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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ९१/१००91%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.91

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते । भावेषु गलिता यस्य शोभनाऽशोभना मतिः ॥ ९१ ॥

IAST लिप्यंतरण

bhikṣur vā bhūpatir vāpi yo niṣkāmaḥ sa śobhate | bhāveṣu galitā yasya śobhanā'śobhanā matiḥ || 91 ||

सरल उच्चारण: bhikshur vaa bhoopatir vaapi yo nishkaamah sa shobhate bhaaveshu galitaa yasya shobhanaashobhanaa matih (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

भिक्षुः, वा, भूपतिः, वा, अपि, यः, निष्कामः, सः, शोभते, भावेषु, गलिता, यस्य, शोभना-अशोभना, मतिः

भिक्षुः वा भूपतिः वा अपि
चाहे वह भिखारी हो अथवा कोई राजा (सम्राट) हो
यः निष्कामः सः शोभते
जो वास्तव में निष्काम है, वही सच्चा सुशोभित होता है
यस्य मतिः गलिता
जिसकी बुद्धि सर्वथा गल (समाप्त हो) चुकी है
भावेषु शोभना-अशोभना
सांसारिक पदार्थों में ‘यह अच्छा है और यह बुरा है’ के भेद से

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

चाहे कोई भिक्षुक हो या राजा, जो निष्काम है वही वास्तव में सुशोभित होता है; जिसकी बुद्धि पदार्थों में ‘यह सुंदर है और यह असुंदर’ के भेद से सर्वथा मुक्त हो चुकी है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: समाज में लोग किसी को राजा देखकर उसका सम्मान करते हैं और भिखारी को देखकर उपेक्षा करते हैं। किंतु अष्टावक्र कहते हैं कि बाह्य पदवी या वेश से कोई महान नहीं होता। असली सुंदरता और गरिमा केवल निष्कामता में है। यदि कोई राजा निष्काम है (जैसे राजा जनक), तो वह भी सुशोभित है; और यदि कोई भिक्षुक निष्काम है, तो वह भी सम्राट है। जिसकी बुद्धि से "यह अच्छा है, इसे पाऊँ" और "यह बुरा है, इसे छोड़ूँ" का द्वंद्व गल चुका है, वही सच्चा ज्ञानी है।

सरल हिन्दी में समझें

कपड़ों से या बैंक बैलेंस से कोई इंसान बड़ा नहीं बनता। चाहे किसी के सिर पर सोने का ताज हो या फटे-पुराने चीथड़े, अगर उसके मन में लालच है तो वह भिखारी ही है।

असली राजा वही है जिसके दिल में कोई इच्छा या वासना नहीं है।

जिसकी नज़र में न कोई चीज़ बहुत खूबसूरत है और न कोई बहुत बदसूरत; जो हर चीज़ को एक जैसी शांति से देखता है, वही इंसान इस दुनिया में सबसे ज़्यादा खूबसूरत और पूज्य है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि सामाजिक स्तरों और बाह्य उपाधियों की पारमार्थिक निरर्थकता का प्रमाण है। 2. निष्कामः स शोभते निष्कामता को ही आध्यात्मिक सौंदर्य का एकमात्र मापदंड घोषित करता है। 3. शोभनाऽशोभना मतिः गलिता राग और द्वेष के मूल कारण (अच्छा-बुरा मानने की बुद्धि) के उच्छेद का सूचक है। 4. यह अद्वैत दृष्टि की वह पराकाष्ठा है जहाँ सुंदरता और कुरूपता दोनों ब्रह्म में लीन हो जाती हैं। 5. साधक को बाहरी पदों के आकर्षण से छुड़ाकर आंतरिक निष्कामता अपनाने की सीख देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे सूरज के लिए सोने का महल और मिट्टी की झोपड़ी दोनों समान हैं, वैसे ही निष्काम ज्ञानी के लिए राजा और भिक्षुक का भेद शून्य हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

एक सादे कुर्ते में घूमने वाला संत जिसके चेहरे पर असीम शांति हो, बनाम एक तनावग्रस्त अरबपति जो अपनी लग्ज़री कार में भी बेचैन हो; असली गरिमा केवल निष्काम शांति में है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: पदों और पैसों की चकाचौंध से बाहर निकलिए; मन से कामनाओं को विदा कीजिए, निष्काम होकर ही इंसान सचमुच महान बनता है।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘शोभनाऽशोभना मतिः गलिता’ का अर्थ अच्छे-बुरे कर्मों का विवेक खो देना नहीं है; यह बाह्य रूपों के प्रति राग-द्वेष से मुक्ति का बोध है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी भी व्यक्ति को उसके कपड़ों या पैसे से न तौलें; सबके भीतर उसी एक परमात्मा का दर्शन करें। (समदृष्टि)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अमीर लोगों को देखकर हीनभावना और गरीबों को देखकर घमंड का शिकार हो जाता हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "न मैं राजा हूँ, न भिखारी; मैं कामनाओं से मुक्त, शुद्ध और पूर्ण आत्मा हूँ।"

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: भिखारी हो या राजा, जो निष्काम है वही शोभा पाता है; जिसकी अच्छे-बुरे की बुद्धि गल चुकी है।

English

Translation: Whether a beggar or a king, he excels who is desireless, whose intellect has dissolved all notions of "good" and "bad".

Simple explanation: Whether appearing as a beggar or reigning as a king, he alone truly shines who is free of desire, and in whose consciousness all judgments of "attractive" and "unattractive" have dissolved.

विषय और संबंधित श्लोक

  • निष्काम-शोभा
  • भिक्षु-भूपति-समता
  • शोभनाशोभन-बाध
  • सच्चा-ऐश्वर्य
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.90: कोऽन्यो निर्वासनादृते।
  • श्लोक 18.92: क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 411–413 (PDF पृ. 418–420)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का इक्यानवेवाँ श्लोक।