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प्रकरण 20: बीसवाँ प्रकरणश्लोक ६/१४43%

अध्याय 20 · अंतिम मौन

अष्टावक्र गीता, श्लोक 20.6

समीक्षा आवश्यक

मूल संस्कृत

वक्ता: अष्टावक्र (पुस्तक में वक्ता-लेबल: अष्टावक्र उवाच)

क्व लोकं क्व मुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा । क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ६ ॥

[पृष्ठ से सत्यापन आवश्यक] पुस्तक के छपे पाठ में भेद मिला है; नीचे “स्रोत और सत्यापन” देखें। पाठ को पुस्तक में जैसा छपा है वैसा ही रखा गया है।

IAST लिप्यंतरण

kva lokaṃ kva mumukṣur vā kva yogī jñānavān kva vā | kva baddhaḥ kva ca vā muktaḥ svasvarūpe'ham advaye || 6 ||

सरल उच्चारण: kva lokam kva mumukshur vaa kva yogee jnyaanavaan kva vaa kva baddhah kva cha vaa muktah svasvaroopeham advaye (सरल रोमन उच्चारण-सहायता; शास्त्रीय रूप से सटीक नहीं)

पदच्छेद और प्रमुख शब्दार्थ

क्व, लोकम्, क्व, मुमुक्षुः, वा, क्व, योगी, ज्ञानवान्, क्व, वा, क्व, बद्धः, क्व, च, वा, मुक्तः, स्व-स्वरूपे, अहम्, अद्वये

क्व लोकम् क्व मुमुक्षुः
लोक कहाँ, मुक्ति का इच्छुक कहाँ
क्व योगी क्व ज्ञानवान्
योगी कहाँ, ज्ञानवान कहाँ
क्व बद्धः क्व मुक्तः
बद्ध कहाँ, मुक्त कहाँ
स्व-स्वरूपे अहम् अद्वये
मैं अपने अद्वय स्वरूप में

शब्द-अन्वेषण: सत्यापित श्लोकों के सभी प्रमुख शब्दार्थ एक जगह।

शाब्दिक हिन्दी अर्थ

अपने अद्वय स्वरूप में मैं हूँ। वहाँ लोक कहाँ, मुमुक्षु कहाँ, योगी कहाँ, ज्ञानवान कहाँ, बद्ध कहाँ और मुक्त कहाँ?

पुस्तकानुसार हिन्दी भावार्थ

पुस्तक की भाषा-टीका का मौलिक पुनर्कथन, शब्दशः प्रति नहीं।

सार्वजनिक पाठ में ‘क्व लोकं’ है। पुस्तक से मिलान शेष है। अद्वय यहाँ पहली बार इस प्रकरण की धुरी बनता है। इस श्लोक की टीका का पृष्ठ इस सत्र में फिर नहीं देखा गया।

सरल हिन्दी में समझें

संसार, मुक्ति चाहने वाला, योगी, ज्ञानी, बँधा हुआ और मुक्त। ये पहचान की उपाधियाँ हैं।

अष्टावक्र कहते हैं कि अद्वय स्वरूप में मैं हूँ, और वहाँ ये उपाधियाँ कहाँ हैं।

किसी को योगी या मुक्त कहकर अलग जमात बनाना इस श्लोक के विरुद्ध है। अपना काम और विनय बना रहता है।

गहरी दार्शनिक व्याख्या

1. लोक और मुमुक्षु बाहर की भीड़ और भीतर की चाह हैं। 2. योगी और ज्ञानवान सम्मान की उपाधियाँ हैं। 3. बद्ध और मुक्त फिर एक जोड़ा है। 4. स्वस्वरूपेऽहमद्वये ठहराव है, तुलना नहीं। 5. क्व लोकं की वर्तनी सार्वजनिक पाठ की है। 6. उपाधि गिरने से व्यवहार का धर्म नहीं गिरता।

तृष्णा से मुक्ति का अर्थ निष्क्रिय, भावशून्य या सार्थक कार्यों के प्रति उदासीन हो जाना नहीं है। यह शिक्षा जगत् की स्वतंत्र और स्थायी सत्ता पर प्रश्न उठाती है; यह व्यावहारिक अनुभव को नकारती नहीं, और दुख की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं देती।

उदाहरण से समझें: जैसे रंग भरने के बाद चित्र के लेबल बॉक्स में रह जाते हैं और चित्र लेबल नहीं बनता। यह उदाहरण श्लोक का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा को समझाने का माध्यम है।

आज की जिंदगी से उदाहरण

यह एक आधुनिक संपादकीय उदाहरण है, श्लोक का अर्थ या अनुवाद नहीं।

सभा में कोई व्यक्ति न अपने कार्ड पर योगी लिखता है न पड़ोसी को बद्ध। वह अपनी पंक्ति का काम करता है। (यह आधुनिक उदाहरण है, श्लोक का हिस्सा नहीं।)

आज की पीढ़ी के लिए संदेश: उपाधियाँ पहचानें। अपने आपको मुक्त और दूसरे को बद्ध लिखकर अलग न हो जाएँ।

सामान्य गलतफहमी

अद्वय का अर्थ यह नहीं कि सब व्यावहारिक भेद मिटा दिए जाएँ। कानून और देखभाल अपनी जगह रहते हैं।

जीवन में प्रयोग, आत्मचिंतन और छोटा अभ्यास

जीवन में प्रयोग: आज किसी की उपाधि की तुलना किए बिना एक साझा काम पूरा करें। (साथ काम करते हुए)

आत्मचिंतन प्रश्न: क्या मैं योगी या मुक्त के शब्द से अपने आपको औरों से अलग कर रहा हूँ?

छोटा अभ्यास: तीन मिनट बैठें। योगी और मुक्त दो शब्द आएँ तो दोनों छोड़ें। फिर अपनी आज की एक भूमिका ईमानदारी से निभाएँ।

यह चिंतन-अभ्यास है, कोई चिकित्सा या उपचार नहीं। असुविधा हो तो रुकिए और किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कीजिए।

एक पंक्ति में सार: अद्वय स्वरूप में मेरे लिए लोक, मुमुक्षु, योगी, ज्ञानी, बद्ध और मुक्त कहाँ हैं?

English

Translation: Where is the world, the seeker, the yogi, the knower, the bound, or the free? I am in my own nondual nature.

Simple explanation: The titles fall together. Nonduality here is not a license to ignore real differences of care and duty.

विषय और संबंधित श्लोक

  • अद्वय
  • मुमुक्षु-योगी
  • बद्ध-मुक्त
  • उपाधि
  • ये उसी अष्टावक्र गीता के भीतर के संपादकीय संबंध हैं।
  • श्लोक 20.5: क्व कर्ता क्व च
  • श्लोक 20.7: क्व सृष्टिः क्व च

स्रोत और सत्यापन

समीक्षा आवश्यक पृष्ठ इस सत्र में नहीं देखा गया

संपादकीय टिप्पणी: मूल श्लोक सार्वजनिक अष्टावक्रगीता के विंश क्रम से। इस सत्र में पुस्तक का स्कैन नहीं देखा गया। समीक्षा आवश्यक। सार्वजनिक पाठ में ‘क्व लोकं’ है।