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अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति
अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.69
सत्यापित
मूल संस्कृत
महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् । विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ ६९ ॥
IAST लिप्यंतरण
mahadādi jagaddvaitaṃ nāmamātravijṛmbhitam | vihāya śuddhabodhasya kiṃ kṛtyam avaśiṣyate || 69 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
महत्-आदि, जगत्-द्वैतम्, नाम-मात्र-विजृम्भितम्, विहाय, शुद्ध-बोधस्य, किम्, कृत्यम्, अवशिष्यते
- महत्-आदि जगत्-द्वैतम्
- महत्तत्त्व (बुद्धि) से लेकर यह संपूर्ण द्वैत प्रपंच
- नाम-मात्र-विजृम्भितम्
- केवल नामों और कल्पनाओं का ही फैलाव है
- विहाय
- इसे मिथ्या जानकर छोड़ देने पर
- शुद्ध-बोधस्य
- विशुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा के लिए
- किम् कृत्यम् अवशिष्यते
- करने योग्य कौन सा कर्तव्य शेष रह जाता है?
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
महत्तत्त्व से लेकर यह सारा द्वैत जगत केवल नाममात्र का विस्तार है; इसे मिथ्या जानकर त्याग देने के बाद विशुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा के लिए कौन सा कर्तव्य शेष रह जाता है?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: छांदोग्य उपनिषद् की यह प्रसिद्ध श्रुति है ‘वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’—अर्थात् मिट्टी के घड़े, सकोरे सब केवल वाणी के विलास और नाममात्र हैं, सत्य केवल मिट्टी है। इसी प्रकार, महत्तत्त्व (प्रकृति की पहली सृष्टि) से लेकर यह सारा ब्रह्मांड केवल नामों और रूपों का फैलाव है। जब ज्ञानी यह जान लेता है कि आत्मा के सिवा कुछ है ही नहीं, तो उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। वह पूर्ण विश्रांति में स्थित हो जाता है।
सरल हिन्दी में समझें
जब आप सोने की दुकान पर जाते हैं, तो वहाँ कोई चीज़ हार कहलाती है, कोई अँगूठी और कोई कंगन। लेकिन अगर सोने को पिघला दिया जाए, तो क्या बचेगा? केवल सोना। नाम और रूप तो केवल हमारी बोलचाल के हैं।
यह पूरी दुनिया भी केवल शब्दों और नामों का एक जाल है। सच तो केवल वह एक परमात्मा है जो सबमें मौजूद है।
जब किसी को यह समझ आ जाता है कि यह सारा खेल केवल नामों का है, तो उसके सिर से सारे कर्तव्य उतर जाते हैं। उसके लिए करने को कुछ नहीं बचता; वह पूरी शांति से जीता है।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. नाममात्रविजृम्भितम् अद्वैत वेदांत के नाम-रूप मिथ्यात्व का अकाट्य सिद्धांत है। 2. महदादि जगद्द्वैतं सांख्य की सृष्टि-प्रक्रिया के समस्त तत्वों को केवल कल्पित सिद्ध करता है। 3. शुद्धबोधस्य आत्मा की विशुद्ध ज्ञानस्वरूपता का निर्देश है जहाँ कोई कर्म या उपाधि नहीं। 4. किं कृत्यमवशिष्यते जीवनमुक्ति की उस स्थिति की घोषणा है जहाँ कर्तव्य का आत्यंतिक अंत हो जाता है। 5. साधक को सांसारिक प्रपंच के नामों में उलझने के बदले अधिष्ठान चैतन्य को पहचानने का उपदेश देता है।
उदाहरण से समझें: जैसे समुद्र में उठने वाले झाग और बुलबुले केवल पानी के ही नाम हैं, वैसे ही संसार के सारे रूप केवल एक आत्मा के नाम हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कंप्यूटर कोड में लिखे गए हज़ारों वैरिएबल्स और ऑब्जेक्ट्स अंततः केवल 0 और 1 के बाइनरी बिट्स हैं; संसार के सारे नाम और रूप भी केवल एक चेतना के कोड हैं। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: दुनिया के अलग-अलग नामों और रूपों में मत उलझिए; सबमें उस एक परमात्मा को देखिए, आपका सारा तनाव मिट जाएगा।
सामान्य गलतफहमी
यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती। सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ‘किं कृत्यमवशिष्यते’ का अर्थ आलस में पड़कर उत्तरदायित्व भूल जाना नहीं है; यह आंतरिक कर्ता-अहंकार की समाप्ति का बोध है।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज जब किसी चीज़ को लेकर बहुत मोह या गुस्सा आए, तो कहें: "यह केवल एक नाम और रूप है, सत्य केवल मेरी शांत आत्मा है।" (आसक्ति के समय)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं दुनिया के कल्पित नामों, पदों और प्रतिष्ठाओं को सच मानकर दिन-रात उनके पीछे भाग रहा हूँ?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अनुभव करें: "सारे नाम और रूप चेतना के बुलबुले हैं; मैं शुद्ध, अचल और कर्तव्य-मुक्त बोधस्वरूप हूँ।"
एक पंक्ति में सार: यह सारा द्वैत जगत केवल नाममात्र का विस्तार है; शुद्ध ज्ञानस्वरूप के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।
English
Translation: This dualistic world, from the cosmic intellect down, is a mere play of names; having discarded it, what duty remains for pure awareness?
Simple explanation: This entire dualistic cosmos, from the cosmic intellect downwards, is merely an expansion of empty names; having recognized this, what duty whatsoever remains for pure consciousness?
विषय और संबंधित श्लोक
- नाममात्र-जगत
- शुद्ध-बोध
- कृत्य-शून्यता
- द्वैत-बाध
- श्लोक 18.68: ज्ञाततत्त्वो महाशयः।
- श्लोक 18.70: भ्रमभूतमिदं सर्वम्।
स्रोत और सत्यापन
सत्यापित
संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का उनहत्तरवाँ श्लोक।