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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक २७/१००27%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.27

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः । न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥

IAST लिप्यंतरण

nānāvicārasuśrānto dhīro viśrāntim āgataḥ | na kalpate na jānāti na śṛṇoti na paśyati || 27 ||

सरल उच्चारण: naanaavichaarasushraanto dheero vishraantim aagatah na kalpate na jaanaati na shrinoti na pashyati (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

नाना-विचार-सुश्रान्तः, धीरः, विश्रान्तिम्, आगतः, न, कल्पते, न, जानाति, न, शृणोति, न, पश्यति

नाना-विचार-सुश्रान्तः
अनेक प्रकार के मानसिक तर्कों और विचारों से भलीभाँति थककर
विश्रान्तिम् आगतः धीरः
जो ज्ञानी अपनी आत्मा में परम विश्राम को प्राप्त हो चुका है
न कल्पते न जानाति
वह न कोई कल्पना करता है और न ज्ञेय पदार्थों को जानता है
न शृणोति न पश्यति
और न वह कान या आँख से विषयों में लिप्त होकर सुनता या देखता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अनेक प्रकार के विचारों और तर्कों से भलीभाँति थककर जो धीर पुरुष अपनी आत्मा में विश्राम पा चुका है, वह न कोई कल्पना करता है, न विशेष ज्ञान रखता है, न सुनता है और न देखता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: मनुष्य का मन दिन-रात हज़ारों विचारों, शास्त्रों के तर्कों और योजनाओं से थका हुआ रहता है। जब तक वह सोचता रहता है, तब तक विश्राम नहीं मिलता। किंतु जब साधक यह समझ लेता है कि आत्मा विचारों के पार की वस्तु है, तब वह सारे मानसिक संघर्षों को छोड़ देता है। वह अपनी आत्मा में परम विश्रांति पा लेता है। अब उसके लिए न कोई संकल्प-विकल्प है और न इंद्रियों के विषयों की भूख। वह परम मौन और शांति में स्थित हो जाता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब आप पूरे दिन एक भारी बोझा उठाकर मीलों पैदल चलें, तो शाम को जब बोझा ज़मीन पर उतारकर बैठते हैं तो कैसा सुकून मिलता है?

हमारा दिमाग भी दिन-रात विचारों, तर्कों और चिंताओं का भारी बोझा उठाए फिरता है। ज्ञानी व्यक्ति ने वह सारा बोझा नीचे उतार दिया है।

वह अपनी आत्मा के गहरे आराम में बैठ गया है। अब उसके मन में न कोई फालतू योजनाएं हैं और न कोई उलझन। वह बिल्कुल शांत और खाली हो चुका है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. सुश्रान्तः का अर्थ हार मानना नहीं, बल्कि मानसिक तर्कों की सीमाओं को पहचानकर उनसे पार पाना है (केनोपनिषद्)। 2. विश्रान्तिम् आगतः आत्मा को ही अपना अंतिम और शाश्वत विश्राम-स्थल स्वीकार करना है। 3. न कल्पते न जानाति मन की वृत्ति-रहित और निर्विकल्प स्थिति को दर्शाता है। 4. न शृणोति न पश्यति इंद्रियों के रहते हुए भी उनमें आसक्ति और उपाधि के अभाव का नाम है। 5. यह मांडूक्य कारिका के ‘अस्पर्शयोग’ और परम उपशम की सीधी अनुभूति है। 6. साधक को बौद्धिक कसरत छोड़कर आंतरिक विश्रांति में प्रवेश करने का निमंत्रण देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे जहाज़ का पंछी अथाह समुद्र में चारों तरफ उड़-उड़कर जब कहीं किनारा नहीं पाता, तो लौटकर जहाज़ के मस्तूल पर चुपचाप बैठ जाता है; वैसे ही मन सारे विचार छोड़कर आत्मा में विश्राम पाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

लगातार 10 घंटे तक 50 ब्राउज़र टैब्स और स्प्रेडशीट्स में उलझने के बाद जब आप लैपटॉप का ढक्कन बंद करके आँखें मूँद लेते हैं, तो जो सन्नाटा उतरता है; ज्ञानी का मन विचारों से ऐसे ही मुक्त होकर विश्राम पाता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दिमाग की लगातार सोचने की बीमारी से थोड़ा ब्रेक लीजिए; आत्मा के शांत विश्राम में बैठिए, वहाँ सारा तनाव मिट जाता है।

सामान्य गलतफहमी

यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। वैराग्य का अर्थ मानसिक निर्भरता और बाध्यकारी लगाव से मुक्ति है; इसका अर्थ देखभाल, कर्तव्य, संबंध या नैतिक उत्तरदायित्व छोड़ देना नहीं है। ‘न शृणोति न पश्यति’ का अर्थ अंधा या बहरा हो जाना नहीं है; यह विषयों के प्रति मानसिक खिंचाव के अंत का प्रतीक है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब दिमाग बहुत सारे विचारों से भर जाए, तो 2 मिनट के लिए सब सोचना बंद करके कहें: "मैं विचारों का साक्षी हूँ, मैं शांत विश्राम में हूँ।" (ओवरथिंकिंग में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं दिन-रात सोचने और विश्लेषण करने की लत के कारण जीवन के सहज आनंद से वंचित हो रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट अपनी आँखों को कोमलता से बंद करें और अनुभव करें: "सारे विचार शांत हो चुके हैं; मैं आत्मा के असीम विश्राम में डूबा हुआ हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अनेक विचारों से थककर आत्मा में विश्राम पाया हुआ ज्ञानी न कल्पना करता है, न विषयों को देखता या सुनता है।

English

Translation: Weary of countless mental deliberations, the steadfast one has arrived at supreme rest. He imagines nothing, knows nothing, hears nothing, and sees nothing.

Simple explanation: Thoroughly exhausted by endless conceptualizing and intellectual dispute, the sage enters sublime stillness. He formulates no concepts, pursues no objects of knowledge, and clings to neither sights nor sounds.

विषय और संबंधित श्लोक

  • विचार-विश्रान्ति
  • निर्विकल्प-स्थिति
  • परम-उपशम
  • धीर-लक्षण
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.26: जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान्।
  • श्लोक 18.28: असमाधेरविक्षेपान्।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 288–289 (PDF पृ. 295–296)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सत्ताईसवाँ श्लोक।