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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.22
सत्यापित
मूल संस्कृत
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता । स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते ॥ २२ ॥
IAST लिप्यंतरण
asaṃsārasya tu kvāpi na harṣo na viṣādatā | sa śītalamanā nityaṃ videha iva rājate || 22 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
असंसारस्य, तु, क्वापि, न, हर्षः, न, विषादता, सः, शीतल-मनाः, नित्यम्, विदेहः, इव, राजते
- असंसारस्य तु
- संसार (जन्म-मरण के भ्रम) से सर्वथा मुक्त पुरुष को
- क्वापि न हर्षः
- कहीं भी (अनुकूलता में) न हर्ष होता है
- न विषादता
- और न (प्रतिकूलता में) विषाद (शोक) होता है
- सः नित्यम् शीतल-मनाः
- वह शांत (शीतल) मन वाला ज्ञानी
- विदेहः इव राजते
- मानो देहरहित (विदेह) होकर ही शोभा पाता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
संसार-भ्रम से मुक्त पुरुष को कहीं भी न हर्ष होता है और न विषाद; वह नित्य शीतल मन वाला होकर देह में रहता हुआ भी विदेह की भाँति सुशोभित होता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: संसारी मनुष्य की दशा यह है कि थोड़ा-सा लाभ हुआ तो फूलकर कुप्पा हो जाता है, और ज़रा-सा नुकसान हुआ तो शोक के सागर में डूब जाता है। किंतु जिस पुरुष का अंतःकरण यह जान चुका है कि यह जगत आत्मा से भिन्न कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं रखता, उसका मन सदा शीतल रहता है। उसे न अनुकूल परिस्थिति में घमंड होता है और न प्रतिकूल में निराशा। वह शरीर में रहते हुए भी शरीर के सुख-दुख से अछूता रहकर विदेह राजा जनक की तरह प्रकाशित होता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब हम किसी सिनेमा हॉल में फिल्म देखते हैं, तो परदे पर चाहे किसी की शादी हो रही हो या किसी की मृत्यु, परदा न तो खुश होता है और न रोता है।
ज्ञानी व्यक्ति का मन भी बिल्कुल वैसा ही शीतल हो जाता है। ज़िंदगी में जब कोई अच्छी खबर आती है तो वह पागल होकर नाचने नहीं लगता, और जब कोई बुरी खबर आती है तो वह टूटकर बिखर नहीं जाता।
उसका मन हमेशा ठंडा, शांत और स्थिर रहता है। वह शरीर में रहता हुआ भी ऐसा महसूस करता है जैसे वह शरीर के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. असंसारस्य का अभिप्राय संसारातीत आत्म-दृष्टि की प्रतिष्ठा है। 2. हर्ष और विषाद मन के धर्म हैं, चैतन्य आत्मा इनसे सर्वथा अलिप्त है। 3. शीतलमनाः उस परमानंद की स्थिति है जहाँ वासनाओं की अग्नि शांत हो चुकी है। 4. विदेह इव राजते जीवनमुक्ति की पराकाष्ठा का निर्देश करता है—देह रहते हुए भी देहाध्यास का क्षय। 5. यह समत्व भगवद्गीता के ‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ के सिद्धांत से पूर्णतः मेल खाता है। 6. साधक को द्वंद्वों से ऊपर उठकर अपनी नित्य अचल शांति में विश्राम लेने की प्रेरणा देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बर्फ का पहाड़ भीषण गर्मी में भी अंदर से शीतल रहता है, वैसे ही ज्ञानी संसार के उतार-चढ़ाव के बीच भी अंदर से शांत रहता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
शेयर बाज़ार के भयानक उतार-चढ़ाव में जब दूसरे लोग घबराकर बीपी की गोली खा रहे हों, तब अनुभवी निवेशक शांत मन से चाय पीता है; ज्ञानी जीवन के उतार-चढ़ाव को ऐसे ही शांत मन से देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: जीवन के उतार-चढ़ाव में अपने मन की ठंडक मत खोइए; आत्मा का आनंद बाहरी घटनाओं से बहुत बड़ा है।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न हर्षो न विषादता’ का अर्थ पत्थर की तरह संवेदनहीन हो जाना नहीं है; यह आंतरिक शांति की स्थिरता है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई बात बहुत अच्छी या बहुत बुरी लगे, तो 3 गहरी साँस लेकर कहें: "मैं शांत आत्मा हूँ, यह भाव भी गुज़र जाएगा।" (उतार-चढ़ाव में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी मानसिक शांति बाहरी लोगों की बातों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट अपनी छाती पर हाथ रखकर अनुभव करें: "हृदय में आत्म-शांति की शीतलता बह रही है; कोई चिंता मुझे तपा नहीं सकती।"
एक पंक्ति में सार: संसार-भ्रम से मुक्त ज्ञानी को न हर्ष होता है न शोक; वह शांत मन वाला देह में भी विदेहवत् रहता है।
English
Translation: For one who has transcended worldly existence there is neither joy nor sorrow. With a cool mind always, he shines as if disembodied.
Simple explanation: Beyond empirical entanglement, the sage is shaken neither by elation nor despondency. Dwelling in unbroken serenity, he shines as though completely free of physical limitation even while inhabiting a body.
विषय और संबंधित श्लोक
- समत्व
- शीतलमना
- विदेह-स्थिति
- हर्ष-विषाद-मुक्ति
- श्लोक 18.21: क्षिप्तः संस्कारवातेन।
- श्लोक 18.23: कुत्रापि न जिहासास्ति।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का बाइसवाँ श्लोक।