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अध्याय 20 · बीसवाँ प्रकरण

अंतिम मौन

संपादकीय विषय-शीर्षक · पुस्तक में नाम: बीसवाँ प्रकरण

चौदह श्लोकों में अष्टावक्र शरीर से गुरु तक हर नाम पूछते हैं, और अंत में कहते हैं कि बहुत कहने से क्या, मुझमें कुछ उठता ही नहीं।

श्लोकों की कुल संख्या
14
अनुमानित पठन समय
लगभग 40 से 55 मिनट (अनुमान: प्रति श्लोक 3 से 4 मिनट)
मुख्य संस्कृत शब्द
निरञ्जन · गतद्वन्द्व · निःस्वभाव · अद्वय · निरुपाधि · नौत्तिष्ठते
प्रमुख विषय
भूत, देह, इन्द्रिय, मन, शून्य और नैराश्य · शास्त्र, आत्मविज्ञान, तृप्ति और वितृष्णा · विद्या, अहं, बंध और मोक्ष · प्रारब्ध, जीवन्मुक्ति और विदेह कैवल्य · कर्ता, भोक्ता और निष्क्रिय स्फुरण · सृष्टि, साधन, प्रमाता और प्रमेय · विक्षेप, हर्ष, विषाद, व्यवहार और परमार्थ · माया, प्रवृत्ति, उपदेश, शिष्य और गुरु · अस्ति और नास्ति के बाद मौन

चित्र-विवरण (संपादकीय): जहाँ आकाश, प्रकाश और जल एक हो जाते हैं। सारी सजावट धीरे-धीरे न्यूनतम हो जाती है। (इस अध्याय का अपना चित्र अभी बनना शेष है; यहाँ सरल सामान्य पृष्ठभूमि दिखाई गई है।)

अध्याय का परिचय

बीसवाँ प्रकरण अष्टावक्र गीता का अंतिम प्रकरण है। उन्नीसवें में जनक बोलकर कथा रोक चुके हैं। यहाँ गुरु फिर बोलते हैं, और लगभग हर श्लोक प्रश्न है।

वे शरीर, शास्त्र, बंध, मोक्ष, कर्ता, योगी, सृष्टि, प्रमाण, हर्ष, माया, प्रवृत्ति, उपदेश और गुरु तक पूछते हैं। अंतिम श्लोक दोनों ओर के शब्द समेटता है: अस्ति कहाँ, नास्ति कहाँ, एक कहाँ, दो कहाँ। फिर कहते हैं, बहुत कहने से क्या। मुझमें कुछ उठता ही नहीं।

सावधानी: यह मौन शरीर छोड़ने, गुरु का अपमान करने, या कर्तव्य रोकने का आदेश नहीं है। यह नामों की स्वामित्व-भावना का अंत है। पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया। सार्वजनिक पाठ में 20.3 ‘क्व बन्ध’, 20.6 ‘क्व लोकं’, और 20.10 ‘दुखं’ छपा है। पुस्तक की वर्तनी से ये रूप अभी नहीं मिलाए गए।

केंद्रीय प्रश्न

जब स्वरूप निरञ्जन और अद्वय है, तो देह से लेकर गुरु तक के शब्द कहाँ ठहरते हैं?

अध्याय की मुख्य शिक्षा

अंतिम प्रकरण नई सिद्धि नहीं जोड़ता। वह बचे हुए नामों को प्रश्न बनाकर छोड़ता है। संवाद वहाँ रुकता है जहाँ कहने को कुछ उठता ही नहीं। व्यवहार के शब्द उपयोगी रह सकते हैं। वे आत्मा के स्वामी नहीं रह जाते।

पढ़ने से पहले समझें

  • वक्ता फिर अष्टावक्र हैं। यह पुस्तक का अंतिम प्रकरण है।
  • लगभग हर श्लोक ‘क्व’ से पूछता है। प्रश्न मिटाने के लिए है, सूची बढ़ाने के लिए नहीं।
  • देह, विषाद, गुरु और उपदेश वाले श्लोक देखभाल और अध्ययन बंद नहीं करते।
  • 20.3, 20.6 और 20.10 की वर्तनी सार्वजनिक पाठ की है। स्कैन से मिलान शेष है।
  • अंतिम पंक्ति मौन है। वह जीवन रोकने का वाक्य नहीं है।

