दृश्य, गति और थीम की सेटिंग(इस डिवाइस पर सहेजी जाती हैं)
दृश्य मोड
गति
थीम

आपके डिवाइस की “कम गति” सेटिंग हमेशा मानी जाती है। “केवल पाठ” मोड में कोई सजावटी चित्र या गति नहीं रहती।

प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ४७/१००47%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.47

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥

IAST लिप्यंतरण

na muktikārikāṃ dhatte niḥśaṅko yuktamānasaḥ | paśyañ chṛṇvan spṛśañ jighrann aśnann āste yathāsukham || 47 ||

सरल उच्चारण: na muktikaarikaam dhatte nihshangko yuktamaanasah pashyany chhrinvan sprishany jighrann ashnann aaste yathaasukham (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, मुक्ति-कारिकाम्, धत्ते, निःशङ्कः, युक्त-मानसः, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम्

निःशङ्कः युक्त-मानसः
संशय-रहित और अपनी आत्मा में नित्य समाहित ज्ञानी
मुक्ति-कारिकाम् न धत्ते
मुक्ति के किसी कृत्रिम साधन या नियम को धारण नहीं करता
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्
देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ
जिघ्रन् अश्नन्
सूँघता हुआ और खाता हुआ
यथासुखम् आस्ते
परम सुखपूर्वक और सहजता से रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

संशयरहित और आत्मस्वरूप में स्थित ज्ञानी मुक्ति के किसी नियम या साधन का आडंबर नहीं करता; वह देखता, सुनता, छूता, सूँघता और खाता हुआ भी परम सुखपूर्वक रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जिस साधक को अभी मुक्ति नहीं मिली, वह मुक्ति पाने के लिए हज़ारों नियमों, अनुष्ठानों और योग-कारिकाओं (विधियों) में बँधा रहता है। किंतु जो ज्ञानी संशय-रहित होकर अपने स्वरूप को पहचान चुका है, उसे किसी कृत्रिम साधन की ज़रूरत नहीं। वह साधारण मनुष्यों की तरह आँखों से देखता है, कानों से सुनता है, भोजन करता है और सोता है, किंतु इन सब इंद्रिय-क्रियाओं के बीच भी वह भीतर से अखंड सुख और शांति में स्थित रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

जब आप किसी परीक्षा को पास कर लेते हैं और डिग्री मिल जाती है, तो क्या आप परीक्षा के बाद भी दिन-रात गाइड बुक लेकर रटते रहते हैं? नहीं, पढ़ाई का काम पूरा हो चुका होता है।

ज्ञानी पुरुष को अपनी असली आज़ादी मिल चुकी है। अब उसे मोक्ष पाने के लिए किसी नियम या कठिन साधना की जंजीरों में बँधने की ज़रूरत नहीं है।

वह आम इंसान की तरह खाना खाता है, पानी पीता है, दुनिया को देखता और सुनता है। लेकिन अंदर से वह हर पल बिल्कुल तनाव-मुक्त और खुश रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. मुक्तिकारिकां न धत्ते मुक्ति के साधनों की आवश्यकता के अंत को सूचित करता है—साध्य मिलने पर साधन छूटते हैं। 2. निःशङ्कः संशयों के पूर्ण उच्छेद का नाम है (छिद्यन्ते सर्वसंशयाः)। 3. युक्तमानसः सदा आत्म-समाहित अवस्था है जहाँ ध्यान लगाना नहीं पड़ता, ध्यान बना रहता है। 4. पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् गीता के ‘पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन्’ (५.८) की सीधी गूँज है। 5. यथासुखम् आस्ते जीवनमुक्ति की उस परम स्वाभाविकता को दर्शाता है जहाँ कोई तनाव या अपराध-बोध नहीं। 6. साधक को साधना के बोझ से मुक्त होकर आत्म-सहजता में जीने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे कोई राजा अपने महल में घूमता हुआ बिना किसी पाबंदी के सुखपूर्वक रहता है, वैसे ही ज्ञानी अपने शरीर-महल में सब क्रियाएँ करता हुआ सुख से रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक कुशल तैराक पानी में तैरते समय हाथ-पैर के नियमों को भूलकर पानी के साथ एक होकर तैरने का आनंद लेता है; ज्ञानी जीवन के प्रवाह में ऐसे ही आनंद से जीता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मुक्ति के नियमों की ज़ंजीरें तोड़िए; जब भीतर सत्य का निश्चय है, तो हर काम और हर निवाला आनंद बन जाता है।

सामान्य गलतफहमी

आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘यथासुखम् आस्ते’ का अर्थ स्वास्थ्य और मर्यादाओं की उपेक्षा करके स्वच्छंद हो जाना नहीं है; यह आत्मज्ञानी की सहज निर्विकारता है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज भोजन करते समय या पानी पीते समय 1 मिनट के लिए शांत होकर कहें: "प्रकृति भोजन ग्रहण कर रही है, मैं आनंदस्वरूप साक्षी आत्मा हूँ।" (भोजन के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं आध्यात्मिक साधना के बाहरी नियमों में इतना उलझ गया हूँ कि जीवन का सहज आनंद ही भूल चुका हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपनी पाँचों इंद्रियों के अनुभवों को केवल साक्षी बनकर महसूस करें: "देखना, सुनना, छूना सब हो रहा है; मैं शांत और सुखी हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: संशय-रहित ज्ञानी मुक्ति के नियमों में नहीं बँधता; वह खाता-पीता और देखता-सुनता हुआ भी सुख से रहता है।

English

Translation: Harboring no doubt and with mind unified, he adopts no artificial means for liberation. Seeing, hearing, touching, smelling, and eating, he lives at ease.

Simple explanation: Free of all doubt and steadfastly recollected in the Self, he relies on no contrivance for liberation. Seeing, hearing, touching, smelling, and eating, he abides in effortless delight.

विषय और संबंधित श्लोक

  • यथासुख-स्थिति
  • निःशङ्क
  • मुक्तिकारिका-पार
  • सहज-इन्द्रिय-व्यापार
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.46: तूष्णीं विषयदन्तिनः।
  • श्लोक 18.48: वस्तुश्रवणमात्रेण।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 323–325 (PDF पृ. 330–332)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सैंतालीसवाँ श्लोक।