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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.82
सत्यापित
मूल संस्कृत
न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति । समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित् कृत्यं न पश्यति ॥ ८२ ॥
IAST लिप्यंतरण
na śāntaṃ stauti niṣkāmo na duṣṭam api nindati | samaduḥkhasukhas tṛptaḥ kiñcit kṛtyaṃ na paśyati || 82 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
न, शान्तम्, स्तौति, निष्कामः, न, दुष्टम्, अपि, निन्दति, सम-दुःख-सुखः, तृप्तः, किञ्चित्, कृत्यम्, न, पश्यति
- निष्कामः न शान्तम् स्तौति
- निष्काम ज्ञानी न तो किसी शांत (साधु) पुरुष की चापलूसी या स्तुति करता है
- न दुष्टम् अपि निन्दति
- और न किसी दुष्ट मनुष्य की निंदा करता है
- सम-दुःख-सुखः तृप्तः
- दुख और सुख में समान तथा अपनी आत्मा में तृप्त होकर
- किञ्चित् कृत्यम् न पश्यति
- वह अपने लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं देखता
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
निष्काम ज्ञानी न शांत पुरुष की स्तुति करता है और न दुष्ट की निंदा; सुख-दुख में समान और पूर्ण तृप्त होकर वह अपने लिए कोई कर्तव्य नहीं देखता।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: संसारी मनुष्य की आदत होती है कि जो उसके अनुकूल है उसकी झूठी स्तुति करता है, और जो प्रतिकूल है उसकी कटु निंदा करता है। किंतु जिस ज्ञानी के मन से सारी कामनाएँ समाप्त हो चुकी हैं, वह स्तुति और निंदा दोनों के पार चला गया है। वह जानता है कि साधु और दुष्ट दोनों एक ही परमात्मा के रूप हैं जो अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार खेल रहे हैं। वह सुख-दुख में एकरस रहकर अपने आत्म-स्वरूप में सदा तृप्त रहता है।
सरल हिन्दी में समझें
सूरज जब रोशनी देता है, तो क्या वह किसी मंदिर पर ज़्यादा चमकता है और किसी गंदी नाली पर कम? नहीं, वह दोनों पर बिना किसी भेदभाव के समान चमकता है।
ज्ञानी व्यक्ति के मन में किसी के लिए न तो चापलूसी होती है और न नफरत। वह न तो किसी की झूठी तारीफ़ के पुल बांधता है और न किसी की बुराई करता है।
वह सुख और दुख दोनों में बिल्कुल एक जैसा रहता है। वह अपने अंदर इतना तृप्त है कि उसे किसी से कुछ पाने या बदलने की कोई ज़रूरत नहीं लगती।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. स्तुति और निंदा दोनों मानसिक राग-द्वेष के लक्षण हैं; निष्कामता दोनों का बाध करती है। 2. समदुःखसुखस्तृप्तः गीता के स्थितप्रज्ञ के लक्षण (२.५६ ‘दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः’) की पूर्ण प्रतिध्वनि है। 3. किञ्चित् कृत्यं न पश्यति कर्तव्यता के आत्यंतिक विलय को व्यक्त करता है। 4. ज्ञानी की दृष्टि में सब कुछ ब्रह्म होने के कारण किसी पर दोषारोपण का प्रश्न ही नहीं उठता। 5. साधक को आलोचना और प्रशंसा दोनों से ऊपर उठकर आत्म-तृप्ति में स्थित होने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे दर्पण सामने आने वाले फूल की स्तुति नहीं करता और कीचड़ की निंदा नहीं करता, दोनों को केवल प्रतिबिंबित करता है; ज्ञानी स्तुति-निंदा से ऐसे ही अछूता रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी सोशल मीडिया विवाद में न किसी को लाइक करते हैं और न ट्रोल, बल्कि फोन बंद करके अपने शांत अध्ययन में लग जाते हैं; ज्ञानी सांसारिक वाद-विवाद से ऐसे ही परे रहता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दूसरों की बुराई और चापलूसी से दूर रहिए; सुख-दुख में सम होकर अपनी आत्मा में तृप्त रहिए, वही असली शांति है।
सामान्य गलतफहमी
ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न दुष्टमपि निन्दति’ का अर्थ अन्याय या अपराध का समर्थन करना नहीं है; यह अंतःकरण को घृणा और द्वेष से मुक्त रखने की शिक्षा है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज किसी की भी बुराई या निंदा न करें; अगर कोई बुरा व्यवहार करे तो भी मन में द्वेष न लाएँ। (निंदा-त्याग)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं दिनभर दूसरों की कमियाँ निकालने और निंदा-स्तुति करने में अपनी मानसिक ऊर्जा बर्बाद कर रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सब में एक ही परमात्मा की चेतना खेल रही है; कोई पराया नहीं, कोई निंदनीय नहीं, मैं सम और तृप्त आत्मा हूँ।"
एक पंक्ति में सार: निष्काम ज्ञानी न शांत की स्तुति करता है न दुष्ट की निंदा; सुख-दुख में सम वह कोई कर्तव्य नहीं देखता।
English
Translation: Desireless, he praises not the good nor blames the wicked; content and equal in joy and sorrow, he sees nothing to be done.
Simple explanation: Free of desire, he neither praises the saintly nor condemns the wicked; equanimous in pleasure and pain and deeply contented, he sees nothing left to be done.
विषय और संबंधित श्लोक
- स्तुति-निंदा-समता
- समदुःखसुख
- किञ्चित्-कृत्य-शून्यता
- निष्काम-तृप्ति
- श्लोक 18.81: धीरस्य शीतलं चित्तम्।
- श्लोक 18.83: धीरो न द्वेष्टि संसारम्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बयासीवाँ श्लोक।