दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.83
सत्यापित
मूल संस्कृत
धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति । हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति ॥ ८३ ॥
IAST लिप्यंतरण
dhīro na dveṣṭi saṃsāram ātmānaṃ na didṛkṣati | harṣāmarṣavinirmukto na mṛto na ca jīvati || 83 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
धीरः, न, द्वेष्टि, संसारम्, आत्मानम्, न, दिदृक्षति, हर्ष-अमर्ष-विनिर्मुक्तः, न, मृतः, न, च, जीवति
- धीरः संसारम् न द्वेष्टि
- धीर ज्ञानी न तो संसार से द्वेष (घृणा) करता है
- आत्मानम् न दिदृक्षति
- और न आत्मा को अलग से देखने की इच्छा करता है
- हर्ष-अमर्ष-विनिर्मुक्तः
- हर्ष और क्रोध (अमर्ष) से सर्वथा मुक्त होकर
- न मृतः न च जीवति
- वह न तो मरा हुआ है और न साधारण रूप से जीवित है (वह इन दोनों के पार है)
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
धीर ज्ञानी न संसार से द्वेष करता है और न आत्मा को देखने की इच्छा करता है; हर्ष और अमर्ष से मुक्त वह न मरा हुआ है और न जीवित (वह जीवन और मृत्यु के पार है)।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह जीवनमुक्ति की अत्यंत विलक्षण स्थिति है। अज्ञानी संसार से भागता है और द्वेष करता है, तथा आत्मा को किसी वस्तु की तरह ढूँढने की कोशिश करता है। ज्ञानी जानता है कि संसार आत्मा से अलग नहीं है, इसलिए वह न संसार से नफरत करता है और न आत्मा को ढूँढता है क्योंकि वह खुद आत्मा है। हर्ष और अमर्ष से मुक्त वह साधारण अर्थों में न तो जीवित है (क्योंकि उसका देहाभिमान मर चुका है) और न मरा हुआ है (क्योंकि वह अमर चैतन्य में प्रतिष्ठित है)।
सरल हिन्दी में समझें
जब कोई अपनी आँख से ही दुनिया देख रहा हो, तो क्या वह अपनी आँख को अलग से देखने की कोशिश करता है? नहीं, आँख तो देखने वाली है, वह खुद नहीं देखी जाती।
ज्ञानी व्यक्ति को दुनिया से न कोई नफरत होती है और न वह आत्मा को ढूँढने के लिए बेचैन होता है।
वह खुशी में फूलता नहीं और गुस्से में जलता नहीं। सांसारिक दृष्टि से वह न आम लोगों की तरह ज़िंदा है क्योंकि उसका अहंकार मर चुका है, और न वह मरा हुआ है क्योंकि वह अमर परमात्मा बन चुका है। वह जीवन और मौत दोनों के पार है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. न द्वेष्टि संसारम् यह स्पष्ट करता है कि अद्वैत वैराग्य संसार से घृणा नहीं, बल्कि अविद्या की समाप्ति है। 2. आत्मानं न दिदृक्षति यह सिद्ध करता है कि आत्मा ज्ञाता है, वह दृश्य या अनुभव का विषय नहीं बन सकता। 3. हर्षामर्षविनिर्मुक्तः चित्त के समस्त आवेगों के शमन का सूचक है। 4. न मृतो न च जीवति जीवन और मृत्यु के द्वैत के पार अमर आत्म-पद की घोषणा है। 5. साधक को संसार से भागने और आत्मा को किसी अनुभव की तरह पकड़ने के दोनों भ्रमों से मुक्त करता है।
उदाहरण से समझें: जैसे अंतरिक्ष में स्थित उपग्रह न पृथ्वी से लड़ता है और न अंतरिक्ष को पकड़ता है, बस अपनी कक्षा में अचल तैरता है; ज्ञानी जीवन-मृत्यु के पार ऐसे ही तैरता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक अनुभवी पायलट जो बादलों के ऊपर स्ट्रेटोस्फीयर में शांति से उड़ रहा हो; नीचे के मौसम से न उसे नफरत होती है न लगाव; ज्ञानी संसार के ऊपर ऐसे ही शांत रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया से नफरत मत कीजिए और न आत्मा को किसी जादुई अनुभव की तरह ढूँढिए; आप अभी इसी क्षण अमर और जीवन-मृत्यु से परे हैं।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न मृतो न च जीवति’ का अर्थ आत्महत्या या जड़वत हो जाना नहीं है; यह देहाभिमान के अंत और अमर आत्मा में स्थिति का काव्यात्मक प्रतीक है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब संसार की किसी परिस्थिति से बहुत चिढ़ या गुस्सा आए, तो कहें: "संसार भी मेरी ही चेतना की लहर है, मुझे किसी से द्वेष नहीं।" (द्वेष के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं संसार से नफरत करके खुद को वैरागी मान रहा हूँ, जबकि सच्चा ज्ञानी किसी से नफरत नहीं करता?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न मेरा जन्म हुआ, न मेरी मृत्यु होगी; मैं जन्म और मरण दोनों के पार नित्य अमर साक्षी हूँ।"
एक पंक्ति में सार: ज्ञानी न संसार से द्वेष करता है न आत्मा को ढूँढता है; हर्ष-क्रोध से मुक्त वह जीवन और मृत्यु के पार है।
English
Translation: The wise one hates not the world nor longs to see the Self; free from joy and wrath, he is neither dead nor alive.
Simple explanation: The steadfast sage harbors no aversion toward the world, nor does he strain to behold the Self; liberated from elation and anger, he is neither dead nor alive in worldly terms.
विषय और संबंधित श्लोक
- अद्वैत-समता
- संसार-द्वेष-मुक्ति
- जीवन-मृत्यु-पार
- हर्षामर्ष-विनिर्मुक्त
- श्लोक 18.82: समदुःखसुखस्तृप्तः।
- श्लोक 18.84: निःस्नेहः पुत्रदारादौ।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का तिरासीवाँ श्लोक।