श्लोक 20.1
क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः । क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥
मेरे निरञ्जन स्वरूप में भूत, देह, इन्द्रिय, मन, शून्य और नैराश्य कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंअध्याय 20 · बीसवाँ प्रकरण
चौदह श्लोकों में अष्टावक्र शरीर से गुरु तक हर नाम पूछते हैं, और अंत में कहते हैं कि बहुत कहने से क्या, मुझमें कुछ उठता ही नहीं।
बीसवाँ प्रकरण अष्टावक्र गीता का अंतिम प्रकरण है। उन्नीसवें में जनक बोलकर कथा रोक चुके हैं। यहाँ गुरु फिर बोलते हैं, और लगभग हर श्लोक प्रश्न है।
वे शरीर, शास्त्र, बंध, मोक्ष, कर्ता, योगी, सृष्टि, प्रमाण, हर्ष, माया, प्रवृत्ति, उपदेश और गुरु तक पूछते हैं। अंतिम श्लोक दोनों ओर के शब्द समेटता है: अस्ति कहाँ, नास्ति कहाँ, एक कहाँ, दो कहाँ। फिर कहते हैं, बहुत कहने से क्या। मुझमें कुछ उठता ही नहीं।
सावधानी: यह मौन शरीर छोड़ने, गुरु का अपमान करने, या कर्तव्य रोकने का आदेश नहीं है। यह नामों की स्वामित्व-भावना का अंत है। पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया। सार्वजनिक पाठ में 20.3 ‘क्व बन्ध’, 20.6 ‘क्व लोकं’, और 20.10 ‘दुखं’ छपा है। पुस्तक की वर्तनी से ये रूप अभी नहीं मिलाए गए।
जब स्वरूप निरञ्जन और अद्वय है, तो देह से लेकर गुरु तक के शब्द कहाँ ठहरते हैं?
अंतिम प्रकरण नई सिद्धि नहीं जोड़ता। वह बचे हुए नामों को प्रश्न बनाकर छोड़ता है। संवाद वहाँ रुकता है जहाँ कहने को कुछ उठता ही नहीं। व्यवहार के शब्द उपयोगी रह सकते हैं। वे आत्मा के स्वामी नहीं रह जाते।
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क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः । क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥
मेरे निरञ्जन स्वरूप में भूत, देह, इन्द्रिय, मन, शून्य और नैराश्य कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः । क्व तृप्तिः क्व वितृष्णात्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥
द्वंद्वों से पार मेरे लिए शास्त्र, आत्मविज्ञान, निर्विषय मन, तृप्ति और वितृष्णा कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व विद्या क्व च वाविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा । क्व बन्ध क्व च वा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥
विद्या, अविद्या, मैं, यह, मेरा, बंध, मोक्ष और स्वरूप की रूपिता कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा । क्व तद् विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा ॥ ४ ॥
निर्विशेष के लिए प्रारब्ध कर्म, जीवन्मुक्ति और विदेह कैवल्य कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा । क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा ॥ ५ ॥
निःस्वभाव मेरे लिए कर्ता, भोक्ता, निष्क्रिय स्फुरण और अपरोक्ष फल कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व लोकं क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा । क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ६ ॥
अद्वय स्वरूप में मेरे लिए लोक, मुमुक्षु, योगी, ज्ञानी, बद्ध और मुक्त कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम् । क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ७ ॥
अद्वय स्वरूप में सृष्टि, संहार, साध्य, साधन, साधक और सिद्धि कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व प्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा । क्व किञ्चित् क्व न किञ्चिद् वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८ ॥
निर्मल मेरे लिए जानने वाला, प्रमाण, ज्ञेय, ज्ञान, कुछ और कुछ-नहीं कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढता । क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥ ९ ॥
निष्क्रिय मेरे लिए भटकना, एकाग्रता, मूढ़ता, हर्ष और विषाद कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व चैष व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता । क्व सुखं क्व च वा दुखं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥ १० ॥
निर्विमर्श मेरे लिए व्यवहार, परमार्थ, सुख और दुख कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा । क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे ॥ ११ ॥
निर्मल मेरे लिए माया, संसार, प्रीति, विरति, जीव और ब्रह्म कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व प्रवृत्तिर्निर्वृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम् । कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२ ॥
अचल और अपने में स्थित मेरे लिए प्रवृत्ति, निवृत्ति, मुक्ति और बंधन कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः । क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे ॥ १३ ॥
उपाधि-रहित मेरे लिए उपदेश, शास्त्र, शिष्य, गुरु और पुरुषार्थ कहाँ हैं?
पूरी व्याख्या पढ़ेंक्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकं क्व च द्वयम् । बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४ ॥
होना, न होना, एक और दो कहाँ हैं। अधिक क्या कहें। मुझमें कुछ उठता नहीं।
पूरी व्याख्या पढ़ेंअष्टावक्र अंतिम प्रकरण में शरीर, शास्त्र, बंध, मोक्ष, कर्ता, योगी, सृष्टि, हर्ष, माया, प्रवृत्ति और गुरु तक पूछते हैं। फिर कहते हैं कि होने और न होने, एक और दो, इनके बारे में और क्या कहें। मुझमें कुछ उठता ही नहीं। संवाद यहीं रुकता है।
पाँच मिनट बैठें। एक नाम चुनें, देह, शास्त्र या गुरु, और केवल यह देखें कि वह नाम शांति का स्वामी तो नहीं बना हुआ। फिर पानी पिएँ या एक छोटा ज़रूरी काम पूरा करें। मन हानि की ओर जाए तो आँख खोलकर किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बताएँ।
अष्टावक्र फिर बोलते हैं। जनक उन्नीसवें में रुक चुके हैं। यह पुस्तक का अंतिम प्रकरण है। पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया।
देह से गुरु तक जो नाम साधना में बड़े माने जाते हैं, उन्हें अष्टावक्र स्वरूप का स्वामी नहीं रहने देते। प्रश्न सूची बढ़ाने के लिए नहीं है।
वह उपदेश, शास्त्र, शिष्य, गुरु और पुरुषार्थ पूछता है, क्योंकि मे को निरुपाधि शिव कहा गया है। सीखने वाले के लिए विनय और अध्ययन बने रहते हैं।
किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम कहता है कि मुझमें कुछ उठता नहीं। यह मौन है। यह काम छोड़ने, लोगों को छोड़ने या स्वयं को हानि पहुँचाने का वाक्य नहीं है।