दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.90
सत्यापित
मूल संस्कृत
जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति । ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥
IAST लिप्यंतरण
jānann api na jānāti paśyann api na paśyati | bruvann api na ca brūte ko'nyo nirvāsanād ṛte || 90 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
जानन्, अपि, न, जानाति, पश्यन्, अपि, न, पश्यति, ब्रुवन्, अपि, न, च, ब्रूते, कः, अन्यः, निर्वासनात्, ऋते
- जानन् अपि न जानाति
- जानता हुआ भी (ज्ञाता के अहंकार से) नहीं जानता
- पश्यन् अपि न पश्यति
- देखता हुआ भी (भेद-दृष्टि से) नहीं देखता
- ब्रुवन् अपि च न ब्रूते
- और बोलता हुआ भी (वक्ता के अहंकार से) नहीं बोलता
- निर्वासनात् ऋते कः अन्यः
- वासना-रहित ज्ञानी के सिवा दूसरा कौन ऐसा हो सकता है?
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
जानता हुआ भी जो नहीं जानता, देखता हुआ भी जो नहीं देखता, और बोलता हुआ भी जो नहीं बोलता—वासना-रहित ज्ञानी के सिवा ऐसा दूसरा कौन हो सकता है?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह ज्ञानी के अहंकार-शून्य व्यवहार का सर्वोच्च रहस्य है। जब ज्ञानी किसी विषय को जानता है, तो उसमें "मैं ज्ञानी हूँ" का कोई घमंड नहीं होता। जब वह आँखों से संसार को देखता है, तो उसमें राग-द्वेष की भेद-दृष्टि नहीं होती। जब वह मुँह से उपदेश देता है, तो उसमें "मैं उपदेशक हूँ" का कर्तापन नहीं होता। वह सब कुछ करता हुआ भी भीतर से सर्वथा अकर्ता रहता है। अष्टावक्र कहते हैं कि वासना-रहित आत्मज्ञानी के सिवा ऐसी अद्भुत स्थिति किसी और की नहीं हो सकती।
सरल हिन्दी में समझें
जब एक कैमरा किसी सुंदर बगीचे की तस्वीर खींचता है, तो क्या कैमरा कहता है कि "मैंने यह सुंदर फूल देखा"? नहीं, कैमरा केवल दिखाता है, उसके अंदर कोई अहंकार नहीं होता।
ज्ञानी व्यक्ति का शरीर भी वैसे ही काम करता है। वह सब कुछ जानता है पर ज्ञानी होने का घमंड नहीं करता; वह सब कुछ देखता है पर किसी से नफरत या मोह नहीं करता; वह बोलता है पर वक्ता होने का अहंकार नहीं पालता।
वासना से मुक्त हुए बिना कोई भी इंसान ऐसा निष्पाप और हल्का नहीं हो सकता।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. जानन्नपि न जानाति ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की त्रिपुटी के लय को दर्शाता है। 2. पश्यन्नपि न पश्यति द्रष्टा-दृश्य विवेक की उस पराकाष्ठा का नाम है जहाँ केवल आत्मा ही दृष्टिगोचर होती है। 3. ब्रुवन्नपि न ब्रूते वक्तापन के अहंकार के अभाव को सूचित करता है। 4. कोऽन्यो निर्वासनादृते यह सिद्ध करता है कि केवल वासना-क्षय (वासना-नाश) ही इस सहज अकर्तापन की कुंजी है। 5. साधक को कर्तापन और ज्ञातापन के अहंकार को त्यागकर विशुद्ध साक्षी बनने का आदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे बहती हुई नदी का पानी पत्थरों को छूता हुआ भी किसी पत्थर को पकड़ता नहीं, वैसे ही ज्ञानी अनुभवों को छूता हुआ भी किसी में आसक्त नहीं होता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
एक बहुत बड़ा डॉक्टर जो हज़ारों जिंदगियाँ बचाने के बाद भी बिना किसी घमंड के कहता है कि "यह सब कुदरत का काम था, मैं तो केवल जरिया था"; ज्ञानी अपने हर ज्ञान और कर्म को ऐसे ही देखता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अपने ज्ञान और बोलने का घमंड छोड़िए; जब वासना मिटती है, तो सब कुछ करते हुए भी इंसान बिल्कुल अछूता और पवित्र रहता है।
सामान्य गलतफहमी
सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘न जानाति न पश्यति’ का अर्थ अज्ञानी या अंधा हो जाना नहीं है; यह कर्तापन और भेद-दृष्टि के अभाव का आध्यात्मिक रहस्य है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई बात समझाएँ या बोलें, तो मन में कहें: "वाणी अपना काम कर रही है, मैं केवल शांत साक्षी आत्मा हूँ।" (बोलते समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं थोड़ा सा ज्ञान पाकर भी दूसरों पर रौब जमाने और खुद को बड़ा साबित करने में लग जाता हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "देखना, जानना और बोलना सब हो रहा है; लेकिन मैं अकर्ता, अभोक्ता और वासना-रहित साक्षी हूँ।"
एक पंक्ति में सार: जानकर भी न जानने वाला, देखकर भी न देखने वाला, वासना-मुक्त ज्ञानी के सिवा और कौन हो सकता है?
English
Translation: Knowing yet not knowing, seeing yet not seeing, speaking yet not speaking—who else can be such but the one free from latent desires?
Simple explanation: Knowing yet not knowing as a personal knower, seeing yet not seeing dualistic objects, speaking yet not speaking with personal pride—who else could abide thus except one entirely free of latent desires?
विषय और संबंधित श्लोक
- निर्वासन-स्थिति
- ज्ञातापन-त्याग
- वक्तापन-त्याग
- त्रिपुटी-बाध
- श्लोक 18.89: तुलना केन जायते।
- श्लोक 18.91: भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का नब्बेवाँ श्लोक।