प्रमुख अवधारणाएँ

निरञ्जन
कलंक या उपाधि से रहित। यहाँ मत्स्वरूप का विशेषण है।
गतद्वन्द्व
जिसके लिए विरोधों का जोड़ा शेष नहीं कहा गया।
निःस्वभाव
कोई पकड़ने योग्य स्वभाव शेष नहीं। यह चरित्रहीनता का अर्थ नहीं है।
नौत्तिष्ठते
उठता नहीं। अंतिम श्लोक में मुझमें कुछ भी उदय नहीं होता।

श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या

14 श्लोक, पुस्तक के क्रम में। 14 श्लोकों पर पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है और उन पर “समीक्षा आवश्यक” दर्शाया गया है।

सत्यापितसमीक्षा आवश्यक

श्लोक 20.1

समीक्षा आवश्यक

क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः । क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥

मेरे निरञ्जन स्वरूप में भूत, देह, इन्द्रिय, मन, शून्य और नैराश्य कहाँ हैं?

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श्लोक 20.2

समीक्षा आवश्यक

क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः । क्व तृप्तिः क्व वितृष्णात्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥

द्वंद्वों से पार मेरे लिए शास्त्र, आत्मविज्ञान, निर्विषय मन, तृप्ति और वितृष्णा कहाँ हैं?

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श्लोक 20.3

समीक्षा आवश्यक

क्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा । क्व बन्ध क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥

विद्या, अविद्या, मैं, यह, मेरा, बंध, मोक्ष और स्वरूप की रूपिता कहाँ हैं?

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श्लोक 20.4

समीक्षा आवश्यक

क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा । क्व तद् विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा ॥ ४ ॥

निर्विशेष के लिए प्रारब्ध कर्म, जीवन्मुक्ति और विदेह कैवल्य कहाँ हैं?

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श्लोक 20.5

समीक्षा आवश्यक

क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा । क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा ॥ ५ ॥

निःस्वभाव मेरे लिए कर्ता, भोक्ता, निष्क्रिय स्फुरण और अपरोक्ष फल कहाँ हैं?

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श्लोक 20.6

समीक्षा आवश्यक

क्व लोकं क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा । क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ६ ॥

अद्वय स्वरूप में मेरे लिए लोक, मुमुक्षु, योगी, ज्ञानी, बद्ध और मुक्त कहाँ हैं?

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श्लोक 20.7

समीक्षा आवश्यक

क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम् । क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ७ ॥

अद्वय स्वरूप में सृष्टि, संहार, साध्य, साधन, साधक और सिद्धि कहाँ हैं?

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श्लोक 20.8

समीक्षा आवश्यक

क्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा । क्व किञ्चित् क्व न किञ्चिद् वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८ ॥

निर्मल मेरे लिए जानने वाला, प्रमाण, ज्ञेय, ज्ञान, कुछ और कुछ-नहीं कहाँ हैं?

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श्लोक 20.9

समीक्षा आवश्यक

क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता । क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥ ९ ॥

निष्क्रिय मेरे लिए भटकना, एकाग्रता, मूढ़ता, हर्ष और विषाद कहाँ हैं?

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श्लोक 20.10

समीक्षा आवश्यक

क्व चैष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता । क्व सुखं क्व च वा दुखं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥ १० ॥

निर्विमर्श मेरे लिए व्यवहार, परमार्थ, सुख और दुख कहाँ हैं?

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श्लोक 20.11

समीक्षा आवश्यक

क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा । क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे ॥ ११ ॥

निर्मल मेरे लिए माया, संसार, प्रीति, विरति, जीव और ब्रह्म कहाँ हैं?

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श्लोक 20.12

समीक्षा आवश्यक

क्व प्रवृत्तिर्निर्वृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम् । कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२ ॥

अचल और अपने में स्थित मेरे लिए प्रवृत्ति, निवृत्ति, मुक्ति और बंधन कहाँ हैं?

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श्लोक 20.13

समीक्षा आवश्यक

क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः । क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे ॥ १३ ॥

उपाधि-रहित मेरे लिए उपदेश, शास्त्र, शिष्य, गुरु और पुरुषार्थ कहाँ हैं?

