श्लोक 19.1
तत्त्वविज्ञानसन्दंशमादाय हृदयोदरात् । नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १ ॥
तत्त्वज्ञान की सँड़सी से मैंने हृदय से नाना विचार-शूल निकाल दिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 19 · उन्नीसवाँ प्रकरण
आठ श्लोकों में राजा जनक कहते हैं कि तत्त्वज्ञान ने हृदय का शूल निकाल दिया, और अपनी महिमा में स्थित होने पर धर्म से लेकर मृत्यु तक की धारणाएँ प्रश्न बन जाती हैं।
उन्नीसवाँ प्रकरण राजा जनक की वाणी है। अठारहवें प्रकरण में अष्टावक्र उपशम कहते रहे। यहाँ शिष्य अपना अनुभव कहता है।
पहला श्लोक एक चित्र है: तत्त्वज्ञान सँड़सी है, और नाना तरह के परमर्श हृदय में चुभे शूल हैं। जनक कहते हैं कि वह शूल निकल गया। आगे के छह श्लोक एक ही ठहराव पर खड़े हैं, स्वमहिम्नि स्थितस्य मे। धर्म, काल, देश, शुभ, जाग्रत्, शरीर की दूर-पास, मृत्यु और समाधि, इन नामों से वे पूछते हैं: अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए ये कहाँ हैं?
अंतिम श्लोक कथा बंद करता है। त्रिवर्ग की कथा, योग की कथा और विज्ञान की कथा, तीनों के लिए अलम्। विश्राम आत्मनि है।
सावधानी: ‘क्व धर्मः’ और ‘क्व मृत्युः’ व्यावहारिक धर्म, कानून, चिकित्सा या जीवन की देखभाल मिटाने के वाक्य नहीं हैं। ये धारणाओं के बोझ से हल्के होने की भाषा हैं। पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।
जब जनक अपनी महिमा में स्थित हैं, तो धर्म से लेकर मृत्यु तक के शब्द उनके लिए क्या रह जाते हैं?
तत्त्वज्ञान हृदय के चुभे हुए विचार निकालता है। जो अपनी महिमा में स्थित है, उसके लिए विरोधों के नाम प्रश्न बन जाते हैं। कथा वहीं रुकती है जहाँ आत्मा में विश्राम है। शब्द व्यवहार में उपयोगी रह सकते हैं। वे शांति के स्वामी नहीं रह जाते।
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तत्त्वविज्ञानसन्दंशमादाय हृदयोदरात् । नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १ ॥
तत्त्वज्ञान की सँड़सी से मैंने हृदय से नाना विचार-शूल निकाल दिए।
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता । क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ २ ॥
अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए धर्म, काम, अर्थ, विवेक, द्वैत और अद्वैत कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व भूतं क्व भविष्यद् वा वर्तमानमपि क्व वा । क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ३ ॥
अपनी महिमा में मेरे लिए भूत, भविष्य, वर्तमान, स्थान और नित्य कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं यथा । क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ४ ॥
अपनी महिमा में मेरे लिए आत्मा, अनात्मा, शुभ, अशुभ, चिंता और अचिंता कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा । क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ५ ॥
अपनी महिमा में मेरे लिए स्वप्न, सुषुप्ति, जागरण, तुरीय और भय कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा । क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ६ ॥
अपनी महिमा में मेरे लिए दूर, समीप, बाहर, भीतर, स्थूल और सूक्ष्म कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम् । क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ७ ॥
अपनी महिमा में मेरे लिए मृत्यु, जीवन, लोक, लौकिक, लय और समाधि कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंअलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाप्यलम् । अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥
आत्मा में विश्राम किए मेरे लिए त्रिवर्ग, योग और विज्ञान की कथा काफी है।
पूरी व्याख्या पढ़ेंजनक कहते हैं कि तत्त्वज्ञान ने उनके हृदय से विचार का शूल निकाल दिया। फिर वे अपनी महिमा में ठहरकर पूछते हैं: धर्म कहाँ, काल कहाँ, शुभ कहाँ, जागना कहाँ, शरीर की दूर-पास कहाँ, मृत्यु कहाँ। अंत में वे कहते हैं कि त्रिवर्ग, योग और विज्ञान की कथा अब काफी है। वे आत्मा में विश्राम करते हैं।
पाँच मिनट बैठें। एक चुभे हुए विचार का नाम लें, फिर उसे सँड़सी से निकालते हुए केवल साँस पर रहें। स्वास्थ्य, काम या किसी की देखभाल बीच में छोड़ें नहीं। असुविधा हो तो आँख खोलकर सामान्य स्थिति में आ जाएँ।
जनक। अठारहवें प्रकरण के बाद शिष्य अपना अनुभव कहता है। यह सार्वजनिक पाठ का क्रम है। पुस्तक का पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया।
तत्त्वविज्ञान को सन्दंश कहा गया है और नानाविध परमर्श को शल्य। अर्थ है कि ज्ञान ने हृदय से बार-बार के विचार निकाल दिए। यह चिकित्सा-सलाह छोड़ने का वाक्य नहीं है।
जनक एक ही ठहराव से अलग-अलग नाम पूछते हैं: धर्म, काल, शुभ, अवस्था, परिमाण, मृत्यु। दोहराव नई बात जोड़ने के लिए नहीं, पकड़ ढीली करने के लिए है।
वह त्रिवर्ग, योग और विज्ञान की कथा के लिए अलम् कहता है, क्योंकि विश्राम आत्मा में कहा गया है। जो अभी सीख रहा है, उसके लिए अध्ययन और सदाचार बने रहते हैं।