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प्रकरण 19: उन्नीसवाँ प्रकरणश्लोक २/८25%

अध्याय 19 · धारणाओं से परे

अष्टावक्र गीता, श्लोक 19.2

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: जनक (पुस्तक में वक्ता-लेबल: जनक उवाच)

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता । क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ २ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva dharmaḥ kva ca vā kāmaḥ kva cārthaḥ kva vivekitā | kva dvaitaṃ kva ca vādvaitaṃ svamahimni sthitasya me || 2 ||

सरल उच्चारण: kva dharmah kva cha vaa kaamah kva chaarthah kva vivekitaa kva dvaitam kva cha vaadvaitam svamahimni sthitasya me (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेकिता, क्व, द्वैतम्, क्व, च, वा, अद्वैतम्, स्व-महिम्नि, स्थितस्य, मे

क्व धर्मः क्व कामः क्व अर्थः
धर्म कहाँ, काम कहाँ, अर्थ कहाँ
क्व विवेकिता
विवेकी होने का भाव कहाँ
क्व द्वैतम् क्व अद्वैतम्
द्वैत कहाँ और अद्वैत कहाँ
स्व-महिम्नि स्थितस्य मे
अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए धर्म कहाँ, काम कहाँ, अर्थ कहाँ, विवेक कहाँ, द्वैत कहाँ और अद्वैत कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

यह प्रकरण की धुरी है। जनक वस्तुओं को नहीं, अपनी स्थिति को बताते हैं। स्वमहिम्नि स्थितस्य मे आगे कई श्लोकों में लौटेगा। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

धर्म, पैसा, इच्छा, समझदार होने का गर्व, और यह बहस कि दुनिया दो है या एक। ये सब शब्द काम के हैं।

जनक कहते हैं कि जब वे अपनी महिमा में ठहरे हैं, तब ये शब्द उनके स्वामी नहीं रहते।

इसका अर्थ कानून तोड़ना या घर का उत्तरदायित्व छोड़ना नहीं है। अर्थ यह है कि शांति इन नामों की जीत पर टिकी नहीं रहती।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. धर्म, काम और अर्थ त्रिवर्ग के तीन नाम एक पंक्ति में आते हैं। 2. विवेकिता भी प्रश्न बनती है, क्योंकि विवेक का गर्व नया बंधन हो सकता है। 3. द्वैत और अद्वैत दोनों पूछे गए हैं। एक पक्ष चुनकर रुकना इस श्लोक का अंत नहीं है। 4. स्वमहिमन् बाहर की पदवी नहीं, जनक का अपना ठहराव है। 5. स्थितस्य मे अनुभव की भाषा है, आदेश की नहीं। 6. व्यावहारिक धर्म इस प्रश्न से रद्द नहीं होता।

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है।

उदाहरण से समझें: जैसे यात्री नक्शे के रंगों से रास्ता समझता है और फिर नक्शे को घर नहीं मानता, वैसे ही ये शब्द रास्ते के नाम हैं। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

काम की ज़िम्मेदारी पूरी करते हुए भी कोई व्यक्ति इस बात से नहीं जलता कि उसकी विचारधारा सभा में जीती या हारी। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: धर्म और अद्वैत के शब्दों का उपयोग करें। उन्हें अपनी शांति का स्वामी न बनाएँ, और अपना उत्तरदायित्व न छोड़ें।

सामान्य गलतफहमी

क्व धर्मः का अर्थ नैतिक, कानूनी या पारिवारिक ज़िम्मेदारी की अनदेखी नहीं है।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक कर्तव्य पूरा करें, और पूरा होते ही यह न जोड़ें कि इससे आपकी विचारधारा सिद्ध हो गई। (काम के बाद)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मेरी शांति इस बात पर टिकी है कि द्वैत या अद्वैत में से मेरा पक्ष जीते?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठकर केवल यह वाक्य छोड़ें: धर्म, काम, अर्थ और अद्वैत नाम हैं। फिर एक लंबित छोटा काम याद रखें, उसे छोड़ें नहीं।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए धर्म, काम, अर्थ, विवेक, द्वैत और अद्वैत कहाँ हैं?

English

Translation: Where is duty, desire, wealth, discrimination, duality, or nonduality for me, established in my own majesty?

Simple explanation: Janaka does not cancel daily duty. He says these names no longer own the one who stands in his own majesty.

विषय और संबंधित श्लोक

  • स्वमहिमन्
  • त्रिवर्ग-प्रश्न
  • द्वैत-अद्वैत
  • जनक-स्थिति
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 19.1: तत्त्वविज्ञानसन्दंशमादाय
  • श्लोक 19.3: क्व भूतं क्व भविष्यद्

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के नवदश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।