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प्रकरण 20: बीसवाँ प्रकरणश्लोक ५/१४36%

अध्याय 20 · अंतिम मौन

अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.5

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा । क्वापरोक्षं फलं वा क्व निःस्वभावस्य मे सदा ॥ ५ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva kartā kva ca vā bhoktā niṣkriyaṃ sphuraṇaṃ kva vā | kvāparokṣaṃ phalaṃ vā kva niḥsvabhāvasya me sadā || 5 ||

सरल उच्चारण: kva kartaa kva cha vaa bhoktaa nishkriyam sphuranam kva vaa kvaaparoksham phalam vaa kva nihsvabhaavasya me sadaa (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, कर्ता, क्व, च, वा, भोक्ता, निष्क्रियम्, स्फुरणम्, क्व, वा, क्व, अपरोक्षम्, फलम्, वा, क्व, निःस्वभावस्य, मे, सदा

क्व कर्ता क्व भोक्ता
करने वाला कहाँ, भोगने वाला कहाँ
निष्क्रियम् स्फुरणम् क्व
निष्क्रिय स्फुरण कहाँ
क्व अपरोक्षम् फलम्
प्रत्यक्ष फल कहाँ
निःस्वभावस्य मे सदा
सदा निःस्वभाव मेरे लिए

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

सदा निःस्वभाव मेरे लिए कर्ता कहाँ, भोक्ता कहाँ, निष्क्रिय स्फुरण कहाँ, और अपरोक्ष फल कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

कर्ता और भोक्ता के साथ उस फल को भी पूछा गया है जो साक्षात् कहा जाता है। निःस्वभाव का अर्थ चरित्रहीनता नहीं है। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

मैंने किया, मैं भोगता हूँ, मेरे भीतर एक निष्क्रिय चमक है, और मुझे साक्षात् फल मिल गया। ये चार दावे हैं।

अष्टावक्र पूछते हैं कि ये कहाँ हैं।

काम का हिसाब और दूसरे के प्रति दायित्व इसीलिए बना रहता है। आत्मा को अकर्ता कहना सड़क पर की गई गलती नहीं मिटाता।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. कर्ता और भोक्ता कर्म की प्रचलित जोड़ी हैं। 2. निष्क्रिय स्फुरण एक सूक्ष्म अनुभव का नाम है। वह भी प्रश्न है। 3. अपरोक्ष फल साक्षात्कार को फल बनाने की भाषा है। 4. निःस्वभाव पकड़ने योग्य स्वभाव का अभाव कहता है। 5. सदा इस वर्णन को प्रदर्शन नहीं बनाता। 6. व्यावहारिक स्तर पर उत्तरदायित्व रहता है।

सर्वोच्च चिंतन-स्तर पर आत्मा को अकर्ता कहा गया है; व्यावहारिक स्तर पर हर व्यक्ति अपने निर्णयों, आचरण और उनके परिणामों के लिए उत्तरदायी रहता है। ज्ञानी के लिए विधि-निषेध का अधिकार न होने की बात पुस्तक की दार्शनिक दृष्टि है; यह किसी को नैतिक, कानूनी या सामाजिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे रंगमंच पर अभिनेता पात्र का नाम पहनता है और नाटक के बाद भी टूटी कुर्सी का हिसाब देता है। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

कोई व्यक्ति कहता है कि करने वाला कोई नहीं, और फिर भी माफ़ी माँगता है तथा टूटी चीज़ की भरपाई करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: कर्तापन का गर्व छोड़ें। किए हुए का हिसाब और दूसरों के प्रति दायित्व न छोड़ें।

सामान्य गलतफहमी

क्व कर्ता का अर्थ यह नहीं कि व्यावहारिक स्तर पर व्यक्ति अपने निर्णयों और परिणामों से मुक्त हो गया।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज एक अपनी गलती का छोटा सुधार करें, बिना यह कहे कि करने वाला कोई था ही नहीं। (काम में)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं अकर्ता के शब्द से अपनी भरपाई टाल रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। फिर एक ऐसे काम का नाम लें जिसका फल आज आपको निभाना है।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: निःस्वभाव मेरे लिए कर्ता, भोक्ता, निष्क्रिय स्फुरण और अपरोक्ष फल कहाँ हैं?

English

Translation: Where are the doer and the enjoyer, where is inactive shimmering, where is the fruit of immediate knowledge, for me always without a graspable nature?

Simple explanation: Doer and fruit are questioned. Responsibility for what one does remains.

विषय और संबंधित श्लोक

  • कर्ता-भोक्ता
  • निष्क्रिय-स्फुरण
  • अपरोक्ष-फल
  • निःस्वभाव
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 20.4: क्व प्रारब्धानि कर्माणि
  • श्लोक 20.6: क्व लोकं क्व मुमुक्षु

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक।