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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ८१/१००81%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.81

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति । धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ ८१ ॥

IAST लिप्यंतरण

naiva prārthayate lābhaṃ nālābhenānuśocati | dhīrasya śītalaṃ cittam amṛtenaiva pūritam || 81 ||

सरल उच्चारण: naiva praarthayate laabham naalaabhenaanushochati dheerasya sheetalam chittam amritenaiva pooritam (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

न, एव, प्रार्थयते, लाभम्, न, अलाभेन, अनुशोचति, धीरस्य, शीतलम्, चित्तम्, अमृतेन, एव, पूरितम्

लाभम् न एव प्रार्थयते
धीर ज्ञानी न तो लाभ की कोई प्रार्थना (कामना) करता है
नालाभेन अनुशोचति
और न किसी हानि या अलाभ पर शोक करता है
धीरस्य चित्तम्
क्योंकि उस धैर्यवान ज्ञानी का चित्त
शीतलम् अमृतेन एव पूरितम्
आत्म-शांति रूपी अमृत से परिपूर्ण होकर सदा शीतल रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

धीर ज्ञानी न लाभ की प्रार्थना करता है और न अलाभ पर शोक करता है; उसका चित्त आत्म-शांति रूपी अमृत से भरा हुआ सदा शीतल रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: लाभ और हानि संसार के दो छोर हैं जिनमें साधारण मनुष्य पिसता रहता है। लाभ होने के लिए वह पूजा-प्रार्थनाएँ करता है और नुकसान होने पर छाती पीटता है। किंतु ज्ञानी का चित्त आत्मानंद के अमृत से लबालब भरा हुआ है। जब भीतर परमानंद का प्याला भरा है, तो बाहर के नफे-नुकसान से उसे क्या लेना-देना? उसका अंतःकरण सदा चंदन और बर्फ की तरह शीतल रहता है।

सरल हिन्दी में समझें

जिसके पास कुबेर का अखंड खज़ाना हो, क्या वह रास्ते पर गिरे एक-दो रुपयों के लिए प्रार्थना करेगा या उनके खोने पर रोएगा? कभी नहीं।

ज्ञानी व्यक्ति के अंदर परमात्मा का वह अमृत भरा है जो कभी खत्म नहीं होता।

उसे न तो किसी फायदे की लालच होती है और न किसी नुकसान का गम। उसका मन हर समय ठंडा, शांत और भरा-पूरा रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. लाभ और अलाभ में समता द्वंद्व-मुक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। 2. अमृतेनैव पूरितम् आत्मा के सच्चिदानंद स्वरूप की अपरोक्ष तृप्ति को सूचित करता है। 3. शीतलं चित्तम् उस परम उपशम का द्योतक है जहाँ वासनाओं की तपन सदा के लिए बुझ चुकी है। 4. यह गीता के ‘लाभालाभौ जयाजयौ’ (२.३८) के समत्व का अद्वैत फल है। 5. साधक को सांसारिक नफे-नुकसान की चिंता छोड़कर आत्म-तृप्ति में विश्राम लेने का मार्ग दिखाता है।

उदाहरण से समझें: जैसे अमृत का भरा हुआ घड़ा बाहर की धूप में भी अंदर से ठंडा और तृप्त रहता है, वैसे ही ज्ञानी का चित्त लाभ-हानि के बीच शीतल रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

व्यापार में किसी दिन बड़ा मुनाफा हो या मंदी, अगर आप जानते हैं कि आपका असली जीवन इन आंकड़ों से परे है तो आप शांत रहते हैं; ज्ञानी लाभ-हानि को ऐसे ही समभाव से लेता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: फायदे और नुकसान की चिंता में मन को मत जलाइए; अपनी आत्मा के अमृत को पहचानिए, आपका चित्त सदा शीतल रहेगा।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘नालाभेनानुशोचति’ का अर्थ व्यापार या काम में लापरवाही बरतना नहीं है; यह हानि होने पर मानसिक अवसाद से बचने की समता है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब कोई नुकसान या अनचाही बात हो, तो 2 मिनट शांत रहकर कहें: "मेरी आत्मा अमृत से भरी है, कोई सांसारिक हानि मुझे खाली नहीं कर सकती।" (नुकसान के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी मानसिक शांति हर दिन के छोटे-मोटे नफे-नुकसान के उतार-चढ़ाव पर नाचती है?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "हृदय में अमृत का शांत झरना बह रहा है; कोई लाभ नहीं चाहिए, कोई हानि नहीं सताती, केवल पूर्ण शीतलता।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: ज्ञानी न लाभ चाहता है न हानि पर शोक करता है; उसका चित्त आत्मानंद के अमृत से सदा शीतल रहता है।

English

Translation: He prays not for gain nor grieves over loss; the cool mind of the steadfast is filled with nectar alone.

Simple explanation: He prays neither for gain nor grieves over loss; the tranquil heart of the steadfast sage is forever filled with the nectar of immortality.

विषय और संबंधित श्लोक

  • लाभालाभ-समता
  • अमृत-पूरित-चित्त
  • शीतलता
  • उपशम
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.80: योगदृष्ट्या न किञ्चन।
  • श्लोक 18.82: न शान्तं स्तौति निष्कामो।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 391–393 (PDF पृ. 398–400)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का इक्यासीवाँ श्लोक।