दृश्य, गति और थीम की सेटिंग
अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.70
सत्यापित
मूल संस्कृत
भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी । अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ ७० ॥
IAST लिप्यंतरण
bhramabhūtam idaṃ sarvaṃ kiñcin nāstīti niścayī | alakṣyasphuraṇaḥ śuddhaḥ svabhāvenaiva śāmyati || 70 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
भ्रम-भूतम्, इदम्, सर्वम्, किञ्चित्, न, अस्ति, इति, निश्चयी, अलक्ष्य-स्फुरणः, शुद्धः, स्वभावेन, एव, शाम्यति
- इदम् सर्वम् भ्रम-भूतम्
- यह सब कुछ केवल भ्रम (माया) मात्र है
- किञ्चित् न अस्ति इति निश्चयी
- वास्तव में कुछ भी नहीं है—इस प्रकार का दृढ़ निश्चय रखने वाला
- अलक्ष्य-स्फुरणः शुद्धः
- इंद्रियों से न देखे जा सकने वाले आत्म-प्रकाश से युक्त शुद्ध ज्ञानी
- स्वभावेन एव शाम्यति
- अपने स्वाभाविक स्वरूप से ही स्वतः परम शांत हो जाता है
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
‘यह सब कुछ केवल भ्रम मात्र है, वास्तव में कुछ भी नहीं है’—इस प्रकार के दृढ़ निश्चय वाला, अलौकिक आत्म-प्रकाश से युक्त शुद्ध ज्ञानी अपने स्वभाव से ही शांत हो जाता है।
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: जब तक मनुष्य यह मानता है कि संसार में कुछ सार है, तब तक उसका मन अशांत रहता है। किंतु जब यह अटल निश्चय हो जाता है कि यह सारा प्रपंच मृगतृष्णा के जल के समान भ्रम मात्र है और आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है, तब मन की सारी दौड़ अपने आप समाप्त हो जाती है। ज्ञानी को शांत होने के लिए कोई चेष्टा नहीं करनी पड़ती; वह अपने स्वयंसिद्ध, शुद्ध और अलक्ष्य आत्म-स्वभाव से ही स्वतः परम शांत (शाम्यति) हो जाता है।
सरल हिन्दी में समझें
रेगिस्तान में जब कोई प्यासा हिरण दूर चमकती रेत को पानी समझकर दौड़ता है, तो वह तब तक भागता रहता है जब तक थक न जाए। लेकिन जैसे ही उसे पता चलता है कि वहाँ कोई पानी नहीं है, वह दौड़ना तुरंत बंद कर देता है।
संसार के सुख भी बिल्कुल उस मृगतृष्णा के पानी जैसे हैं।
जिस इंसान को यह पक्का यकीन हो जाता है कि यहाँ पकड़ने लायक कुछ भी नहीं है, उसकी सारी भागदौड़ उसी पल थम जाती है। वह अपने आप बिना किसी मेहनत के परम शांति में बैठ जाता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी वेदांत के परम सिद्धांत का संक्षेप है—ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या। 2. भ्रमभूतमिदं सर्वं अविद्या के कार्य की प्रातीतिक सत्ता को उद्घाटित करता है। 3. अलक्ष्यस्फुरणः आत्मा के उस स्वयंसिद्ध प्रकाश को दर्शाता है जिसे आँखें नहीं देख सकतीं पर जो सबको देखता है। 4. स्वभावेनैव शाम्यति यह सिद्ध करता है कि शांति आत्मा का स्वभाव है, कोई बाहरी घटना नहीं। 5. साधक को संसार के असत्य स्वरूप को पहचानकर अपनी मूल शांति में स्थित होने का मार्ग दिखाता है।
उदाहरण से समझें: जैसे सिनेमा हाल में जब लाइट जलती है तो परदे के भूत-प्रेत अपने आप गायब हो जाते हैं और केवल सफेद परदा रह जाता है, वैसे ही आत्म-निश्चय होते ही संसार-भ्रम शांत हो जाता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
जब आप किसी डरावने सपने से जागकर देखते हैं कि आप अपने सुरक्षित कमरे में बिस्तर पर हैं, तो दिल की धड़कनें अपने आप शांत हो जाती हैं; सत्य का निश्चय मन को ऐसे ही शांत करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: संसार के भ्रम के पीछे भागना बंद कीजिए; यह जानिए कि आत्मा के सिवा कुछ नहीं है, आपकी सारी बेचैनी खुद शांत हो जाएगी।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। यदि जीवन से निराशा या स्वयं को हानि पहुँचाने के विचार आएँ, तो इस ग्रंथ को उसका उत्तर न मानें; किसी विश्वसनीय व्यक्ति, चिकित्सक या अपने क्षेत्र की सहायता-सेवा से तुरंत संपर्क करें। ‘किञ्चिन्नास्ति’ का अर्थ संसार में दूसरों के दुख और कर्तव्यों की उपेक्षा करना नहीं है; यह आंतरिक आसक्ति और भय के निवारण का सत्य है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब कोई सांसारिक समस्या बहुत डराने लगे, तो कहें: "यह सब चेतना में उठने वाला एक सपना है, मेरी आत्मा अचल और सुरक्षित है।" (डर के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं रेगिस्तान की चमकती रेत को सच्चा पानी मानकर जीवनभर प्यासा ही दौड़ रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "कोई दृश्य स्थायी नहीं है; मैं शुद्ध, अलक्ष्य और स्वभाव से ही परम शांत आत्म-चैतन्य हूँ।"
एक पंक्ति में सार: सब कुछ भ्रम है और कुछ भी नहीं—इस निश्चय से शुद्ध ज्ञानी स्वभाव से ही शांत हो जाता है।
English
Translation: Convinced that all this is mere illusion and that nothing exists in reality, the pure one, radiant with unmanifest awareness, subsides naturally into peace.
Simple explanation: Firmly convinced that all this phenomenal display is a mere phantom and that nothing separate truly exists, the pure sage, shining with unmanifest light, rests naturally in peace.
विषय और संबंधित श्लोक
- भ्रम-बाध
- किञ्चिन्नास्ति-निश्चय
- अलक्ष्य-स्फुरण
- सहज-शम
- श्लोक 18.69: विहाय शुद्धबोधस्य।
- श्लोक 18.71: शुद्धस्फुरणरूपस्य विदुषः।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का सत्तरवाँ श्लोक।