संतोष में जीने का संदेश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे हवा बिना किसी घर के सारे संसार में स्वतंत्र बहती है और जहाँ रुक जाए वहीं शांत हो जाती है, वैसे ही ज्ञानी बिना किसी बंधन के सर्वत्र संतुष्ट रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक सोलो बैकपैकर जो कम से कम सामान लेकर पूरी दुनिया घूमता है और जहाँ रात होती है वहीं टेंट लगाकर तारों को देखते हुए सो जाता है; ज्ञानी जीवन की यात्रा को ऐसे ही हल्के मन से तय करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: चीज़ों को जोड़ने और आराम की शर्तें लगाने की आदत छोड़िए; जो मिले उसमें तृप्त रहिए, आपका हर दिन एक सुंदर उत्सव बन जाएगा।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ‘यत्रास्तमितशायिनः’ का अर्थ आवारा या बेघर हो जाना नहीं है; यह आंतरिक स्वाधीनता और न्यूनतम आवश्यकताओं में पूर्ण तृप्ति का आदर्श है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जो भी भोजन सामने आए, बिना किसी नुक्स निकालने के पूरे प्रेम और तृप्ति से खाएँ। (भोजन के समय संतोष)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी संतुष्टि हमेशा इस बात पर निर्भर करती है कि मेरे मनमुताबिक एसी, कमरा या खाना मिला या नहीं?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "धरती मेरा बिछौना है, आकाश मेरी छत है; मैं जहाँ भी हूँ, अपनी आत्मा में पूर्णतः तृप्त और सुरक्षित हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: जो मिले उसी में संतुष्ट ज्ञानी स्वतंत्र विचरता है और जहाँ शाम हो जाए वहीं सो जाता है।

English

Translation: Contentment is everywhere for the steadfast one who lives on whatever comes by chance, wandering freely and sleeping wherever the sun sets.

Simple explanation: Unbroken contentment abides everywhere for the steadfast sage who lives on whatever presents itself naturally, wandering spontaneously through lands and sleeping wherever the sun happens to set.

विषय और संबंधित श्लोक

  • सर्वत्र-तुष्टि
  • यथापतित-वृत्ति
  • स्वच्छन्द-विचरण
  • अवधूत-विश्रांति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.84: निराशः शोभते बुधः।
  • श्लोक 18.86: पततूदेतु वा देहो।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 399–401 (PDF पृ. 406–408)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का पचासीवाँ श्लोक।