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श्लोक 20.14

समीक्षा आवश्यक

क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम् । बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४ ॥

होना, न होना, एक और दो कहाँ हैं। अधिक क्या कहें। मुझमें कुछ उठता नहीं।

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अध्याय का सरल सार

अष्टावक्र अंतिम प्रकरण में शरीर, शास्त्र, बंध, मोक्ष, कर्ता, योगी, सृष्टि, हर्ष, माया, प्रवृत्ति और गुरु तक पूछते हैं। फिर कहते हैं कि होने और न होने, एक और दो, इनके बारे में और क्या कहें। मुझमें कुछ उठता ही नहीं। संवाद यहीं रुकता है।

पाँच प्रमुख शिक्षाएँ

  1. देह, इन्द्रिय, मन और शून्य भी स्वरूप के स्वामी नहीं कहे गए। शरीर की देखभाल बनी रहती है। (20.1)
  2. शास्त्र, मोक्ष, कर्ता और जीवन्मुक्ति के नाम प्रश्न बनते हैं। उत्तरदायित्व उन प्रश्नों से नहीं कटता। (20.3, 20.4, 20.5)
  3. योगी, साधक, प्रमाण और हर्ष-विषाद अनुभव के नाम हैं। विषाद होने पर सहायता बनी रहती है। (20.6, 20.7, 20.8, 20.9)
  4. माया, प्रवृत्ति और गुरु की कथा अंतिम प्रकरण में भी प्रश्न है। अध्ययन और सदाचार का अपमान इसमें नहीं है। (20.11, 20.12, 20.13)
  5. अस्ति और नास्ति के बाद कहने को कुछ नहीं बचता। मौन जीवन रोकने का आदेश नहीं है। (20.14)

सामान्य गलतफहमियाँ

  • ‘क्व देहो’ का अर्थ शरीर की उपेक्षा नहीं है।
  • ‘क्व गुरुः’ का अर्थ शिक्षक या विश्वसनीय मार्गदर्शन का अपमान नहीं है।
  • ‘किञ्चिन्नोत्तिष्ठते’ का अर्थ जीवन से कुछ न चाहना या स्वयं को हानि पहुँचाना नहीं है।
  • ‘क्व बन्धः क्व मोक्षः’ अनैतिक काम को मुक्त नहीं बनाता।
  • यदि निराशा आए तो सहायता-सेवा या चिकित्सक से संपर्क करें।

आत्मचिंतन प्रश्न

  1. किस नाम को मैं अभी भी अपनी शांति का स्वामी बनाए बैठा हूँ?
  2. क्या देह या गुरु को प्रश्न बनाना मुझसे देखभाल और विनय छीन रहा है?
  3. जब कहने को कुछ न बचे, क्या मैं चुप होकर भी अपने काम पर रहता हूँ?

संक्षिप्त चिंतन अभ्यास

पाँच मिनट बैठें। एक नाम चुनें, देह, शास्त्र या गुरु, और केवल यह देखें कि वह नाम शांति का स्वामी तो नहीं बना हुआ। फिर पानी पिएँ या एक छोटा ज़रूरी काम पूरा करें। मन हानि की ओर जाए तो आँख खोलकर किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बताएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीसवाँ प्रकरण किसका है?

अष्टावक्र फिर बोलते हैं। जनक उन्नीसवें में रुक चुके हैं। यह पुस्तक का अंतिम प्रकरण है। पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया।

इतने ‘क्व’ का क्या अर्थ है?

देह से गुरु तक जो नाम साधना में बड़े माने जाते हैं, उन्हें अष्टावक्र स्वरूप का स्वामी नहीं रहने देते। प्रश्न सूची बढ़ाने के लिए नहीं है।

20.13 क्या गुरु को नकारता है?

वह उपदेश, शास्त्र, शिष्य, गुरु और पुरुषार्थ पूछता है, क्योंकि मे को निरुपाधि शिव कहा गया है। सीखने वाले के लिए विनय और अध्ययन बने रहते हैं।

अंतिम पंक्ति जीवन बंद करने को कहती है?

किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम कहता है कि मुझमें कुछ उठता नहीं। यह मौन है। यह काम छोड़ने, लोगों को छोड़ने या स्वयं को हानि पहुँचाने का वाक्य नहीं है।