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अध्याय 19 · धारणाओं से परे
अष्टावक्र गीता, श्लोक 19.7
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मूल संस्कृत
क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम् । क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ७ ॥
IAST लिप्यंतरण
kva mṛtyur jīvitaṃ vā kva lokāḥ kvāsya kva laukikam | kva layaḥ kva samādhir vā svamahimni sthitasya me || 7 ||
पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ
क्व, मृत्युः, जीवितम्, वा, क्व, लोकाः, क्व, अस्य, क्व, लौकिकम्, क्व, लयः, क्व, समाधिः, वा, स्व-महिम्नि, स्थितस्य, मे
- क्व मृत्युः क्व जीवितम्
- मृत्यु कहाँ, जीवन कहाँ
- क्व लोकाः क्व लौकिकम्
- लोक कहाँ, लौकिक कहाँ
- क्व लयः क्व समाधिः
- लय कहाँ, समाधि कहाँ
- स्व-महिम्नि स्थितस्य मे
- अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए
शाब्दिक हिन्दी अर्थ
अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए मृत्यु या जीवन कहाँ, लोक कहाँ, लौकिक कहाँ, लय कहाँ और समाधि कहाँ?
पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ
मृत्यु और जीवन के साथ लोक, लौकिक, लय और समाधि एक पंक्ति में हैं। जनक इनमें से किसी को अपनी महिमा का स्वामी नहीं मानते। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया। यह मृत्यु चाहने या इलाज रोकने का वचन नहीं है।
सरल हिन्दी में समझें
मरना, जीना, दूसरे लोक, इस लोक का व्यवहार, ध्यान में डूबना और समाधि। ये बड़े शब्द हैं।
जनक पूछते हैं कि अपनी महिमा में ये कहाँ हैं।
जीवन की देखभाल, बच्चों का साथ, दवा और खतरा देखकर रुकना इस प्रश्न के बाहर नहीं है। प्रश्न केवल इतना है कि ये शब्द शांति के मालिक नहीं बनते।
गहरी दार्शनिक व्याख्या
1. मृत्यु और जीवित एक जोड़ा है। एक को चाहना और दूसरे से भागना दोनों पकड़ हैं। 2. लोकाः और लौकिकम् परलोक और इस लोक के व्यवहार को साथ पूछते हैं। 3. लय और समाधि साधना के ऊँचे नाम हैं। वे भी प्रश्न बनते हैं। 4. क्वास्य की वर्तनी सार्वजनिक पाठ की है। पुस्तक से मिलान शेष है। 5. स्वमहिमन् मृत्यु पर विजय का दावा नहीं है। 6. यदि मृत्यु का विचार घबराने या स्वयं को हानि पहुँचाने की ओर जाए तो यह श्लोक उसका उत्तर नहीं है।
आत्मा के शरीर तक सीमित न होने की पहचान का अर्थ स्वास्थ्य, सुरक्षा, विश्राम या आवश्यक उपचार की उपेक्षा को उचित ठहराना नहीं है।
उदाहरण से समझें: जैसे दीपक की लौ हिलती है और बुझती है, पर यह पूछना कि कमरा कहाँ गया दीपक की गिनती नहीं है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।
आज की जिंदगी से उदाहरण
कोई व्यक्ति स्वास्थ्य की जाँच कराता है और समाधि का शब्द भी जानता है, पर न बीमारी को पहचान बनाता है न समाधि को पदक। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)
आज की पीढ़ी के लिए संदेश: मृत्यु और समाधि के नाम पहचानें। मृत्यु चाहना, इलाज रोकना या अपने लोगों को छोड़ना इस श्लोक में नहीं है।
सामान्य गलतफहमी
क्व मृत्युः का अर्थ जीवन से ऊबकर मृत्यु चाहना या स्वास्थ्य की उपेक्षा नहीं है। ऐसा विचार आए तो सहायता-सेवा से संपर्क करें।
जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास
जीवन में प्रयोग: आज शरीर की एक साधारण देखभाल पूरी करें, और समाधि या मृत्यु को आज का काम मत बनाएँ। (दिन में)
आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं जीवन या समाधि में से एक को इतना बड़ा बना रहा हूँ कि साधारण देखभाल छूट रही है?
छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। मृत्यु का चित्र आए तो आँख खोलें, पानी पिएँ, और यदि मन हानि की ओर जाए तो तुरंत किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बताएँ।
एक पंक्ति में सार: अपनी महिमा में मेरे लिए मृत्यु, जीवन, लोक, लौकिक, लय और समाधि कहाँ हैं?
English
Translation: Where are death or life, the worlds or the worldly, dissolution or absorption, for me established in my own majesty?
Simple explanation: Death and samadhi are questioned together. The verse is not advice to seek death, refuse care, or abandon anyone.
विषय और संबंधित श्लोक
- मृत्यु-जीवन
- लोक-लौकिक
- लय-समाधि
- स्वमहिमन्
- श्लोक 19.6: क्व दूरं क्व समीपं
- श्लोक 19.8: अलं त्रिवर्गकथया
स्रोत और सत्यापन
समीक्षा आवश्यक
संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के नवदश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।