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प्रकरण 18: अठारहवाँ प्रकरणश्लोक ७६/१००76%

अध्याय 18 · ज्ञानी की शांति

अष्टावक्र गीता, श्लोक 18.76

सत्यापित

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम् । निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ ७६ ॥

IAST लिप्यंतरण

mandaḥ śrutvāpi tad vastu na jahāti vimūḍhatām | nirvikalpo bahir yatnād antarviṣayalālasaḥ || 76 ||

सरल उच्चारण: mandah shrutvaapi tad vastu na jahaati vimoodhataam nirvikalpo bahir yatnaad antarvishayalaalasah (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

मन्दः, श्रुत्वा, अपि, तत्, वस्तु, न, जहाति, विमूढताम्, निर्विकल्पः, बहिः, यत्नात्, अन्तः, विषय-लालसः

मन्दः तत् वस्तु श्रुत्वा अपि
मंदबुद्धि मनुष्य उस परम आत्मतत्त्व को सुनकर भी
विमूढताम् न जहाति
अपनी मूर्खता और अज्ञान को नहीं छोड़ता
बहिः यत्नात् निर्विकल्पः
वह बाहर से तो यत्नपूर्वक ध्यानस्थ और निर्विकल्प बनता है
तु अन्तः विषय-लालसः
किंतु अंदर से वह विषय-भोगों की लालसा से भरा रहता है

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

मंदबुद्धि मनुष्य उस परम सत्य को सुनकर भी अपने अज्ञान को नहीं छोड़ता; वह बाहर से तो प्रयत्नपूर्वक निर्विकल्प (ध्यानी) बनता है, किंतु भीतर से विषयों की लालसा में जलता रहता है।

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

बाबू जालिमसिंह जी की टीका के अनुसार: यह पाखंडी और अधूरे साधकों का वास्तविक चेहरा दिखाता है। वे वेदांत के ऊँचे-ऊँचे उपदेश सुनते हैं, किंतु उनका अंतःकरण शुद्ध नहीं होता। वे लोगों को दिखाने के लिए आँखें बंद करके, स्थिर बैठकर ऐसा ढोंग करते हैं मानो वे निर्विकल्प समाधि में लीन हों। किंतु उनके मन के अंदर धन, मान-सम्मान और काम-वासना की तीव्र भूख जलती रहती है। ऐसा मनुष्य अपने आपको ही धोखा देता है और कभी मुक्त नहीं हो सकता।

सरल हिन्दी में समझें

एक बगुले को तालाब के किनारे देखिए: वह एक पैर पर आँखें बंद करके बिल्कुल समाधिस्थ साधु की तरह खड़ा रहता है। लेकिन उसका ध्यान कहाँ होता है? केवल इस बात पर कि कब कोई छोटी मछली आए और वह उसे निगल जाए।

बहुत से तथाकथित साधकों का हाल भी उस बगुले जैसा होता है। वे बाहर से बहुत शांत और निर्विकल्प बनकर बैठते हैं, लेकिन उनके दिमाग में दुनिया के सुखों और पैसों की लालच दौड़ती रहती है।

अष्टावक्र कहते हैं कि ऐसे दिखावे से कोई ज्ञानी नहीं बनता। जब तक अंदर की लालसा नहीं मिटती, तब तक बाहर का नाटक बेकार है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. श्रुत्वापि न जहाति विमूढताम् यह सिद्ध करता है कि केवल श्रवण पर्याप्त नहीं है यदि चित्त में वासनाएँ भरी हों। 2. बहिर्यत्नान्निर्विकल्पः बाह्य पाखंड और कृत्रिम योग-मुद्राओं की व्यर्थता को उजागर करता है। 3. अन्तर्विषयलालसः अंतःकरण के वास्तविक रोग—दबी हुई वासनाओं—की ओर इशारा करता है। 4. यह आत्म-वंचना (self-deception) के विरुद्ध वेदांत की सबसे कड़ी चेतावनी है। 5. साधक को दिखावटी समाधि छोड़कर अपनी आंतरिक वासनाओं की शुद्धि करने का आदेश देता है।

उदाहरण से समझें: जैसे राख से ढकी हुई चिंगारी ऊपर से ठंडी दिखती है पर छूने पर हाथ जला देती है, वैसे ही ऊपर से शांत दिखने वाले पाखंडी के भीतर वासना की आग जलती रहती है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

ऑफिस की मीटिंग में बाहर से बहुत शांत और सहमति से सिर हिलाने वाला कर्मचारी जिसके दिमाग में बॉस को नीचा दिखाने की योजनाएं चल रही हों; पाखंडी साधक बाहर-भीतर से ऐसा ही दोहरा होता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: अध्यात्म में पाखंड मत कीजिए; बाहर से ध्यानी बनने से पहले अपने अंदर के लालच और वासना को सचमुच विदा कीजिए।

सामान्य गलतफहमी

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती। ‘बहिर्यत्नान्निर्विकल्पः’ का अर्थ ध्यान का अनादर करना नहीं है; यह आंतरिक वासनाओं को छिपाकर बाहर से साधु बनने के पाखंड का खंडन है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज जब पूजा या ध्यान में बैठें, तो पूरी ईमानदारी से अपने मन की इच्छाओं को देखें और ईश्वर से कहें: "मुझे दिखावा नहीं, सच्ची पवित्रता चाहिए।" (ध्यान के समय)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं दूसरों के सामने बहुत शांत और धार्मिक बनने का नाटक करता हूँ जबकि अंदर से लालच से भरा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट शांत बैठकर अपने मन के गुप्त कोनों को देखें; किसी वासना को छुपाएँ नहीं, साक्षी बनकर उन्हें आत्म-प्रकाश में विलीन होने दें।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: मंदबुद्धि सत्य सुनकर भी अज्ञान नहीं छोड़ता; वह बाहर से निर्विकल्प बनता है पर भीतर से लालची रहता है।

English

Translation: Though hearing of the Reality, the dull-witted does not abandon delusion; externally he strives to appear unconditioned, while inwardly he craves sense pleasures.

Simple explanation: Even after hearing of the Reality, the dull-minded person does not shed his delusion; outwardly through effort he poses as if free of thoughts, while inwardly he lusts after sense objects.

विषय और संबंधित श्लोक

  • पाखंड-खण्डन
  • अन्तर्विषय-लालसा
  • बहिर्यत्न-दिखावा
  • सच्ची-चित्तशुद्धि
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 18.75: मनोरथान् प्रलापांश्च।
  • श्लोक 18.77: ज्ञानाद् गलितकर्मा यो।

स्रोत और सत्यापन

सत्यापित पुस्तक पृ. 381–383 (PDF पृ. 388–390)

संपादकीय टिप्पणी: मूल पाठ पुस्तक से सत्यापित। अठारहवें प्रकरण का छिहत्तरवाँ श्लोक।